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Bhishma Pitamah Story: भीष्म पितामह को कैसे मिला इच्छा मृत्यु का वरदान, जानें महाभारत में उनकी अहम भूमिका

जीवांजलि, धर्म डेस्कPublished by:
निधि यादव
सार

Bhishma Pitamah In Mahabharat: भीष्म कुरु वंश के राजा शांतनु और नदी देवी गंगा के आठवें पुत्र थे। संस्कृत में, "भीष्म" नाम का अर्थ है "वह जो कोई कठिन प्रतिज्ञा लेता है और उसे दृढ़तापूर्वक पूरा करता है।"

Bhishma Pitamah
Bhishma Pitamah Ke Mata Pita Kaun The:  भीष्म पितामह का जीवन त्याग, पराक्रम और धर्म की एक प्रेरक गाथा है। उनकी भीष्म प्रतिज्ञा और महाभारत में उनके अद्वितीय योगदान ने उन्हें भारतीय इतिहास में अमर कर दिया है। उनका जीवन हमें सच्चे धर्म और कर्तव्य का पालन करने की अपार चुनौती और उसे निभाने के महत्व की शिक्षा देता है। भीष्म पितामह की कथा सदियों से भारतीय जनमानस में प्रेरणा का स्रोत रही है और हमें सदैव अपने धर्म और कर्तव्य के प्रति समर्पित रहने के लिए प्रेरित करती रही है।

भीष्म पितामह ने अपने जीवन के माध्यम से यह सिद्ध किया कि धर्म और कर्तव्य का पालन ही जीवन का सर्वोच्च उद्देश्य है। उनके जीवन का प्रत्येक पहलू हमें यह सिखाता है कि जब तक हम अपने कर्तव्यों और धर्म का पालन नहीं करते, जीवन का वास्तविक अर्थ खो जाता है। भीष्म पितामह का जीवन हमें अपने कर्तव्यों और धर्म का पालन करने के लिए प्रेरित करता है, चाहे परिस्थितियाँ कितनी भी कठिन क्यों न हों।

शांतनु और गंगा का मिलन

एक बार राजा शांतनु गंगा नदी के किनारे टहल रहे थे कि तभी उनकी नज़र एक बेहद खूबसूरत स्त्री पर पड़ी। राजा बहुत प्रभावित हुए और उसके पास जाकर पूछा, "हे सुंदरी, आप कौन हैं? और इस नदी के किनारे क्या कर रही हैं?" मैं आपको बहुत पसंद करता हूँ, क्या आप मुझसे विवाह करेंगी? वह सुंदरी गंगा देवी थीं। उन्होंने राजा शांतनु से कहा, "हे राजन, मैं गंगा हूँ। अगर आप मुझसे विवाह करना चाहते हैं, तो आपको एक शर्त माननी होगी। आप मुझसे कभी नहीं पूछेंगे कि मैं क्या कर रही हूँ। अगर आप मुझसे यह प्रश्न पूछेंगे, तो मैं आपको छोड़ दूँगी।

राजा शांतनु ने यह शर्त मान ली और उनका विवाह हो गया। गंगा और शांतनु सुखी जीवन व्यतीत कर रहे थे और उनके कई बच्चे हुए। हालाँकि, जब भी कोई बच्चा पैदा होता, गंगा उसे नदी में बहा देती। राजा शांतनु ने गंगा से कभी नहीं पूछा कि वह ऐसा क्यों करती है, क्योंकि उन्होंने एक वचन दिया था। अपने आठवें बच्चे के जन्म पर, राजा शांतनु बहुत दुखी हुए और उन्होंने गंगा से पूछा, "हे गंगा, तुम हमारे बच्चों को नदी में क्यों डुबो रही हो?" गंगा ने उत्तर दिया, "हे राजन, आपने अपनी प्रतिज्ञा भंग कर दी है। अब मैं आपको सब कुछ बताऊँगी। ये आठों बालक वसुओं के अवतार हैं। इन्हें एक ऋषि ने मनुष्य योनि में जन्म लेने का श्राप दिया था। हालाँकि, मैंने उन्हें इस श्राप से मुक्त करने के लिए नदी में डुबो दिया। अब आठवाँ बालक जीवित रहेगा और आपका पुत्र बनेगा।"

गंगा ने अपने आठवें पुत्र को राजा शांतनु को सौंप दिया और कहा, "यह बालक एक महान योद्धा बनेगा और इसका नाम देवव्रत होगा।" फिर गंगा अपने पुत्र देवव्रत को लेकर उसे शिक्षा देने लगीं। गंगा ने देवव्रत को वेद, शास्त्र और युद्ध कला की शिक्षा दी। जब देवव्रत बड़े हुए, तो गंगा उन्हें राजा शांतनु के पास वापस ले आईं। देवव्रत ने अपनी महान विद्या और क्षमताओं से सभी को प्रभावित किया और उनका नाम 'भीष्म' रखा गया। भीष्म पितामह ने अपने पिता के सम्मान में ब्रह्मचर्य की प्रतिज्ञा ली और कौरवों और पांडवों के इतिहास में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इस प्रकार, गंगा और भीष्म पितामह की कथा हमें अपने वचन और मर्यादा का पालन करने का महत्व सिखाती है, और यह भी कि कैसे माता-पिता अपने बच्चों के लिए सर्वोच्च बलिदान देने को तैयार रहते हैं।
Bhishma Pitamah kon the

गंगा ने अपने सात बच्चों को नदी में क्यों डुबो दिया?

गंगा देवी ने अपने पहले सात बच्चों को जन्म के तुरंत बाद नदी में डुबो दिया था। इसके पीछे एक प्राचीन कथा है। गंगा और शांतनु की ये संतानें वास्तव में आठ वसु थे, जो ऋषि वशिष्ठ के श्राप के कारण मनुष्य योनि में जन्मे थे। वसुओं को उनके श्राप से मुक्त करने के लिए गंगा देवी ने उन्हें नदी में डुबो दिया था।

भीष्म पितामह का पालन-पोषण गंगा देवी ने किया था

गंगा देवी ने शांतनु को बताया कि उनका आठवाँ पुत्र श्राप से मुक्त नहीं हुआ है और इसलिए उसे जीवित रखा गया है। गंगा देवी ने शांतनु की प्रतिज्ञा भंग होने पर उन्हें छोड़ दिया और देवव्रत को अपने साथ ले गईं। उन्होंने भीष्म का पालन-पोषण किया और उन्हें वेद, युद्धकला और नीतिशास्त्र की शिक्षा दी। भीष्म ने परशुराम से युद्धकला सीखी और एक महान योद्धा बने।

गंगा देवी ने भीष्म पितामह को शांतनु को सौंप दिया

कुछ वर्षों बाद, गंगा देवी भीष्म को राजा शांतनु के पास वापस ले आईं। भीष्म ने अपने पिता की सेवा करने और उनके राज्य की रक्षा करने की प्रतिज्ञा ली। भीष्म पितामह अपने धर्म, कर्तव्य और प्रतिज्ञाओं के प्रति अटूट निष्ठा के कारण महाभारत में अमर हो गए।

महाभारत के प्रमुख पात्रों में से एक, भीष्म पितामह अपनी वीरता, धर्मपरायणता और बलिदान के लिए जाने जाते हैं। उनका वास्तविक नाम देवव्रत था और वे कुरु वंश के पराक्रमी राजा शांतनु और गंगा के पुत्र थे। भीष्म पितामह का जीवन भारतीय इतिहास और संस्कृति में एक महत्वपूर्ण स्थान रखता है। हम उनके जन्म, उनकी भीष्म प्रतिज्ञाओं और उनके जीवन के अन्य महत्वपूर्ण पहलुओं पर विस्तार से चर्चा करते हैं।

जन्म और प्रारंभिक जीवन

भीष्म पितामह का जन्म हिमालय पर्वत के निकट हुआ था। उनके पिता, राजा शांतनु, हस्तिनापुर के राजा थे, और उनकी माता, देवी गंगा, स्वयं गंगा नदी का मानव रूप थीं। देवव्रत का पालन-पोषण गंगा ने किया और उन्हें वेदों, शास्त्रों, युद्धकला और नीतिशास्त्र की शिक्षा दी। गंगा ने अपने पुत्र को शस्त्र, नीतिशास्त्र और धर्म के ज्ञान में पारंगत बनाया। युवा देवव्रत ने परशुराम और बृहस्पति जैसे महान गुरुओं से शिक्षा प्राप्त की।

देवव्रत का बचपन अपार प्रेम और संरक्षण में बीता। देवी गंगा ने उन्हें जीवन में धर्म का पालन करने का महत्व सिखाया और यह भी कि एक योद्धा को न केवल शारीरिक रूप से, बल्कि मानसिक रूप से भी मजबूत होना चाहिए। उन्होंने देवव्रत को सभी प्रकार की युद्धकलाओं का प्रशिक्षण दिया, जिससे वह एक उत्कृष्ट योद्धा बन गए। अपने गुरुओं के साथ रहते हुए, देवव्रत ने धर्म, राजनीति और शासन कला में निपुणता प्राप्त की।

देवव्रत के जीवन में उस समय एक महत्वपूर्ण मोड़ आया जब उनके पिता, राजा शांतनु, एक मछुआरे की पुत्री मत्स्यगंधा (सत्यवती) से विवाह करना चाहते थे। सत्यवती के पिता ने शर्त रखी कि उनकी पुत्री का पुत्र हस्तिनापुर का अगला राजा बनेगा। देवव्रत, जो पहले से ही सिंहासन के उत्तराधिकारी थे, ने अपने पिता की खुशी और हस्तिनापुर के भविष्य के लिए एक महान त्याग किया।

राजा शांतनु अपने पुत्र देवव्रत से बहुत प्रेम करते थे। जब उन्होंने सत्यवती के पिता की स्थिति सुनी, तो वे बहुत दुखी हुए। देवव्रत ने अपने पिता की पीड़ा को समझा और हस्तिनापुर की स्थिरता सुनिश्चित करने के लिए एक कठोर प्रतिज्ञा ली। उन्होंने आजीवन ब्रह्मचारी रहने और हस्तिनापुर के सिंहासन पर कभी दावा न करने की प्रतिज्ञा की। इस कठोर प्रतिज्ञा के कारण, उन्हें "भीष्म" कहा गया, जिसका अर्थ है "कठोर प्रतिज्ञा वाला"।

इस प्रतिज्ञा के बाद, देवव्रत भीष्म के नाम से प्रसिद्ध हुए। इस प्रतिज्ञा का न केवल उनके व्यक्तिगत जीवन पर, बल्कि संपूर्ण हस्तिनापुर पर भी गहरा प्रभाव पड़ा। राजा शांतनु ने भीष्म को अपनी इच्छा से मृत्यु का वरदान दिया था। इस प्रकार, भीष्म पितामह ने अपना पूरा जीवन अपने पिता की प्रसन्नता और राज्य की भलाई के लिए समर्पित कर दिया।

भीष्म का योगदान

भीष्म पितामह ने अपनी प्रतिज्ञा का पालन करते हुए अपना पूरा जीवन हस्तिनापुर की सेवा में समर्पित कर दिया। उन्होंने अनेक युद्धों में अपनी वीरता का परिचय दिया और राज्य के मामलों में एक निष्पक्ष और धर्मनिष्ठ सलाहकार बने रहे। भीष्म ने कुरु वंश के अनेक राजाओं के शासन को देखा और सभी परिस्थितियों में अपने धर्म और प्रतिज्ञाओं का पालन किया।

भीष्म का जीवन एक आदर्श योद्धा, एक आदर्श पुत्र और एक आदर्श नागरिक का उदाहरण है। उन्होंने अपने राज्य की सेवा में कभी कोई कमी नहीं आने दी। उन्होंने अपने जीवन का प्रत्येक क्षण हस्तिनापुर को एक स्थिर और सुदृढ़ राज्य बनाने में समर्पित कर दिया। अपनी बुद्धि, युद्ध कौशल और नीति-ज्ञान से भीष्म ने राज्य को कई संकटों से बचाया और उसे समृद्धि प्रदान की।

 

Bhishma Pitamah ko mila kon sa vardaan

महाभारत में भीष्म की भूमिका

महाभारत युद्ध में भीष्म पितामह का योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण था। वे कौरव पक्ष के सेनापति बने, हालाँकि पांडवों के प्रति उनके मन में स्नेह और सम्मान भी था। उन्होंने अपने धर्म और कर्तव्य का पालन करते हुए युद्ध में भाग लिया। कुरुक्षेत्र के युद्ध में भीष्म ने अपने अद्वितीय युद्ध कौशल का प्रदर्शन किया और पांडवों को कई बार पराजित किया।

युद्ध के दौरान, भीष्म पितामह ने स्पष्ट कर दिया कि वे केवल अपने कर्तव्य पालन के लिए लड़ रहे हैं, किसी व्यक्तिगत द्वेष के कारण नहीं। उनके लिए धर्म सर्वोपरि था, और उन्होंने अपने जीवन के अंतिम क्षण तक अपने धर्म का पालन किया। भीष्म पितामह की युद्ध कला और रणनीति अद्वितीय थी, जिससे कौरव सेना को बहुत लाभ हुआ।

भीष्म की मृत्यु 

भीष्म पितामह को इच्छा मृत्यु का वरदान प्राप्त था, जिसका अर्थ था कि वे अपनी इच्छा से मर सकते थे। युद्ध के दसवें दिन, पांडवों की योजना और शिखंडी की सहायता से, अर्जुन ने भीष्म पर अनेक बाणों की वर्षा की। भीष्म पितामह बाणों की शय्या पर लेटे रहे, लेकिन उन्होंने महाभारत युद्ध समाप्त होने तक मृत्यु को स्वीकार करने से इनकार कर दिया।

बाणों की शय्या पर लेटे हुए भीष्म पितामह ने अपने अंतिम क्षणों में युधिष्ठिर को धर्म, नीति और राजव्यवस्था की शिक्षाएँ दीं। उन्होंने युधिष्ठिर को समझाया कि एक राजा को अपनी प्रजा के प्रति क्या कर्तव्य निभाने चाहिए और एक आदर्श राज्य की स्थापना कैसे करनी चाहिए। उनकी शिक्षाएँ आज भी नीतिशास्त्र में महत्वपूर्ण मानी जाती हैं।

युद्ध समाप्त होने के बाद, भीष्म पितामह ने स्वेच्छा से मृत्यु को स्वीकार कर लिया। उनके निधन के साथ ही महाभारत का एक महत्वपूर्ण अध्याय समाप्त हो गया, लेकिन उनके जीवन की कहानी और उनकी शिक्षाएँ सदियों तक लोगों को प्रेरित करती रहेंगी।

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Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी ज्योतिषीय, पौराणिक और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है तथा केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है। अधिक जानकारी के लिए कृपया संबंधित विषय के विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य करें।

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