Prahlada Katha: हिरण्यकशिपु ने हिमालय पर जाकर घोर तपस्या की। वे वर्षों तक एक पैर पर खड़े रहे, भोजन-जल त्याग दिया और केवल ब्रह्मा जी का ध्यान किया। उनकी तपस्या से ब्रह्मा जी प्रसन्न हुए और उन्हें वरदान देने आए।
Prahlada Mythological Story: जब सृष्टि में अधर्म का अंधकार छा रहा था, जब असुर राजाओं की क्रूरता से देवता भी कांपते थे, तब एक ऐसे बालक का जन्म हुआ जिसने अंधकार को चीरकर भक्ति का उजाला फैलाया। वह बालक थे प्रह्लाद– असुर राज हिरण्यकशिपु के पुत्र, जिनका कुल शत्रुता और अहंकार का प्रतीक था, किंतु जिनके हृदय में भगवान विष्णु की अटूट भक्ति बस चुकी थी। प्रह्लाद की वजह से ही भगवान विष्णु को नरसिंह अवतार लेना पड़ा था, लेकिन क्या आपको पता है कि आखिर असुर कुल में जन्म प्रह्लाद कैसे विष्णु जी के परम भक्त बन गए? आइए पौराणिक कथा से जानते हैं इसके पीछे का रहस्य
हिरण्यकशिपु का आतंक
पौराणिक कथाओं के अनुसार, सृष्टि के आरंभ में ब्रह्मा जी से दो पुत्र उत्पन्न हुए: दिति और अदिति। अदिति से देवता उत्पन्न हुए, जबकि दिति से दैत्य या असुर। दैत्य कुल में अनेक शक्तिशाली राजा हुए, जो अपनी तपस्या से वरदान प्राप्त करते थे, लेकिन अहंकार के कारण अधर्म की ओर मुड़ जाते थे। इन्हीं में से एक थे हिरण्यकशिपु, जो कश्यप ऋषि और दिति के पुत्र थे। हिरण्यकशिपु का बड़ा भाई हिरण्याक्ष था, जिसका वध भगवान विष्णु ने वराह अवतार में किया था। इससे क्रोधित होकर हिरण्यकशिपु ने भगवान विष्णु से बदला लेने की ठान ली।
हिरण्यकशिपु को मिला ये वरदान
हिरण्यकशिपु ने हिमालय पर जाकर घोर तपस्या की। वे वर्षों तक एक पैर पर खड़े रहे, भोजन-जल त्याग दिया और केवल ब्रह्मा जी का ध्यान किया। उनकी तपस्या से ब्रह्मा जी प्रसन्न हुए और उन्हें वरदान देने आए। हिरण्यकशिपु ने चतुराई से ऐसा वरदान मांगा कि न दिन में मरे, न रात में; न घर में, न बाहर; न भूमि पर, न आकाश में; न मनुष्य से, न पशु से; न अस्त्र से, न शस्त्र से। ब्रह्मा जी ने यह वरदान दे दिया, जिससे हिरण्यकशिपु अजेय हो गया। इस वरदान से उसका अहंकार बढ़ गया। वह स्वयं को भगवान मानने लगा और पूरे जगत पर राज करने लगा। उसने देवताओं को पराजित किया, इंद्रलोक पर कब्जा कर लिया और सभी को आदेश दिया कि केवल उसकी पूजा करें, विष्णु या अन्य देवताओं की नहीं। जो कोई विष्णु का नाम लेता, उसे कठोर दंड दिया जाता। इस प्रकार असुर कुल में अधर्म का साम्राज्य स्थापित हो गया।
प्रह्लाद का जन्म और भक्ति का आरंभ
हिरण्यकशिपु की पत्नी कयाधु गर्भवती हुईं। एक बार जब हिरण्यकशिपु तपस्या में लीन थे, तब देवराज इंद्र ने कयाधु का अपहरण कर लिया, क्योंकि वे असुर कुल में जन्म लेने वाले बालक को मारना चाहते थे, लेकिन मार्ग में नारद जी मिले, जो कयाधु को अपने आश्रम ले गए। वहां नारद जी ने कयाधु को भगवान विष्णु की भक्ति का उपदेश दिया। गर्भ में रहते हुए प्रह्लाद ने भी यह उपदेश सुना और उनके हृदय में विष्णु भक्ति का बीज अंकुरित हो गया। नारद जी ने कहा, "हे कयाधु, भगवान विष्णु सर्वव्यापी हैं। वे हर जीव में वास करते हैं। उनकी भक्ति से मोक्ष प्राप्त होता है।" इस प्रकार, गर्भावस्था में ही प्रह्लाद विष्णु भक्त बन गए।
जन्म के बाद प्रह्लाद को असुर गुरुओं के पास शिक्षा के लिए भेजा गया। गुरु शुक्राचार्य के पुत्र शांड और अमर्क ने उन्हें पढ़ाया, लेकिन प्रह्लाद हर शिक्षा में विष्णु का नाम लेते। जब गुरु पूछते, "क्या सीखा?" तो प्रह्लाद कहते, "संसार नश्वर है, केवल विष्णु भक्ति ही शाश्वत है।" गुरुओं ने हिरण्यकशिपु को सूचित किया। पिता ने प्रह्लाद को बुलाकर पूछा, "तुम्हें किसने विष्णु भक्ति सिखाई?" प्रह्लाद ने निर्भीक होकर कहा, "पिताजी, भगवान विष्णु स्वयं सबके हृदय में निवास करते हैं। वे ही मुझे प्रेरित करते हैं।" हिरण्यकशिपु क्रोधित हो गया, लेकिन प्रह्लाद की भक्ति अटल थी।
हिरण्यकशिपु की परीक्षाएं और प्रह्लाद की अटल भक्ति
हिरण्यकशिपु ने प्रह्लाद को विष्णु भक्ति से विमुख करने के अनेक प्रयास किए। पहले उसने समझाया, फिर धमकाया। जब कुछ नहीं हुआ तो क्रूर यातनाएं दीं। प्रह्लाद को पहाड़ से फेंका गया, लेकिन विष्णु ने उन्हें बचा लिया। उन्हें विष दिया गया, लेकिन वह अमृत बन गया। हाथियों से कुचलवाने की कोशिश की, लेकिन हाथी उन्हें स्पर्श नहीं कर सके। सर्पों से डसवाया, लेकिन सर्प निष्क्रिय हो गए। अग्नि में डाला, लेकिन अग्नि ठंडी हो गई। इन सबमें प्रह्लाद "नारायण, नारायण" जपते रहे।
होलिका दहन
हिरण्यकशिपु की बहन होलिका को वरदान था कि अग्नि उसे जला नहीं सकती। उसने प्रह्लाद को गोद में लेकर अग्नि में बैठने का योजना बनाई, लेकिन भगवान की कृपा से होलिका जल गई और प्रह्लाद सुरक्षित बच गए। यह घटना आज भी होली पर्व के रूप में मनाई जाती है, जो अधर्म पर धर्म की विजय का प्रतीक है।
नरसिंह अवतार और हिरण्यकशिपु का वध
जब सभी प्रयास विफल हुए, तो हिरण्यकशिपु ने प्रह्लाद से पूछा, "तुम्हारा विष्णु कहां है? क्या इस स्तंभ में है?" प्रह्लाद ने कहा, "हां, हर जगह है।" क्रोधित होकर हिरण्यकशिपु ने स्तंभ पर प्रहार किया। तभी स्तंभ फट गया और भगवान विष्णु नरसिंह अवतार में प्रकट हुए – आधा सिंह, आधा मनुष्य। उन्होंने हिरण्यकशिपु को गोद में उठाया, सांझ के समय (न दिन, न रात), द्वार की देहलीज पर (न घर, न बाहर), भूमि पर रखकर (न भूमि, न आकाश), नाखूनों से (न अस्त्र, न शस्त्र) विदीर्ण कर दिया। इस प्रकार वरदान का पालन करते हुए अधर्म का अंत किया।
(Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी ज्योतिषीय, पौराणिक और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है तथा केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है। अधिक जानकारी के लिए कृपया संबंधित विषय के विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य करें।)