Skanda Purana: सनातन धर्म के विभिन्न पुराणों में अनेक ऐसे पात्रों का उल्लेख मिलता है, जिनकी भूमिका देवताओं के कार्यों में अत्यंत महत्वपूर्ण रही, लेकिन जिनकी कथाएं अपेक्षाकृत कम प्रसिद्ध हैं। ऐसे ही एक दिव्य पात्र हैं अरुण देव, जिन्हें भगवान सूर्य के सारथी के रूप में जाना जाता है। प्रतिदिन आकाश में सात घोड़ों वाले सूर्य रथ का संचालन करने वाले अरुण का जन्म भी अत्यंत अद्भुत परिस्थितियों में हुआ था। उनकी जन्म कथा का वर्णन मुख्य रूप से स्कंद पुराण, विष्णु पुराण, महाभारत के आदिपर्व तथा अन्य पौराणिक ग्रंथों में मिलता है। अरुण केवल सूर्यदेव के सारथी ही नहीं हैं, बल्कि वे पक्षीराज गरुड़ के ज्येष्ठ भ्राता भी माने जाते हैं। उनका जन्म समय से पहले हुआ, जिसके कारण उनका शरीर पूर्ण रूप से विकसित नहीं हो पाया। आइए जानते हैं अरुण देव की जन्म की पौराणिक कथा...
महर्षि कश्यप की पत्नियां थीं विनता और कद्रू
सृष्टि के प्रारंभिक काल में प्रजापति दक्ष की अनेक पुत्रियों का विवाह महर्षि कश्यप से हुआ था। इन्हीं में दो प्रमुख पत्नियां थीं- विनता और कद्रू। कद्रू को नागों की माता माना जाता है, जबकि विनता आगे चलकर अरुण और गरुड़ की माता बनीं। एक समय महर्षि कश्यप अपनी पत्नियों से प्रसन्न हुए और उन्हें वरदान मांगने के लिए कहा। कद्रू ने इच्छा व्यक्त की कि उसे एक हजार तेजस्वी पुत्र प्राप्त हों। महर्षि ने उसका वर स्वीकार कर लिया। इसके बाद विनता ने कहा कि वह संख्या में अधिक पुत्र नहीं चाहतीं, बल्कि ऐसे दो पुत्र चाहती हैं जो बल, तेज, पराक्रम और दिव्यता में हजार पुत्रों से भी श्रेष्ठ हों। महर्षि कश्यप ने उन्हें भी यह वरदान प्रदान किया।
अंडों से होने वाली थी संतान की उत्पत्ति
वरदान प्राप्त होने के कुछ समय बाद कद्रू ने एक हजार अंडे दिए, जबकि विनता ने केवल दो अंडे दिए। इन अंडों को सुरक्षित पात्रों में रखकर लंबे समय तक उनके विकसित होने की प्रतीक्षा की जाने लगी। कई वर्षों के पश्चात कद्रू के एक हजार अंडे फूट गए और उनसे अनेक नागों का जन्म हुआ। इनमें शेषनाग, वासुकी, तक्षक, कर्कोटक और अन्य प्रमुख नाग भी शामिल थे। दूसरी ओर विनता के दोनों अंडे अब भी नहीं फूटे थे। समय बीतने के साथ उनके मन में चिंता और अधीरता बढ़ने लगी। उन्हें लगा कि कहीं उनके अंडों में कोई दोष तो नहीं आ गया।
अधीरता में विनता ने तोड़ दिया पहला अंडा
काफी लंबे समय तक प्रतीक्षा करने के बाद भी जब पहला अंडा नहीं फूटा, तब विनता अपने धैर्य पर नियंत्रण नहीं रख सकीं। उन्होंने स्वयं पहला अंडा तोड़ दिया। अंडा टूटते ही उसमें से एक दिव्य बालक प्रकट हुआ। उसके शरीर का ऊपरी भाग पूर्ण रूप से विकसित था, लेकिन कमर से नीचे का भाग अधूरा था। उसके अंग पूर्ण नहीं बने थे, क्योंकि उसका जन्म नियत समय से पहले हो गया था। यही दिव्य बालक आगे चलकर अरुण कहलाए।
अरुण ने माता विनता को दिया शाप
अधूरे शरीर के साथ जन्म लेने के कारण अरुण अपनी माता की अधीरता से अत्यंत दुखी हुए। उन्होंने कहा कि यदि कुछ समय और प्रतीक्षा कर ली जाती तो उनका शरीर पूर्ण विकसित हो जाता। उन्होंने अपनी माता से कहा कि उनकी अधीरता के कारण उन्हें अपूर्ण शरीर प्राप्त हुआ है। इसी कारण उन्होंने विनता को शाप दिया कि उन्हें अपनी सौत कद्रू की दासी बनकर रहना पड़ेगा।
हालांकि अरुण ने यह भी कहा कि यदि दूसरा अंडा समय पूरा होने तक नहीं तोड़ा जाएगा, तो उसमें से जन्म लेने वाला पुत्र अत्यंत शक्तिशाली होगा और वही आगे चलकर उन्हें दासता से मुक्त करेगा। यह सुनकर विनता को अपनी भूल का गहरा पश्चाताप हुआ और उन्होंने दूसरे अंडे को किसी भी परिस्थिति में न छूने का निश्चय किया।
दूसरे अंडे से हुआ पक्षीराज गरुड़ का जन्म
अरुण के जन्म के बाद विनता ने धैर्यपूर्वक दूसरे अंडे के पूर्ण विकसित होने की प्रतीक्षा की। नियत समय आने पर दूसरा अंडा स्वयं फूटा और उसमें से दिव्य तेज से युक्त गरुड़ का जन्म हुआ। उनका शरीर पूर्ण विकसित, अत्यंत विशाल और असाधारण तेजस्वी था। देवताओं ने भी उनके तेज का सम्मान किया। आगे चलकर गरुड़ ने अपनी माता को कद्रू की दासता से मुक्त कराया और भगवान विष्णु के वाहन के रूप में प्रतिष्ठित हुए। इस प्रकार अरुण द्वारा कही गई बात भी सत्य सिद्ध हुई।
विनता कैसे बनीं कद्रू की दासी
समय बीतने पर एक दिन समुद्र मंथन से उत्पन्न दिव्य अश्व उच्चैःश्रवा को देखकर विनता और कद्रू के बीच उसके रंग को लेकर विवाद हो गया। विनता का कहना था कि वह घोड़ा पूर्ण रूप से श्वेत है, जबकि कद्रू ने कहा कि उसकी पूंछ काले रंग की है। दोनों ने शर्त रखी कि जिसकी बात असत्य सिद्ध होगी, वह दूसरी की दासी बनेगी। कद्रू ने अपने नाग पुत्रों को आदेश दिया कि वे घोड़े की पूंछ से लिपटकर उसे काला दिखाई दें। कई नागों ने छल करने से इनकार किया, लेकिन अंततः कुछ नागों ने उसकी आज्ञा का पालन किया। अगले दिन जब दोनों ने उच्चैःश्रवा को देखा तो उसकी पूंछ काली दिखाई दी। इस प्रकार शर्त के अनुसार विनता को कद्रू की दासी बनना पड़ा। यही वह शाप था जिसका उल्लेख अरुण ने अपने जन्म के समय किया था।
अरुण का नाम कैसे पड़ा
संस्कृत में 'अरुण' शब्द का अर्थ लालिमा, उषाकाल की आभा अथवा सूर्योदय से ठीक पहले दिखाई देने वाला लाल प्रकाश माना जाता है। पौराणिक मान्यता के अनुसार जब अरुण का तेज चारों ओर फैला, तब उसकी आभा उगते हुए सूर्य से पहले दिखाई देने वाली लालिमा के समान थी। इसी कारण उनका नाम अरुण पड़ा। आज भी सूर्योदय से पहले पूर्व दिशा में जो लाल रंग की आभा दिखाई देती है, उसे अरुणोदय कहा जाता है और इसे अरुण देव की उपस्थिति का प्रतीक माना जाता है।
सूर्यदेव के सारथी कैसे बने अरुण
अरुण के जन्म के बाद देवताओं ने उनके तेज और तप को देखा। यद्यपि उनका शरीर पूर्ण विकसित नहीं था, लेकिन उनका दिव्य तेज असाधारण था। पौराणिक कथाओं के अनुसार सूर्यदेव का तेज इतना प्रचंड था कि सामान्य देवता भी लंबे समय तक उसका सामना नहीं कर सकते थे। ऐसे में सूर्य के दिव्य रथ का संचालन करने के लिए ऐसे सारथी की आवश्यकता थी, जो उनके तेज को धारण करने की क्षमता रखता हो, तब अरुण को सूर्यदेव के रथ का सारथी नियुक्त किया गया। उन्होंने यह दायित्व स्वीकार किया और प्रतिदिन सूर्यदेव के सात घोड़ों वाले रथ का संचालन करने लगे।
सूर्य के रथ में अरुण की भूमिका
पौराणिक ग्रंथों के अनुसार सूर्य का रथ सात घोड़ों द्वारा संचालित होता है। इन घोड़ों को नियंत्रित करने का कार्य अरुण करते हैं। मान्यता है कि सूर्योदय से पहले अरुण रथ पर विराजमान होकर आगे चलते हैं। उनके प्रकट होने से आकाश में लालिमा फैलती है और उसके बाद सूर्यदेव का उदय होता है। इसी कारण प्रातःकाल की लालिमा को अरुणोदय कहा जाता है। यह समय सूर्य उदय का पूर्व संकेत माना जाता है।
अरुण के पुत्रों का भी मिलता है उल्लेख