Dakshineswar Temple History: दक्षिणेश्वर मंदिर पश्चिम बंगाल के कोलकाता शहर में स्थित एक प्रसिद्ध हिंदू मंदिर है, जो माँ काली को समर्पित है। यह मंदिर नवरत्न शैली में बना है। इस मंदिर में नौ शिखर (गुंबद) हैं, जो इसकी सुंदरता को बढ़ाते हैं।
Dakshineswar Temple History: दक्षिणेश्वर मंदिर पश्चिम बंगाल के कोलकाता शहर में स्थित एक प्रसिद्ध हिंदू मंदिर है, जो माँ काली को समर्पित है। यह मंदिर नवरत्न शैली में बना है। इस मंदिर में नौ शिखर (गुंबद) हैं, जो इसकी सुंदरता को बढ़ाते हैं। यहाँ माँ काली की मूर्ति भगवान शिव के ऊपर खड़ी मुद्रा में दर्शाई गई है, जो उनके "दक्षिण काली" रूप को दर्शाती है।
मुख्य काली मंदिर के अलावा, परिसर में 12 शिव मंदिर भी हैं, जो भगवान शिव को समर्पित हैं। ये मंदिर अर्ध-वृत्ताकार रूप में बने हैं। यहाँ एक भव्य राधा-कृष्ण मंदिर भी स्थित है, जो "नव-नवद्वीप" शैली में बना है। दक्षिणेश्वर मंदिर की एक खास विशेषता यह है कि यहाँ भगवान कृष्ण की एक खंडित मूर्ति की भी पूजा की जाती है, जो आम हिंदू परंपराओं से थोड़ी अलग है क्योंकि आमतौर पर खंडित मूर्तियों की पूजा नहीं की जाती है। लेकिन ऐसा क्यों है, आइए जानें...
इस वजह से होती है टूटी हुई मूर्ति की पूजा
कहते हैं कि जब मंदिर बनकर तैयार हो गया तो जन्माष्टमी के अगले दिन जब राधा-गोविंद मंदिर में भोग लगाने के बाद भगवान कृष्ण को उनके शयन कक्ष में ले जाया जा रहा था, तो मूर्ति जमीन पर गिर गई और मूर्ति का पैर टूट गया। सभी लोग इस घटना को अशुभ कहने लगे और सभी को लगने लगा कि श्री कृष्ण उनसे नाराज हैं। उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि मूर्ति का क्या करें।
पंडित जी ने बताई वजह
ब्राह्मणों की बैठक में यह निर्णय लिया गया कि मूर्ति को जल में विसर्जित कर दिया जाए और उसकी जगह नई मूर्ति ला दी जाए, लेकिन एक ब्राह्मण ने इस बारे में रामकृष्ण परमहंस से परामर्श करने का सुझाव दिया। श्री रामकृष्ण परमहंस का दक्षिणेश्वर मंदिर से गहरा नाता रहा है। जब उनसे इस बारे में पूछा गया तो उन्होंने खुद ही इस खंडित मूर्ति की पूजा जारी रखने का फैसला किया क्योंकि वे इसे भगवान की उपस्थिति का प्रतीक मानते थे। वे मूर्ति की बाहरी स्थिति से ज्यादा उसमें निहित दिव्यता को महत्व देते थे।
श्री रामकृष्ण परमहंस का सुझाव सभी को आया पसंद
उनका मानना था कि भगवान की भक्ति मूर्ति के पूर्ण होने या टूटने से नहीं बल्कि भावना से होती है। उनके अनुसार, यदि भगवान भक्त के हृदय में हैं, तो मूर्ति का पूरा होना या टूटना कोई मायने नहीं रखता। उन्होंने ब्राह्मणों को समझाया कि जब परिवार का कोई सदस्य विकलांग हो जाता है या माता-पिता में से किसी को चोट लग जाती है, तो क्या वे उसे छोड़कर कोई नया सदस्य ले आते हैं? नहीं, बल्कि हम उनकी सेवा करते हैं। परमहंस का यह सुझाव सभी को पसंद आया और फिर उन्होंने तय किया कि मंदिर में श्री कृष्ण की इसी मूर्ति की पूजा की जाएगी। तब से उसी टूटी हुई मूर्ति की पूजा की जाती है। यह भी पढ़ें- Kiradu Mandir: आखिर इस मंदिर में जानें से क्यों डरते हैं लोग, क्या है किराडू मंदिर से जुड़ा श्राप
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