Garuda Purana: सनातन धर्म के प्रमुख ग्रंथों में वर्णित अनेक कथाएं केवल देवताओं और ऋषियों के जीवन का वर्णन ही नहीं करतीं, बल्कि उन घटनाओं का भी उल्लेख करती हैं जिनका प्रभाव आगे चलकर संपूर्ण सृष्टि पर पड़ा। ऐसी ही एक प्रसिद्ध कथा है महर्षि कश्यप की पत्नियों विनता और कद्रू की, जिसमें ईर्ष्या, छल, दासत्व और गरुड़ के जन्म से जुड़ी महत्वपूर्ण घटनाओं का विस्तार से वर्णन मिलता है। विष्णु पुराण, महाभारत के आदिपर्व तथा अन्य पौराणिक ग्रंथों में इस कथा का उल्लेख मिलता है।
कथा के अनुसार, कद्रू ने अपनी ही बहन विनता को छलपूर्वक पराजित कर उसे दासी बना लिया था। यही घटना आगे चलकर गरुड़ के अमृत लाने के संकल्प और नागों के साथ उनके शत्रुतापूर्ण संबंधों का कारण बनी। आइए जानते हैं कि आखिर कद्रू ने किस प्रकार अपनी बहन विनता के साथ छल किया और क्या है पूरी पौराणिक कथा...
महर्षि कश्यप की पत्नियां थीं विनता और कद्रू
प्रजापति दक्ष की अनेक कन्याओं का विवाह महर्षि कश्यप से हुआ था। इन्हीं में दो प्रमुख पत्नियां थीं- विनता और कद्रू। दोनों अपनी-अपनी संतानों की इच्छा रखती थीं। जब महर्षि कश्यप ने प्रसन्न होकर वरदान मांगने को कहा, तब कद्रू ने एक हजार पराक्रमी पुत्रों का वर मांगा, जबकि विनता ने केवल दो ऐसे पुत्रों की कामना की जो कद्रू के हजारों पुत्रों से भी अधिक तेजस्वी और बलशाली हों। महर्षि कश्यप ने दोनों को उनकी इच्छा के अनुसार वरदान प्रदान किया। कुछ समय बाद कद्रू ने एक हजार अंडे दिए और विनता ने दो अंडे दिए। इन अंडों को विशेष पात्रों में सुरक्षित रखकर उनके परिपक्व होने की प्रतीक्षा की जाने लगी।
कद्रू के अंडों से निकले एक हजार नाग
दीर्घ समय बीतने के बाद सबसे पहले कद्रू के एक हजार अंडों से नाग पुत्रों का जन्म हुआ। इन्हीं नागों में शेषनाग, वासुकि, तक्षक, कर्कोटक और अन्य अनेक प्रसिद्ध नागों का उल्लेख मिलता है। उधर विनता के दोनों अंडों से अभी तक कोई संतान उत्पन्न नहीं हुई थी। अपनी बहन की संतानों को देखकर विनता का धैर्य टूटने लगा और वह अपने पुत्रों के जन्म की प्रतीक्षा में व्याकुल रहने लगी।
अधीरता में विनता ने स्वयं तोड़ दिया पहला अंडा
पौराणिक कथा के अनुसार, लंबे समय तक प्रतीक्षा करने के बाद विनता अपने धैर्य पर नियंत्रण नहीं रख सकीं। उन्होंने एक अंडे को समय से पहले ही तोड़ दिया। अंडे से एक तेजस्वी बालक प्रकट हुआ, लेकिन उसका शरीर पूर्ण विकसित नहीं था। उसके अंग अधूरे थे। वही आगे चलकर अरुण कहलाए, जिन्हें सूर्यदेव का सारथी माना जाता है।
अरुण ने अपनी माता से कहा कि अधीर होकर समय से पहले अंडा तोड़ने के कारण उनका शरीर पूर्ण नहीं बन सका। उन्होंने विनता से कहा कि दूसरे अंडे को किसी भी परिस्थिति में समय से पहले न तोड़ें। उचित समय आने पर उससे एक महान तेजस्वी पुत्र जन्म लेगा। अरुण ने क्रोधित होकर अपनी माता को यह शाप दिया कि उन्हें कुछ समय तक अपनी बहन कद्रू की दासी बनकर रहना पड़ेगा। हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि दूसरे अंडे से उत्पन्न होने वाला उनका पुत्र उन्हें इस दासत्व से मुक्त करेगा।
दूसरे अंडे से हुआ गरुड़ का जन्म
निर्धारित समय पूरा होने पर दूसरे अंडे से दिव्य तेज से युक्त गरुड़ का जन्म हुआ। उनका शरीर अत्यंत विशाल, प्रकाशमान और अद्भुत शक्ति से संपन्न था। उनके जन्म के समय चारों ओर तेज फैल गया और देवता भी उनके पराक्रम को देखकर आश्चर्यचकित हो गए। गरुड़ को जन्म से ही असाधारण बल, वेग और दिव्य सामर्थ्य प्राप्त थी। आगे चलकर वही भगवान विष्णु के वाहन बने।
समुद्र मंथन से प्रकट हुआ दिव्य अश्व उच्चैःश्रवा
समय बीतने के बाद देवताओं और दैत्यों द्वारा समुद्र मंथन किया गया। इस मंथन से अनेक दिव्य रत्नों के साथ एक अत्यंत सुंदर और दिव्य अश्व उत्पन्न हुआ, जिसका नाम उच्चैःश्रवा था। यह घोड़ा पूर्ण रूप से श्वेत वर्ण का था और उसका तेज अद्वितीय बताया गया है। एक दिन कद्रू और विनता ने इस दिव्य अश्व को देखा। उसी समय दोनों बहनों के बीच उसके स्वरूप को लेकर विवाद उत्पन्न हो गया।
घोड़े की पूंछ को लेकर हुई शर्त
कद्रू ने कहा कि उच्चैःश्रवा का शरीर भले ही श्वेत हो, लेकिन उसकी पूंछ काले रंग की है। दूसरी ओर विनता ने स्पष्ट कहा कि पूरा घोड़ा, उसकी पूंछ सहित, पूर्णतः श्वेत है। विवाद बढ़ने पर दोनों ने शर्त लगा ली। यह तय हुआ कि अगले दिन जाकर घोड़े को निकट से देखा जाएगा। जिसकी बात गलत सिद्ध होगी, उसे दूसरी बहन की दासी बनना पड़ेगा। विनता को अपने कथन पर पूरा विश्वास था, क्योंकि उन्होंने घोड़े को श्वेत ही देखा था।
हार के भय से कद्रू ने रचा छल
रात होने पर कद्रू को लगा कि यदि घोड़े की पूंछ वास्तव में श्वेत निकली तो वह शर्त हार जाएंगी। तब उन्होंने अपने नाग पुत्रों को बुलाया और आदेश दिया कि वे अगले दिन सूर्योदय से पहले उच्चैःश्रवा की पूंछ पर लिपट जाएं, जिससे दूर से देखने पर उसकी पूंछ काली दिखाई दे। कद्रू का उद्देश्य केवल किसी भी प्रकार शर्त जीतना था।
कई नागों ने छल करने से किया इनकार
पौराणिक कथा के अनुसार, कद्रू के सभी नाग पुत्र उनकी बात मानने को तैयार नहीं हुए। अनेक नागों ने कहा कि छल और असत्य के सहारे विजय प्राप्त करना उचित नहीं है। अपने पुत्रों की बात सुनकर कद्रू अत्यंत क्रोधित हो गईं। उन्होंने उन नागों को शाप दिया कि भविष्य में राजा जनमेजय के सर्पसत्र यज्ञ में वे अग्नि में भस्म हो जाएंगे। बाद में यही शाप महाभारत काल में राजा जनमेजय के प्रसिद्ध सर्प यज्ञ से जुड़ता है। हालांकि कद्रू के कुछ नाग पुत्रों ने अंततः अपनी माता की आज्ञा स्वीकार कर ली और अगले दिन योजना के अनुसार उच्चैःश्रवा की पूंछ से लिपट गए।
छल के कारण हार गईं विनता
अगले दिन दोनों बहनें उच्चैःश्रवा को देखने पहुंचीं। दूर से देखने पर घोड़े की पूंछ वास्तव में काली दिखाई दे रही थी, क्योंकि उस पर अनेक काले नाग लिपटे हुए थे। विनता ने जब यह दृश्य देखा तो उन्हें लगा कि उनका अनुमान गलत था। उन्होंने शर्त के अनुसार अपनी हार स्वीकार कर ली। वह यह नहीं जान सकीं कि उनके साथ छल किया गया है। इस प्रकार कद्रू ने असत्य और कपट का सहारा लेकर विनता को अपनी दासी बना लिया।
दासी बनकर रहने लगीं विनता
शर्त हारने के बाद विनता को कद्रू की सेवा करनी पड़ी। पौराणिक कथाओं में वर्णन मिलता है कि कद्रू अनेक अवसरों पर विनता से अपनी सेवा करवाती थीं और उन्हें दासी की तरह अपने साथ रखती थीं। गरुड़ जब बड़े हुए तो उन्होंने अपनी माता को इस स्थिति में देखा। उन्होंने विनता से इसके पीछे का कारण पूछा, तब विनता ने पूरी घटना और कद्रू के छल का विस्तार से वर्णन किया। गरुड़ ने उसी समय अपनी माता को दासत्व से मुक्त कराने का संकल्प लिया।
नागों ने रखी अमृत लाने की शर्त
गरुड़ नागों के पास पहुंचे और उनसे पूछा कि उनकी माता को किस प्रकार मुक्त किया जा सकता है। नागों ने कहा कि यदि गरुड़ स्वर्गलोक से देवताओं द्वारा सुरक्षित अमृत कलश लाकर उन्हें सौंप दें, तभी वे विनता को दासत्व से मुक्त करेंगे। गरुड़ ने बिना विलंब इस कठिन कार्य को स्वीकार कर लिया। इसके बाद उन्होंने स्वर्ग की ओर प्रस्थान किया और मार्ग में अनेक दिव्य बाधाओं का सामना किया।
गरुड़ ने प्राप्त किया अमृत कलश
पौराणिक वर्णनों के अनुसार, गरुड़ ने देवताओं से युद्ध किया, अनेक दिव्य अस्त्रों का सामना किया और अपनी अद्भुत शक्ति के बल पर अमृत कलश प्राप्त कर लिया। इसी यात्रा के दौरान भगवान विष्णु गरुड़ के पराक्रम और निष्ठा से अत्यंत प्रसन्न हुए। उन्होंने गरुड़ को अपना वाहन बनने का वर प्रदान किया। वहीं गरुड़ ने भी भगवान विष्णु के प्रति अपनी भक्ति प्रकट की। इसके बाद गरुड़ अमृत कलश लेकर नागों के पास पहुंचे, ताकि अपनी माता को दासत्व से मुक्त करा सकें।
विनता को मिला दासत्व से छुटकारा