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Ramayana: रामसेतु निर्माण में गिलहरी की क्या भूमिका थी? पौराणिक कथा से जानें इसका रहस्य

जीवांजलि, धर्म डेस्कPublished by:
Shakshi
सार

Ramayana Katha: रामायण के अनुसार जब भगवान श्रीराम अपनी वानर सेना के साथ समुद्र तट पर पहुंचे, तब उन्होंने समुद्र देव से मार्ग देने की प्रार्थना की। 

रामसेतु निर्माण में गिलहरी की क्या भूमिका थी?
Ramayana Mythological Story: रामायण में लंका विजय के लिए जब भगवान श्रीराम समुद्र तट पर पहुंचे, तब उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती थी विशाल समुद्र को पार करना। माता सीता का हरण कर रावण उन्हें लंका ले गया था और अब उन्हें वापस लाने के लिए समुद्र पार करना आवश्यक था। इसी उद्देश्य से वानर सेना के सहयोग से समुद्र पर एक अद्भुत सेतु का निर्माण किया गया, जिसे आज रामसेतु के नाम से जाना जाता है। रामायण की कथाओं में रामसेतु निर्माण से जुड़ी अनेक घटनाओं का वर्णन मिलता है, लेकिन इनमें सबसे अधिक भावपूर्ण कथा गिलहरी की मानी जाती है। यह कथा केवल एक छोटे जीव की उपस्थिति भर नहीं, बल्कि रामकाज में उसकी सहभागिता की भी कहानी है। आइए जानते हैं कि रामसेतु निर्माण में गिलहरी की क्या भूमिका थी और इससे जुड़ी पौराणिक कथा क्या है।

रामसेतु निर्माण का आरंभ कैसे हुआ?

रामायण के अनुसार जब भगवान श्रीराम अपनी वानर सेना के साथ समुद्र तट पर पहुंचे, तब उन्होंने समुद्र देव से मार्ग देने की प्रार्थना की। कई दिनों तक प्रार्थना करने के बाद समुद्र देव प्रकट हुए और उन्होंने बताया कि समुद्र को पार करने का सबसे उचित उपाय सेतु निर्माण है।

इसके बाद वानर सेना के दो प्रमुख योद्धा नल और नील को सेतु निर्माण का कार्य सौंपा गया। पौराणिक कथाओं के अनुसार नल और नील को यह विशेष वरदान प्राप्त था कि उनके द्वारा जल में डाली गई वस्तुएं डूबती नहीं थीं। उनके नेतृत्व में विशाल पत्थरों, शिलाओं और पर्वतों को समुद्र में डालकर सेतु निर्माण प्रारंभ हुआ।

वानर सेना का विशाल कार्य

रामसेतु निर्माण में लाखों वानर और भालू लगे हुए थे। कोई पर्वत उठा रहा था तो कोई विशाल चट्टानों को समुद्र तक पहुंचा रहा था। पूरी सेना दिन-रात इस कार्य में लगी थी। भगवान श्रीराम स्वयं भी इस महान कार्य को देख रहे थे।

कथा के अनुसार समुद्र तट पर निरंतर पत्थर लाकर डाले जा रहे थे और धीरे-धीरे लंका तक पहुंचने वाला मार्ग तैयार हो रहा था। यह कार्य अत्यंत कठिन था, क्योंकि समुद्र की विशालता और उसकी गहराई किसी भी साधारण प्रयास से पार नहीं की जा सकती थी। इसी दौरान एक छोटी सी गिलहरी भी वहां पहुंची और उसने भी रामकाज में अपना योगदान देने का निश्चय किया।

गिलहरी ने कैसे शुरू किया अपना कार्य?

पौराणिक कथा के अनुसार गिलहरी ने देखा कि वानर सेना बड़े-बड़े पत्थर उठाकर समुद्र में डाल रही है। वह आकार में बहुत छोटी थी और बड़े पत्थर उठाना उसके लिए संभव नहीं था, लेकिन उसके मन में भी भगवान श्रीराम के कार्य में सहयोग करने की इच्छा जागृत हुई, तब उसने अपनी क्षमता के अनुसार कार्य करना शुरू किया। वह समुद्र के किनारे जाती, अपने शरीर को पानी में भिगोती और फिर रेत में लोट जाती। इसके बाद अपने शरीर से लगी रेत को जाकर सेतु निर्माण स्थल पर झाड़ देती। वह बार-बार यही कार्य करती रही। उसका यह प्रयास देखने में छोटा था, लेकिन उसकी भावना पूर्ण समर्पण से भरी हुई थी। वह अपने सामर्थ्य के अनुसार रामकाज में भाग ले रही थी।

 

रामसेतु निर्माण में गिलहरी की क्या भूमिका थी?

वानरों ने गिलहरी को रोका

कथा में वर्णन मिलता है कि जब वानर सेना के कुछ योद्धाओं ने गिलहरी को इस प्रकार कार्य करते देखा तो उन्हें लगा कि वह उनके काम में बाधा उत्पन्न कर रही है। विशाल पत्थरों के बीच दौड़ती छोटी गिलहरी कई बार उनके पैरों के सामने आ जाती थी।

कुछ वानरों ने उसे वहां से हटाने का प्रयास किया। उनका मानना था कि इतने बड़े कार्य में गिलहरी के कुछ कण रेत डालने से क्या अंतर पड़ने वाला है। किंतु गिलहरी अपने कार्य में निरंतर लगी रही। उसका उद्देश्य केवल इतना था कि वह भी प्रभु श्रीराम के कार्य में अपनी ओर से कुछ योगदान दे सके।

भगवान श्रीराम की दृष्टि गिलहरी पर पड़ी

जब भगवान श्रीराम ने गिलहरी के इस प्रयास को देखा तो वे अत्यंत प्रसन्न हुए। उन्होंने समझ लिया कि यह छोटा सा जीव अपनी संपूर्ण निष्ठा और भक्ति के साथ सेतु निर्माण में भाग ले रहा है। कथा के अनुसार भगवान श्रीराम ने गिलहरी को अपने हाथों में उठाया और उसके कार्य की सराहना की। उन्होंने कहा कि किसी कार्य का महत्व केवल उसके आकार या शक्ति से नहीं, बल्कि उसके पीछे की भावना और समर्पण से होता है। गिलहरी के छोटे से प्रयास को भी उन्होंने उतना ही महत्वपूर्ण माना जितना विशाल वानर सेना के परिश्रम को माना।

गिलहरी की पीठ पर कैसे बने तीन निशान?

पौराणिक मान्यता के अनुसार जब भगवान श्रीराम ने प्रसन्न होकर गिलहरी की पीठ पर स्नेहपूर्वक अपनी उंगलियां फेरीं, तब उनकी उंगलियों के स्पर्श से गिलहरी की पीठ पर तीन रेखाएं अंकित हो गईं। कहा जाता है कि आज भी भारतीय गिलहरियों की पीठ पर दिखाई देने वाली तीन धारियां उसी दिव्य स्पर्श का प्रतीक मानी जाती हैं। धार्मिक मान्यताओं में इन धारियों को भगवान श्रीराम के आशीर्वाद का चिह्न माना गया है।

रामसेतु निर्माण कितने समय में पूरा हुआ?

वाल्मीकि रामायण में वर्णन मिलता है कि नल और नील के नेतृत्व में वानर सेना ने कुछ ही दिनों में समुद्र पर सेतु का निर्माण कर लिया था। इस सेतु के माध्यम से भगवान श्रीराम की सेना लंका पहुंची और उसके बाद रावण के विरुद्ध युद्ध हुआ। धार्मिक ग्रंथों में वर्णित है कि यह सेतु अत्यंत विशाल था और इसके माध्यम से संपूर्ण वानर सेना समुद्र पार कर सकी। 


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(Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी ज्योतिषीय, पौराणिक और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है तथा केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है। अधिक जानकारी के लिए कृपया संबंधित विषय के विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य करें।)

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