Lord Jagannath Story: पुरी की परंपरा के अनुसार भगवान जगन्नाथ का विग्रह काले रंग का, बलभद्र का श्वेत रंग का तथा देवी सुभद्रा का पीतवर्ण माना जाता है। तीनों प्रतिमाएं काष्ठ से निर्मित हैं और इनका स्वरूप अन्य हिंदू मंदिरों में स्थापित पत्थर या धातु की प्रतिमाओं से अलग है।
Lord Jagannath Mythological Story: पुरी धाम में विराजमान भगवान जगन्नाथ, उनके बड़े भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा की प्रतिमाएं संसार की अन्य देव प्रतिमाओं से बिल्कुल भिन्न हैं। इन मूर्तियों की सबसे विशेष बात यह है कि इनके हाथ-पैर पूर्ण रूप से निर्मित नहीं हैं। सदियों से श्रद्धालुओं के मन में यह प्रश्न उठता रहा है कि आखिर भगवान जगन्नाथ की प्रतिमा अधूरी क्यों है?
इस विषय में स्कंद पुराण, ब्रह्म पुराण तथा ओड़िशा की प्राचीन लोक परंपराओं में एक अत्यंत रोचक पौराणिक कथा का वर्णन मिलता है। यह कथा राजा इंद्रद्युम्न, भगवान विष्णु के नीलमाधव स्वरूप और स्वयं विश्वकर्मा से जुड़ी हुई है। अयोध्या या द्वारका नहीं, बल्कि कलियुग में भगवान जगन्नाथ का यह अनोखा स्वरूप भक्तों के लिए विशेष महत्व रखता है। आइए जानते हैं कि भगवान जगन्नाथ की मूर्ति अधूरी क्यों रह गई और इसके पीछे कौन-सी पौराणिक कथा प्रचलित है।
राजा इंद्रद्युम्न को मिला नीलमाधव का समाचार
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार प्राचीन काल में मालवा के राजा इंद्रद्युम्न भगवान विष्णु के परम भक्त थे। एक दिन उन्हें ज्ञात हुआ कि पृथ्वी पर कहीं नीलमाधव नाम से भगवान विष्णु का एक अद्भुत स्वरूप विद्यमान है, जिसकी पूजा देवताओं के समान की जाती है। राजा ने उस दिव्य विग्रह के दर्शन का संकल्प लिया। उन्होंने अपने अनेक दूतों और ब्राह्मणों को नीलमाधव की खोज में भेजा। लंबे समय तक खोज करने के बाद भी किसी को सफलता नहीं मिली। अंततः विद्वान ब्राह्मण विद्यापति को नीलमाधव की खोज का कार्य सौंपा गया।
विद्यापति ने कैसे खोजा नीलमाधव?
कथा के अनुसार विद्यापति वन-वन भटकते हुए एक घने जंगल में पहुंचे। वहां शबर जाति के प्रमुख विश्ववसु निवास करते थे। विश्ववसु प्रतिदिन किसी गुप्त स्थान पर जाकर भगवान नीलमाधव की पूजा करते थे। विद्यापति ने विश्ववसु से उस दिव्य देवता के दर्शन कराने का आग्रह किया, लेकिन विश्ववसु ने रहस्य उजागर करने से इनकार कर दिया। बाद में अनेक घटनाओं के पश्चात उन्होंने विद्यापति को अपने साथ ले जाने की अनुमति दी, किंतु उनकी आंखों पर पट्टी बांध दी गई ताकि मार्ग का पता न चल सके।
कहा जाता है कि बुद्धिमान विद्यापति ने चलते समय अपने वस्त्र में सरसों के बीज बांध रखे थे। मार्ग में वे धीरे-धीरे उन बीजों को गिराते गए। कुछ समय बाद जब वर्षा हुई तो उन बीजों से पौधे उग आए और मार्ग की पहचान हो गई। अंततः विद्यापति ने नीलमाधव के दर्शन किए और उनके दिव्य तेज को देखकर अभिभूत हो गए। वापस लौटकर उन्होंने राजा इंद्रद्युम्न को पूरी घटना सुनाई।
नीलमाधव के अदृश्य होने की कथा
नीलमाधव के विषय में सुनकर राजा इंद्रद्युम्न स्वयं उस स्थान पर पहुंचे। किंतु जब वे वहां पहुंचे तो नीलमाधव का विग्रह अदृश्य हो चुका था। राजा अत्यंत दुखी हो गए और उन्होंने भगवान विष्णु की कठोर आराधना आरंभ कर दी। कई वर्षों तक तपस्या करने के बाद भगवान विष्णु ने उन्हें स्वप्न में दर्शन दिए।
भगवान ने कहा कि समुद्र तट पर एक दिव्य दारु अर्थात पवित्र काष्ठ का विशाल लट्ठा प्रकट होगा। उसी से उनका नया विग्रह तैयार किया जाए। भगवान की आज्ञा पाकर राजा इंद्रद्युम्न ने समुद्र तट की ओर प्रस्थान किया। कुछ समय बाद समुद्र की लहरों के साथ एक दिव्य काष्ठ का विशाल खंड तट पर आ लगा। इसे दारु-ब्रह्म कहा गया।
दिव्य काष्ठ से मूर्ति बनाने का प्रयास
राजा ने उस दिव्य काष्ठ से भगवान की प्रतिमा बनाने के लिए अनेक कुशल शिल्पियों को बुलाया। किंतु आश्चर्य की बात यह थी कि कोई भी शिल्पकार उस लकड़ी पर उपकरण नहीं चला सका। सभी प्रयास असफल हो गए, तभी एक वृद्ध बढ़ई राजसभा में आया। उसने कहा कि वह इस काष्ठ से भगवान की प्रतिमा बना सकता है, लेकिन उसकी एक शर्त है।
वह एक बंद कक्ष में अकेले रहकर मूर्तियों का निर्माण करेगा और जब तक कार्य पूरा न हो जाए, तब तक कोई भी द्वार नहीं खोलेगा। राजा इंद्रद्युम्न ने उसकी शर्त स्वीकार कर ली। पौराणिक मान्यता के अनुसार वह वृद्ध बढ़ई वास्तव में देवशिल्पी विश्वकर्मा थे, जो स्वयं भगवान की प्रेरणा से वहां पहुंचे थे।
विश्वकर्मा ने रखी थी 21 दिनों की शर्त
पौराणिक कथा के अनुसार विश्वकर्मा ने कहा कि उन्हें मूर्तियों के निर्माण के लिए 21 दिन चाहिए। इस अवधि में यदि किसी ने द्वार खोला तो कार्य अधूरा रह जाएगा और वे तुरंत वहां से चले जाएंगे। इसके बाद वे कक्ष के भीतर चले गए और बाहर से द्वार बंद कर दिया गया। प्रारंभिक दिनों में भीतर से लकड़ी काटने और मूर्तियां गढ़ने की आवाजें आती रहीं।
राजा और रानी धैर्यपूर्वक प्रतीक्षा करते रहे। कुछ दिनों बाद अचानक भीतर से कोई ध्वनि आना बंद हो गई। कई दिन बीत गए, लेकिन कोई आवाज सुनाई नहीं दी। इससे रानी गुंडिचा चिंतित हो गईं। उन्हें लगा कि वृद्ध शिल्पकार कहीं अस्वस्थ तो नहीं हो गया या फिर उसकी मृत्यु तो नहीं हो गई।
रानी की चिंता बनी मूर्ति के अधूरे रहने का कारण
रानी ने राजा इंद्रद्युम्न से आग्रह किया कि कक्ष का द्वार खोलकर भीतर की स्थिति देखी जाए। राजा पहले तो तैयार नहीं हुए, क्योंकि उन्हें विश्वकर्मा की शर्त याद थी। किंतु रानी के बार-बार अनुरोध करने पर अंततः उन्होंने द्वार खुलवाने का निर्णय ले लिया।
जब कक्ष का द्वार खोला गया तो भीतर का दृश्य देखकर सभी आश्चर्यचकित रह गए। वहां भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा की प्रतिमाएं मौजूद थीं, लेकिन उनके हाथ-पैर पूर्ण रूप से निर्मित नहीं हुए थे। मूर्तियों का निर्माण अभी अधूरा था। उसी समय विश्वकर्मा वहां से अदृश्य हो गए। क्योंकि उनकी शर्त का उल्लंघन हो चुका था, इसलिए वे कार्य अधूरा छोड़कर चले गए।
भगवान ने अधूरे स्वरूप में ही रहने की इच्छा व्यक्त की
मूर्ति अधूरी देखकर राजा इंद्रद्युम्न अत्यंत दुखी हुए। उन्हें लगा कि उनकी अधीरता के कारण भगवान का विग्रह पूर्ण नहीं बन सका। वे पश्चाताप करने लगे और भगवान विष्णु से क्षमा मांगने लगे, तभी भगवान ने उन्हें दर्शन देकर कहा कि चिंता करने की आवश्यकता नहीं है। उन्होंने बताया कि यही उनका इच्छित स्वरूप है और कलियुग में वे इसी रूप में पूजे जाना चाहते हैं। भगवान ने राजा को निर्देश दिया कि इन्हीं प्रतिमाओं की विधिपूर्वक स्थापना की जाए। इसके बाद जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा की मूर्तियों को मंदिर में प्रतिष्ठित किया गया और नियमित पूजा आरंभ हुई।
जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा के स्वरूप का वर्णन
पुरी की परंपरा के अनुसार भगवान जगन्नाथ का विग्रह काले रंग का, बलभद्र का श्वेत रंग का तथा देवी सुभद्रा का पीतवर्ण माना जाता है। तीनों प्रतिमाएं काष्ठ से निर्मित हैं और इनका स्वरूप अन्य हिंदू मंदिरों में स्थापित पत्थर या धातु की प्रतिमाओं से अलग है। भगवान जगन्नाथ की विशाल गोल आंखें, चौड़ा मुख और अधूरे हाथ-पैर उनके स्वरूप की विशेष पहचान माने जाते हैं। यही कारण है कि उनका विग्रह संसार में अद्वितीय माना जाता है।
(Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी ज्योतिषीय, पौराणिक और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है तथा केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है। अधिक जानकारी के लिए कृपया संबंधित विषय के विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य करें।)