Kirtimukha Story: पौराणिक कथा के अनुसार भगवान शिव ने कीर्तिमुख को विशेष अधिकार प्रदान करते हुए कहा कि वह मंदिरों और पवित्र स्थलों के प्रवेश द्वारों पर विराजमान रहेगा।
Kirtimukha Story: घरों, मंदिरों और प्राचीन स्थापत्य कला में अक्सर एक उग्र मुखाकृति दिखाई देती है, जिसे कीर्तिमुख कहा जाता है। विशेष रूप से मंदिरों के प्रवेश द्वार, शिखरों, तोरणों और कभी-कभी घरों के मुख्य द्वार पर भी कीर्तिमुख की आकृति स्थापित की जाती है। सनातन परंपरा में इसे केवल एक सजावटी प्रतीक नहीं माना गया है, बल्कि इसके पीछे एक अत्यंत रोचक पौराणिक कथा और धार्मिक मान्यता जुड़ी हुई है। पुराणों में वर्णित कथा के अनुसार स्वयं भगवान शिव ने कीर्तिमुख को विशेष स्थान प्रदान किया था। यही कारण है कि आज भी अनेक धार्मिक स्थलों और भवनों में कीर्तिमुख का मुखौटा लगाया जाता है।
कौन है कीर्तिमुख?
कीर्तिमुख को सिंहमुख के समान उग्र और तेजस्वी मुख वाला दिव्य स्वरूप माना जाता है। इसकी विशेषता यह है कि प्रायः इसकी मूर्तियों में केवल मुख दिखाई देता है, पूरा शरीर नहीं। हिंदू मंदिर वास्तुकला में यह मुख द्वारों, गर्भगृह के ऊपर, शिखरों तथा विभिन्न अलंकरणों में अंकित किया जाता है।
शैव आगमों और पुराणों में कीर्तिमुख को भगवान शिव का प्रिय गण बताया गया है। धार्मिक मान्यता है कि जहां कीर्तिमुख स्थापित होता है, वहां भगवान शिव की कृपा बनी रहती है और नकारात्मक शक्तियां प्रवेश नहीं कर पातीं।
कीर्तिमुख की उत्पत्ति की पौराणिक कथा
कीर्तिमुख की कथा मुख्य रूप से शिवपुराण और अन्य शैव ग्रंथों में वर्णित मिलती है। कथा के अनुसार प्राचीन काल में जलंधर नामक एक अत्यंत पराक्रमी असुर हुआ करता था। उसने अपने बल और तपस्या के प्रभाव से देवताओं तक को पराजित कर दिया था। उसके अभिमान की कोई सीमा नहीं रह गई थी।
जलंधर की ओर से राहु को भगवान शिव के पास दूत बनाकर भेजा गया। राहु ने कैलाश पहुंचकर भगवान शिव के समक्ष जलंधर का संदेश सुनाया। उसने कहा कि देवी पार्वती अत्यंत सुंदर हैं और वे जलंधर के योग्य हैं, इसलिए भगवान शिव उन्हें जलंधर को सौंप दें।
राहु के मुख से यह संदेश सुनते ही भगवान शिव अत्यंत क्रोधित हो गए। देवी पार्वती के विषय में ऐसा अपमानजनक संदेश सुनकर उनके ललाट से भयंकर अग्नि प्रकट हुई। उस अग्नि से एक विकराल और भयंकर जीव उत्पन्न हुआ। उस जीव का स्वरूप इतना उग्र था कि उसे देखकर राहु भयभीत हो गया। उसके विशाल दांत, अग्नि के समान चमकती आंखें और सिंह के समान मुख था। वह जीव राहु को भक्षण करने के लिए उसकी ओर दौड़ा।
राहु की प्रार्थना और शिव की आज्ञा
जब वह भयंकर जीव राहु को खाने के लिए आगे बढ़ा तो राहु भय से कांप उठा। उसने तुरंत भगवान शिव की शरण ली और उनसे रक्षा की प्रार्थना की। राहु ने कहा कि वह केवल दूत बनकर आया है, इसलिए उसे क्षमा प्रदान की जाए। भगवान शिव ने राहु को अभयदान दिया और उस विकराल जीव को आदेश दिया कि वह राहु को न खाए। शिव की आज्ञा सुनकर वह जीव रुक गया, लेकिन उसकी भूख शांत नहीं हुई थी। उसने भगवान शिव से विनम्रतापूर्वक कहा कि वह अत्यंत भूखा है और उसे भोजन चाहिए, तब भगवान शिव ने उसकी परीक्षा लेने का निश्चय किया।
जब शिव ने दिया स्वयं को खाने का आदेश
भगवान शिव ने उस जीव से कहा कि यदि उसे भोजन चाहिए तो वह अपने ही शरीर को खा ले। भगवान की आज्ञा सुनकर उस जीव ने बिना किसी संकोच के उसका पालन करना आरंभ कर दिया। कथा के अनुसार उसने पहले अपने हाथ खाए, फिर पैर खाए और धीरे-धीरे अपने पूरे शरीर को भक्षण कर लिया। अंत में केवल उसका मुख ही शेष रह गया। भगवान शिव उस जीव की आज्ञाकारिता, समर्पण और भक्ति से अत्यंत प्रसन्न हुए। उन्होंने देखा कि उसने बिना किसी प्रश्न के भगवान की आज्ञा का पालन किया और स्वयं को ही खा लिया।
कैसे मिला ‘कीर्तिमुख’ नाम?
उस जीव की अद्भुत भक्ति और समर्पण देखकर भगवान शिव ने उसे आशीर्वाद दिया। उन्होंने कहा कि यद्यपि उसका शरीर समाप्त हो गया है, लेकिन उसका मुख सदा अमर रहेगा। भगवान शिव ने उसे “कीर्तिमुख” नाम प्रदान किया। ‘कीर्ति’ का अर्थ है यश या महिमा और ‘मुख’ का अर्थ है चेहरा। इस प्रकार वह शिवकृपा से कीर्तिमुख कहलाया। भगवान शिव ने घोषणा की कि भविष्य में उनकी पूजा से पहले कीर्तिमुख का सम्मान किया जाएगा। जो व्यक्ति कीर्तिमुख का अनादर करेगा, उसकी पूजा पूर्ण फल प्रदान नहीं करेगी।
मंदिरों के द्वार पर कीर्तिमुख की स्थापना
पौराणिक कथा के अनुसार भगवान शिव ने कीर्तिमुख को विशेष अधिकार प्रदान करते हुए कहा कि वह मंदिरों और पवित्र स्थलों के प्रवेश द्वारों पर विराजमान रहेगा। इसी कारण प्राचीन शिव मंदिरों में गर्भगृह के ऊपर, मुख्य प्रवेश द्वार पर तथा तोरणों में कीर्तिमुख की आकृति अंकित की जाती है। कई मंदिरों में यह देवमूर्तियों के ऊपर भी दिखाई देता है। दक्षिण भारत, उत्तर भारत, नेपाल, कंबोडिया और इंडोनेशिया के अनेक प्राचीन हिंदू मंदिरों में कीर्तिमुख की आकृतियां आज भी देखी जा सकती हैं। मंदिर वास्तुशास्त्र में इसे अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त है।
घर के बाहर कीर्तिमुख का मुखौटा क्यों लगाया जाता है?
धार्मिक मान्यता के अनुसार कीर्तिमुख भगवान शिव की आज्ञा से द्वारपाल के रूप में प्रतिष्ठित है। इसी कारण अनेक लोग अपने घरों, भवनों और प्रतिष्ठानों के मुख्य प्रवेश द्वार पर कीर्तिमुख का मुखौटा या प्रतिमा स्थापित करते हैं।
मान्यता है कि यह मुखाकृति नकारात्मक शक्तियों, दुष्प्रभावों और अशुभ तत्वों को घर में प्रवेश करने से रोकती है। चूंकि कीर्तिमुख स्वयं भगवान शिव द्वारा नियुक्त रक्षक माना जाता है, इसलिए इसे घर के द्वार पर स्थापित करना शुभ समझा जाता है। कई धार्मिक परंपराओं में इसे दुष्ट शक्तियों को भयभीत करने वाला प्रतीक भी माना गया है। इसके उग्र स्वरूप के कारण इसे रक्षक रूप में देखा जाता है।
वास्तु और मंदिर शास्त्र में कीर्तिमुख का स्थान
मंदिर शिल्पशास्त्र और आगम ग्रंथों में कीर्तिमुख का उल्लेख विशेष रूप से मिलता है। शिल्पियों द्वारा मंदिर निर्माण के समय विभिन्न स्थानों पर इसकी आकृति बनाई जाती है। विशेष रूप से प्रवेश द्वार, मंडप, शिखर और देवप्रतिमाओं के ऊपर कीर्तिमुख का अंकन शुभ माना गया है।
कई प्राचीन मंदिरों में इसकी मुखाकृति से पुष्पमालाएं या अलंकरण निकलते हुए भी दिखाए जाते हैं, जो मंदिर कला की विशिष्ट शैली मानी जाती है। भारत की अनेक प्राचीन स्थापत्य परंपराओं में कीर्तिमुख केवल एक सजावटी आकृति नहीं, बल्कि पौराणिक कथा से जुड़ा हुआ धार्मिक प्रतीक माना जाता है।