Jagannath Rath Yatra पुरी की जगन्नाथ रथ यात्रा भारत के सबसे प्राचीन और भव्य धार्मिक उत्सवों में गिनी जाती है। इस यात्रा का सबसे बड़ा आकर्षण यह होता है कि वर्षभर श्रीमंदिर के गर्भगृह में विराजमान भगवान जगन्नाथ, उनके बड़े भाई बलभद्र और बहन देवी सुभद्रा केवल इसी अवसर पर मंदिर से बाहर निकलकर अपने भक्तों को दर्शन देते हैं। यही कारण है कि करोड़ों श्रद्धालु हर वर्ष इस यात्रा की प्रतीक्षा करते हैं, लेकिन प्रश्न यह है कि भगवान जगन्नाथ साल में केवल एक बार ही मंदिर से बाहर क्यों आते हैं? इसके पीछे केवल परंपरा ही नहीं, बल्कि स्कंद पुराण, ब्रह्म पुराण और स्थानीय उड़िया परंपराओं में वर्णित एक अत्यंत रोचक पौराणिक कथा भी जुड़ी हुई है। इसी कथा के कारण रथ यात्रा का आयोजन होता है और भगवान स्वयं अपने भक्तों के बीच आते हैं।
रथ यात्रा का प्रारंभ कैसे हुआ?
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार भगवान जगन्नाथ का श्रीमंदिर उनका स्थायी निवास माना जाता है। वर्षभर भगवान वहीं विराजमान रहते हैं और नियमित रूप से उनकी पूजा-अर्चना होती है, लेकिन आषाढ़ शुक्ल द्वितीया के दिन भगवान अपने भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा के साथ मंदिर से बाहर निकलकर गुंडिचा मंदिर की यात्रा करते हैं। इसी यात्रा को जगन्नाथ रथ यात्रा कहा जाता है। धार्मिक ग्रंथों के अनुसार भगवान का यह बाहर आना कोई साधारण भ्रमण नहीं, बल्कि एक विशेष लीला है, जिसके पीछे माता की इच्छा, भक्तों की प्रार्थना और भगवान का वचन जुड़ा हुआ है।
भगवान कृष्ण की द्वारका लीला से जुड़ी है यह कथा
पौराणिक कथा के अनुसार एक बार द्वारका में माता रोहिणी भगवान श्रीकृष्ण के वृंदावन काल की लीलाओं का वर्णन कर रही थीं। उस समय माता रोहिणी ने सुभद्रा को द्वार पर पहरा देने के लिए कहा, ताकि कोई भीतर प्रवेश न कर सके, क्योंकि यह अत्यंत गोपनीय कथा थी। उसी समय भगवान श्रीकृष्ण और बलराम वहां पहुंचे। सुभद्रा ने उन्हें रोकने का प्रयास किया, लेकिन तीनों वहीं द्वार पर खड़े होकर कथा सुनने लगे।
जैसे-जैसे वृंदावन की रासलीला, गोपियों का प्रेम और श्रीकृष्ण के बाल रूप का वर्णन आगे बढ़ता गया, वैसे-वैसे तीनों भाव-विभोर होते गए। कहा जाता है कि उस दिव्य प्रेम और विरह की अनुभूति में भगवान श्रीकृष्ण, बलराम और सुभद्रा के शरीर भावावेश में बदलने लगे। उनके हाथ-पांव शरीर के भीतर समा गए और उनका स्वरूप गोलाकार एवं विशिष्ट हो गया।
उसी समय देवर्षि नारद वहां पहुंचे। उन्होंने भगवान के इस अद्भुत रूप के दर्शन किए और प्रार्थना की कि यह दिव्य स्वरूप कलियुग के भक्तों को भी देखने का सौभाग्य मिले। भगवान ने नारद की प्रार्थना स्वीकार कर ली और कहा कि कलियुग में वे इसी स्वरूप में जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा के रूप में नीलांचल धाम में विराजमान होंगे। इसी कारण आज भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा की प्रतिमाएं उसी विशेष स्वरूप में स्थापित हैं।
गुंडिचा मंदिर जाने के पीछे क्या है पौराणिक मान्यता?
रथ यात्रा का सबसे महत्वपूर्ण भाग भगवान का गुंडिचा मंदिर जाना है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार गुंडिचा मंदिर को भगवान की मौसी का घर माना जाता है, इसलिए वर्ष में एक बार भगवान अपने भाई और बहन के साथ अपनी मौसी के घर जाते हैं और वहां सात दिनों तक विश्राम करते हैं। एक अन्य मान्यता के अनुसार गुंडिचा मंदिर वही स्थान है जहां राजा इंद्रद्युम्न ने भगवान जगन्नाथ की स्थापना से पहले विशेष यज्ञ और तपस्या की थी। इसी कारण भगवान प्रत्येक वर्ष वहां जाकर उस स्थान को पवित्र करते हैं। धार्मिक परंपरा में यह यात्रा भगवान के उस वचन का भी प्रतीक मानी जाती है, जिसमें उन्होंने कहा था कि वे समय-समय पर अपने भक्तों के बीच स्वयं आएंगे।
राजा इंद्रद्युम्न और भगवान जगन्नाथ की कथा
स्कंद पुराण में वर्णित कथा के अनुसार मालवा के राजा इंद्रद्युम्न भगवान विष्णु के परम भक्त थे। उन्होंने एक दिन नीलमाधव नाम से पूजे जाने वाले भगवान विष्णु के दिव्य स्वरूप के बारे में सुना। राजा ने अपने पुरोहित विद्यापति को उस दिव्य विग्रह की खोज में भेजा। अनेक कठिनाइयों के बाद विद्यापति ने नीलमाधव के दर्शन किए, लेकिन जब राजा स्वयं वहां पहुंचे तो भगवान अंतर्धान हो चुके थे।
राजा अत्यंत दुखी हुए, तब आकाशवाणी हुई कि समुद्र तट पर दिव्य दारु अर्थात पवित्र लकड़ी का एक विशाल खंड मिलेगा। उसी से भगवान की प्रतिमा बनाई जाए। कुछ समय बाद समुद्र से दिव्य काष्ठ प्राप्त हुआ, तब भगवान विश्वकर्मा वृद्ध बढ़ई का रूप धारण कर राजा के पास पहुंचे। उन्होंने एक शर्त रखी कि जब तक मूर्तियां बन रही होंगी, तब तक कोई भी कक्ष का द्वार नहीं खोलेगा। राजा ने यह शर्त स्वीकार कर ली।
अधूरी प्रतिमाओं का रहस्य
कई दिनों तक कक्ष के भीतर से किसी प्रकार की आवाज नहीं आई। रानी गुंडिचा को चिंता हुई कि कहीं वृद्ध शिल्पी के साथ कोई अनहोनी तो नहीं हो गई। उन्होंने राजा से द्वार खोलने का आग्रह किया। राजा ने अंततः द्वार खुलवा दिया। जैसे ही द्वार खुला, वृद्ध शिल्पी वहां से अदृश्य हो गए। कक्ष में भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा की प्रतिमाएं स्थापित थीं, लेकिन उनके हाथ-पांव पूर्ण रूप से निर्मित नहीं हुए थे। राजा को अपनी भूल का अत्यंत दुख हुआ, तभी आकाशवाणी हुई कि यही भगवान का इच्छित स्वरूप है और कलियुग में इसी रूप की पूजा होगी। आज भी जगन्नाथ मंदिर में भगवान की वही अधूरी प्रतीत होने वाली प्रतिमाएं विराजमान हैं, जिन्हें पूर्ण और दिव्य माना जाता है।
साल में केवल एक बार ही बाहर क्यों आते हैं भगवान?
धार्मिक परंपरा के अनुसार भगवान जगन्नाथ वर्षभर श्रीमंदिर में विराजमान रहते हैं। मंदिर के गर्भगृह को उनका स्थायी निवास माना जाता है। केवल आषाढ़ शुक्ल द्वितीया के दिन वे अपने भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा के साथ रथ पर आरूढ़ होकर बाहर निकलते हैं। पौराणिक मान्यता है कि भगवान ने देवर्षि नारद को वचन दिया था कि वे कलियुग में वर्ष में एक बार स्वयं अपने भक्तों के बीच जाएंगे, ताकि वे भक्त भी उनके दर्शन कर सकें जो किसी कारणवश मंदिर के गर्भगृह तक नहीं पहुंच पाते। इसी कारण रथ यात्रा के दौरान भगवान स्वयं मंदिर से बाहर निकलते हैं और नगर भ्रमण करते हुए गुंडिचा मंदिर तक जाते हैं। इस दिन भगवान के दर्शन को अत्यंत दुर्लभ और पुण्यदायी माना गया है।
रथ यात्रा के दौरान भगवान के तीनों रथ
भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा तीन अलग-अलग रथों में यात्रा करते हैं। प्रत्येक रथ का अपना नाम और स्वरूप है। इन रथों का निर्माण प्रत्येक वर्ष नए पवित्र वृक्षों की लकड़ी से किया जाता है। परंपरा के अनुसार पुराने रथों का पुनः उपयोग नहीं किया जाता।
- भगवान बलभद्र का रथ 'तालध्वज' कहलाता है।
- देवी सुभद्रा का रथ 'दर्पदलन' या 'देवदलन' के नाम से जाना जाता है।
- भगवान जगन्नाथ का रथ 'नंदीघोष' कहलाता है।
गुंडिचा मंदिर में सात दिन का प्रवास