Jagannath Rath Yatra Rules: हर वर्ष आषाढ़ शुक्ल द्वितीया के दिन निकलने वाली भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा विश्व के सबसे बड़े और प्राचीन धार्मिक आयोजनों में गिनी जाती है। ओडिशा के पुरी धाम में आयोजित होने वाली यह यात्रा केवल एक उत्सव नहीं, बल्कि सदियों पुरानी परंपराओं, शास्त्रीय मान्यताओं और कठोर नियमों का पालन करने वाला धार्मिक अनुष्ठान है। इस दिन भगवान जगन्नाथ, बड़े भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा अपने-अपने भव्य रथों पर विराजमान होकर श्रीमंदिर से गुंडिचा मंदिर तक यात्रा करते हैं, लेकिन क्या आपको पता है कि आखिर भगवान के रथ को कौन खींच सकता है? क्या इसके लिए कोई विशेष पात्रता होती है या कोई भी श्रद्धालु इस सेवा का भागीदार बन सकता है? इसके साथ ही रथयात्रा के दौरान किन धार्मिक नियमों का पालन किया जाता है? आइए जानते हैं इस परंपरा के महत्व के बारे में...
रथयात्रा की शुरुआत कैसे होती है?
रथयात्रा का आरंभ भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और देवी सुभद्रा के गर्भगृह से बाहर आने की विशेष प्रक्रिया से होता है, जिसे 'पहंडी बीजे' कहा जाता है। इस दौरान सेवायत विशेष पारंपरिक शैली में तीनों विग्रहों को कंधों पर लेकर मंदिर के सिंहद्वार तक लाते हैं। इसके बाद भगवान अपने-अपने रथों पर विराजमान होते हैं।
रथ पर विराजमान होने के पश्चात पुरी के गजपति महाराज द्वारा 'छेरा पहाड़ा' की रस्म निभाई जाती है। इस परंपरा के अनुसार राजा स्वर्ण झाड़ू से भगवान के रथ के चारों ओर सफाई करते हैं और सुगंधित जल का छिड़काव करते हैं। यह परंपरा इस बात का प्रतीक मानी जाती है कि भगवान के समक्ष राजा और सामान्य व्यक्ति सभी समान हैं। इसके बाद शंख, घंटा, मृदंग और हरिनाम संकीर्तन के बीच रथयात्रा प्रारंभ होती है।
भगवान जगन्नाथ के तीनों रथों का अपना अलग महत्व
- रथयात्रा में तीन अलग-अलग रथ तैयार किए जाते हैं और प्रत्येक रथ का नाम, आकार, ध्वज तथा सारथी अलग होता है।
- भगवान जगन्नाथ का रथ 'नंदीघोष' कहलाता है। यह तीनों रथों में सबसे बड़ा होता है और इसमें 16 पहिए लगाए जाते हैं।
- भगवान बलभद्र के रथ का नाम 'तालध्वज' है, जिसमें 14 पहिए होते हैं।
- देवी सुभद्रा का रथ 'दर्पदलन' या 'देवदलन' कहलाता है और इसमें 12 पहिए लगाए जाते हैं।
- इन तीनों रथों का निर्माण प्रत्येक वर्ष नए सिरे से निर्धारित पवित्र लकड़ियों से किया जाता है।
- निर्माण कार्य विशेष सेवायतों द्वारा पारंपरिक विधि से किया जाता है और इसमें वर्षों पुरानी परंपराओं का पालन किया जाता है।
क्या कोई भी व्यक्ति भगवान के रथ को खींच सकता है?
रथयात्रा की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता यही है कि भगवान के रथ को खींचने का अधिकार किसी एक जाति, वर्ग, समुदाय या विशेष समूह तक सीमित नहीं है। पुरी की परंपरा के अनुसार भगवान जगन्नाथ के रथ की रस्सी को कोई भी श्रद्धालु श्रद्धा और मर्यादा के साथ पकड़ सकता है। चाहे वह किसी भी प्रदेश, भाषा, जाति, देश या सामाजिक वर्ग से हो, यदि वह भगवान के प्रति श्रद्धा रखता है तो रथ खींचने की सेवा में सम्मिलित हो सकता है। इसी कारण जगन्नाथ रथयात्रा को समावेशी धार्मिक परंपराओं का प्रतीक भी माना जाता है। लाखों श्रद्धालु हर वर्ष रथ की रस्सी पकड़ने के लिए पुरी पहुंचते हैं और इसे अत्यंत पुण्यदायी सेवा मानते हैं। हालांकि रथ को खींचने की प्रक्रिया मंदिर प्रशासन, सेवायतों और सुरक्षा व्यवस्था की देखरेख में होती है। भीड़ अधिक होने पर श्रद्धालुओं को निर्धारित स्थानों से ही रस्सी पकड़ने की अनुमति दी जाती है।
रथ की रस्सी को लेकर क्या है धार्मिक मान्यता?
जगन्नाथ परंपरा में रथ की रस्सी को भी अत्यंत पवित्र माना गया है। जब भगवान रथ पर विराजमान होकर नगर भ्रमण के लिए निकलते हैं, तब भक्त उसी रस्सी के माध्यम से भगवान की सेवा करते हैं। मान्यता है कि रथ को आगे बढ़ाने का वास्तविक कार्य भगवान की इच्छा से होता है और भक्त केवल सेवा का माध्यम बनते हैं। इसी कारण रथ को खींचने से पहले श्रद्धालु भगवान का स्मरण करते हैं और पूरी श्रद्धा के साथ रस्सी पकड़ते हैं। रथयात्रा के दौरान रस्सी को खींचना केवल शारीरिक कार्य नहीं, बल्कि भगवान की यात्रा में सहभागी बनने का अवसर माना जाता है।
रथयात्रा के दौरान किन नियमों का पालन किया जाता है?
- रथयात्रा केवल रथ खींचने का आयोजन नहीं है, बल्कि यह निश्चित धार्मिक विधियों के अनुसार संपन्न होने वाला अनुष्ठान है।
- रथयात्रा प्रारंभ होने से पहले तीनों भगवानों की विशेष पूजा की जाती है।
- गजपति महाराज द्वारा छेरा पहाड़ा की परंपरा पूरी होने के बाद ही रथ आगे बढ़ाया जाता है।
- पहले भगवान बलभद्र का रथ चलता है।
- इसके बाद देवी सुभद्रा का रथ आगे बढ़ता है।
- सबसे अंत में भगवान जगन्नाथ का रथ प्रस्थान करता है।
क्या रथयात्रा के दौरान रथ को बीच में रोका भी जाता है?
पुरी की रथयात्रा में कई स्थानों पर रथ स्वाभाविक रूप से रुकता है। अनेक बार भारी भीड़ और धार्मिक अनुष्ठानों के कारण भी यात्रा कुछ समय के लिए रोक दी जाती है। मान्यता है कि रथ तभी आगे बढ़ता है जब भगवान की इच्छा होती है। कई बार लाखों लोगों के प्रयास के बाद भी रथ तुरंत नहीं चलता और कुछ समय बाद स्वयं आगे बढ़ने लगता है। इसे जगन्नाथ परंपरा में भगवान की लीला के रूप में देखा जाता है।
गुंडिचा मंदिर तक पहुंचने का क्या महत्व है?
रथयात्रा के दौरान भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और देवी सुभद्रा श्रीमंदिर से लगभग तीन किलोमीटर दूर स्थित गुंडिचा मंदिर पहुंचते हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार गुंडिचा मंदिर को भगवान की मौसी का घर भी कहा जाता है। तीनों देवता यहां सात दिनों तक विराजमान रहते हैं। इस अवधि में भक्तों को गुंडिचा मंदिर में भगवान के दर्शन करने का अवसर मिलता है। सात दिन पूर्ण होने के बाद भगवान पुनः रथों पर सवार होकर श्रीमंदिर लौटते हैं। इस वापसी यात्रा को 'बहुदा यात्रा' कहा जाता है।
क्या रथयात्रा में सभी भक्तों को भगवान के दर्शन मिलते हैं?
सामान्य दिनों में पुरी श्रीमंदिर में केवल सनातन धर्मावलंबियों के प्रवेश की परंपरा है, लेकिन रथयात्रा के दिन भगवान स्वयं मंदिर से बाहर निकलकर नगर भ्रमण करते हैं। इसी कारण देश-विदेश से आने वाले लाखों श्रद्धालु सड़क पर खड़े होकर भगवान के दर्शन करते हैं। भगवान रथ पर विराजमान होकर सभी भक्तों को दर्शन देते हैं और यही रथयात्रा की सबसे बड़ी विशेषता मानी जाती है।
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(Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी ज्योतिषीय, पौराणिक और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है तथा केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है। अधिक जानकारी के लिए कृपया संबंधित विषय के विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य करें।)