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Lord Jagannath: आखिर किस भक्त की पीड़ा भोगते हैं भगवान जगन्नाथ? पौराणिक कथा से जानें अनासर काल का रहस्य

जीवांजलि, धर्म डेस्कPublished by:
Shakshi
सार

Lord Jagannath: ज्येष्ठ पूर्णिमा पर भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और देवी सुभद्रा का भव्य स्नान उत्सव आयोजित होता है। इस दिन 108 पवित्र कलशों के जल से भगवान का अभिषेक किया जाता है। 

lord jagannath
Lord Jagannath: पुरी धाम में भगवान जगन्नाथ की वार्षिक रथयात्रा जितनी प्रसिद्ध है, उतना ही रहस्यमयी उनका अनासर काल भी माना जाता है। ज्येष्ठ पूर्णिमा के दिन होने वाली स्नान पूर्णिमा के बाद भगवान जगन्नाथ, बड़े भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा को अत्यधिक स्नान कराया जाता है। मान्यता है कि 108 कलशों से दिव्य स्नान के बाद तीनों विग्रह अस्वस्थ हो जाते हैं और लगभग 15 दिनों के लिए एकांतवास में चले जाते हैं। इस अवधि को अनासर काल कहा जाता है। इन दिनों मंदिर के गर्भगृह के द्वार श्रद्धालुओं के लिए बंद रहते हैं और भगवान का विशेष उपचार किया जाता है।

अनासर काल को लेकर कई पौराणिक कथाएं प्रचलित हैं, लेकिन उनमें एक कथा ऐसी भी है जिसमें बताया गया है कि भगवान जगन्नाथ स्वयं अपने एक परम भक्त की पीड़ा को अपने ऊपर ले लेते हैं। इसी कारण वे अस्वस्थ होकर विश्राम करते हैं। यह कथा भगवान और भक्त के अद्भुत संबंध को दर्शाने वाली मानी जाती है और पुरी की परंपराओं में विशेष महत्व रखती है।

अनासर काल क्या होता है?

ज्येष्ठ पूर्णिमा पर भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और देवी सुभद्रा का भव्य स्नान उत्सव आयोजित होता है। इस दिन 108 पवित्र कलशों के जल से भगवान का अभिषेक किया जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार अत्यधिक स्नान के कारण भगवान को ज्वर हो जाता है। इसके बाद उन्हें अनासर गृह में ले जाया जाता है, जहां वे लगभग पंद्रह दिनों तक विश्राम करते हैं। इस अवधि में मंदिर के नियमित दर्शन बंद रहते हैं। केवल विशेष सेवायत ही भगवान की सेवा करते हैं। उन्हें औषधीय पेय, जड़ी-बूटियों से बने भोग और पारंपरिक आयुर्वेदिक उपचार दिए जाते हैं। रथयात्रा से ठीक पहले नवयौवन दर्शन के दिन भगवान पुनः भक्तों को दर्शन देते हैं।

आखिर किस भक्त की पीड़ा अपने ऊपर लेते हैं भगवान जगन्नाथ?

अनासर काल से जुड़ी लोकमान्यताओं में एक प्रसिद्ध कथा भगवान जगन्नाथ के परम भक्त माधवदास से जुड़ी हुई है। कहा जाता है कि माधवदास भगवान जगन्नाथ के अनन्य भक्त थे। उनका जीवन पूरी तरह भगवान की सेवा और भक्ति में समर्पित था। वे प्रतिदिन मंदिर पहुंचकर प्रभु के दर्शन करते और उनका नाम-स्मरण करते थे। भगवान के प्रति उनका प्रेम इतना गहरा था कि वे अपने सुख-दुख की चिंता किए बिना केवल प्रभु की सेवा में लगे रहते थे।

समय बीतने के साथ एक दिन माधवदास गंभीर ज्वर से पीड़ित हो गए। तेज बुखार और असहनीय पीड़ा के कारण वे चलने-फिरने में भी असमर्थ हो गए। कई दिनों तक वे मंदिर जाकर भगवान के दर्शन नहीं कर सके। उनके लिए सबसे बड़ा दुख बीमारी नहीं, बल्कि भगवान के दर्शन से वंचित होना था। पौराणिक कथा के अनुसार, अपने भक्त की यह स्थिति देखकर भगवान जगन्नाथ अत्यंत करुणामय हो उठे। उन्होंने निश्चय किया कि अपने भक्त का कष्ट वे स्वयं सहन करेंगे। कहा जाता है कि भगवान ने माधवदास का ज्वर अपने ऊपर ले लिया। उसी क्षण भक्त का ताप उतरने लगा और उसकी स्थिति सुधर गई, जबकि भगवान स्वयं ज्वरग्रस्त हो गए। इसी घटना की स्मृति में यह मान्यता बनी कि स्नान पूर्णिमा के बाद भगवान जगन्नाथ स्वयं ज्वर धारण करते हैं और अनासर काल में विश्राम करते हैं। कई श्रद्धालु इस परंपरा को भगवान द्वारा अपने भक्त की पीड़ा स्वीकार करने की दिव्य लीला के रूप में देखते हैं।

भक्त माधवदास की भक्ति का वर्णन

पौराणिक और लोक परंपराओं में माधवदास को ऐसा भक्त बताया गया है, जिसने जीवनभर भगवान जगन्नाथ के चरणों में अटूट श्रद्धा रखी। उनके लिए धन, वैभव या सांसारिक इच्छाओं का कोई महत्व नहीं था। उनका एकमात्र उद्देश्य भगवान की सेवा करना था। कहा जाता है कि जब वे बीमार पड़े तो उन्हें अपने शरीर की पीड़ा से अधिक इस बात का दुख था कि वे भगवान के दर्शन नहीं कर पा रहे हैं। वे लगातार भगवान का स्मरण करते रहे। उनकी यही निष्काम भक्ति भगवान को इतनी प्रिय लगी कि उन्होंने स्वयं भक्त का कष्ट अपने ऊपर ले लिया।

अनासर गृह में कैसे होती है भगवान की सेवा?

जब भगवान जगन्नाथ अनासर गृह में विराजमान होते हैं, तब उनकी सेवा भी सामान्य दिनों से अलग होती है। मंदिर की परंपरा के अनुसार सेवायत भगवान को रोगी के समान मानकर उनकी देखभाल करते हैं। इन दिनों भगवान को भारी भोग नहीं लगाया जाता। उन्हें हल्के और औषधीय गुणों वाले पदार्थ अर्पित किए जाते हैं। आयुर्वेदिक जड़ी-बूटियों से बने पेय, काढ़े, फल तथा विशेष औषधीय प्रसाद भगवान को समर्पित किए जाते हैं। मंदिर की परंपरा के अनुसार भगवान के शरीर पर औषधीय लेप भी लगाया जाता है। मान्यता है कि जैसे किसी रोगी को पूर्ण विश्राम दिया जाता है, उसी प्रकार भगवान भी इस अवधि में एकांत में रहते हैं। इसलिए आम श्रद्धालुओं के दर्शन पूरी तरह बंद रहते हैं।

अनासर काल में दर्शन क्यों नहीं होते?

अनासर काल के दौरान भगवान को विश्राम की अवस्था में माना जाता है, इसलिए मंदिर का गर्भगृह श्रद्धालुओं के लिए बंद कर दिया जाता है। इस अवधि में केवल दैतापति और निर्धारित सेवायत ही भगवान की सेवा कर सकते हैं। धार्मिक मान्यता है कि इस समय भगवान का स्वास्थ्य लाभ चल रहा होता है, इसलिए उन्हें किसी प्रकार का व्यवधान न हो, इसी कारण दर्शन स्थगित रहते हैं।

अलारनाथ मंदिर से भी जुड़ी है मान्यता

जब पुरी श्रीजगन्नाथ मंदिर में भगवान के दर्शन बंद रहते हैं, तब अनेक श्रद्धालु ब्रह्मगिरि स्थित अलारनाथ भगवान के दर्शन करने जाते हैं। मान्यता है कि अनासर काल के दौरान भगवान जगन्नाथ अलारनाथ रूप में भक्तों को दर्शन देते हैं, इसलिए इन दिनों अलारनाथ मंदिर में श्रद्धालुओं की विशेष भीड़ रहती है। पुरी की धार्मिक परंपरा में इसका भी विशेष महत्व माना जाता है।

नवयौवन दर्शन के साथ समाप्त होता है अनासर काल

लगभग पंद्रह दिनों के उपचार और विश्राम के बाद भगवान के स्वास्थ्य लाभ की घोषणा की जाती है। इसके बाद नवयौवन दर्शन का आयोजन होता है। मान्यता है कि इस दिन भगवान पहले की अपेक्षा और अधिक तेजस्वी एवं नवीन रूप में भक्तों को दर्शन देते हैं। सेवायत भगवान का विशेष श्रृंगार करते हैं और इसके अगले दिन से विश्वविख्यात रथयात्रा की तैयारियां अंतिम चरण में पहुंच जाती हैं।

रथयात्रा से पहले क्यों महत्वपूर्ण माना जाता है यह काल?

अनासर काल को रथयात्रा की सबसे महत्वपूर्ण धार्मिक प्रक्रिया माना जाता है। स्नान पूर्णिमा के बाद भगवान विश्राम करते हैं, उपचार ग्रहण करते हैं और फिर नवयौवन धारण कर रथ पर आरूढ़ होकर भक्तों के बीच आते हैं। इसी कारण रथयात्रा केवल एक उत्सव नहीं, बल्कि भगवान की बीमारी, उपचार, स्वास्थ्य लाभ और पुनः भक्तों के दर्शन देने की संपूर्ण परंपरा का अंतिम चरण मानी जाती है।

 
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(Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी ज्योतिषीय, पौराणिक और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है तथा केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है। अधिक जानकारी के लिए कृपया संबंधित विषय के विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य करें।)

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