Conch Shell: पुराणों में शंख की उत्पत्ति से जुड़ी एक और कथा शंखचूड़ दानव की है, जो शिव पुराण और अन्य ग्रंथों में वर्णित है। यह कथा सामान्य शंखों की उत्पत्ति का वर्णन करती है।
Conch Shell Origin Story: हिंदू धर्म की पावन परंपराओं में शंख का विशेष स्थान है। मंदिरों में पूजा-अर्चना के समय, आरती के दौरान, यज्ञ-हवन में और देव-दर्शन के अवसर पर शंखनाद गूंज उठता है। भगवान विष्णु के दाहिने हाथ में सुशोभित यह दिव्य आयुध न केवल पूजा का अनिवार्य अंग है, बल्कि इसके मंगलमय नाद से वातावरण पवित्र हो जाता है, लेकिन इस पवित्र शंख की उत्पत्ति का रहस्य क्या है? प्राचीन पुराण ग्रंथों में शंख की दिव्य उत्पत्ति से जुड़ी कई अद्भुत कथाएं वर्णित हैं, जो इसके रहस्य को उजागर करती हैं। इन पौराणिक कथाओं के माध्यम से जानिए कैसे समुद्र की गहराइयों से निकला यह दिव्य शंख भगवान विष्णु और श्रीकृष्ण का प्रिय साथी बना।
समुद्र मंथन से शंख का दिव्य प्राकट्य
पुराणों के अनुसार शंख की उत्पत्ति का एक प्रमुख प्रसंग समुद्र मंथन से जुड़ा है। जब दुर्वासा ऋषि के शाप से देवराज इंद्र लक्ष्मी से वंचित हो गए और दैत्यराज बलि ने तीनों लोकों पर अधिकार कर लिया, तब देवताओं ने भगवान विष्णु की शरण ली। भगवान विष्णु ने देवताओं को सलाह दी कि क्षीर सागर का मंथन करो, उससे अमृत प्राप्त होगा जो देवताओं को अमर बना देगा।
देवताओं और दानवों ने मिलकर मंदराचल पर्वत को मथनी और वासुकी नाग को रस्सी बनाकर क्षीर सागर का मंथन आरंभ किया। मंथन के दौरान पहले महाविष हलाहल निकला, जिसे भगवान शिव ने अपने कंठ में धारण कर लिया। इसके बाद चौदह रत्नों का प्राकट्य हुआ। इन रत्नों में कामधेनु गाय, उच्चैश्रवा घोड़ा, ऐरावत हाथी, कौस्तुभ मणि, पारिजात वृक्ष, रंभा अप्सरा, लक्ष्मी जी, धन्वंतरी, अमृत कलश आदि शामिल थे। इन चौदह रत्नों में शंख भी प्रमुख रूप से प्रकट हुआ। यह शंख पांचजन्य नाम से प्रसिद्ध हुआ। भगवान विष्णु ने इसे अपने दाहिने हाथ में धारण कर लिया। सागर से ही लक्ष्मी जी और शंख दोनों का प्राकट्य हुआ था, इसलिए शंख को लक्ष्मी जी का भाई माना जाता है।
पांचजन्य नाम क्यों पड़ा?
शंख का नाम पांचजन्य क्यों पड़ा, इसके भी कई दिव्य कारण बताए गए हैं। समुद्र मंथन में पांच प्रकार के जीवों ने भाग लिया- सुर, असुर, नाग, गरुड़ और ऋषि-मुनि। इन पांच जनों के सहयोग से उत्पन्न होने के कारण इसे पांचजन्य कहा गया। भगवान विष्णु ने इस दिव्य शंख को अपना प्रमुख आयुध बनाया। जब श्रीकृष्ण अवतार में आए तो यही पांचजन्य उनके हाथ में सुशोभित हुआ। कुरुक्षेत्र के महाभारत युद्ध के आरंभ में भगवान श्रीकृष्ण ने सर्वप्रथम इसी पांचजन्य शंख का नाद किया, जिससे समस्त रणभूमि गूंज उठी।
पंचजन्य शंख की प्राप्ति
पांचजन्य शंख से जुड़ी एक और पौराणिक कथा महाभारत और हरिवंश पुराण में वर्णित है, जो भगवान श्रीकृष्ण की गुरुदक्षिणा से संबंधित है। भगवान बालकृष्ण और बलराम जब संदीपनि ऋषि के आश्रम में शिक्षा ग्रहण कर चुके, तब गुरु ने गुरुदक्षिणा मांगी। संदीपनि ऋषि ने कहा कि उनका पुत्र समुद्र में डूब गया है, उसे वापस लाओ। श्रीकृष्ण और बलराम समुद्र तट पर पहुंचे। समुद्र देव ने उन्हें बताया कि प्रभास क्षेत्र के समुद्र की गहराई में एक महान दैत्य पंचजन रहता है, जो शंख के रूप में निवास करता है। यह दैत्य मनुष्यों को अपना भोजन बनाता है और गुरु पुत्र को भी उसने निगल लिया है।
श्रीकृष्ण ने समुद्र में प्रवेश किया। वहां उन्होंने पंचजन दैत्य से घोर युद्ध किया। दैत्य विशालकाय व्हेल के रूप में था और उसके शरीर में एक दिव्य शंख था, जो पहले वरुण देव का था। श्रीकृष्ण ने दैत्य का वध कर दिया और उस शंख को अपने पास रख लिया। इस शंख को उन्होंने पंचजन्य नाम दिया, क्योंकि यह पंचजन दैत्य से प्राप्त हुआ था।
शंख मिलने के बाद भी गुरु पुत्र नहीं मिला। तब श्रीकृष्ण ने यमलोक पहुंचकर यमराज से गुरु पुत्र की आत्मा मांगी। यमदूतों ने विरोध किया तो श्रीकृष्ण ने पांचजन्य शंख का नाद किया। उस दिव्य नाद से यमलोक कांप उठा। यमराज स्वयं प्रकट हुए और गुरु पुत्र की आत्मा लौटा दी। ब्रह्मा जी की स्तुति के बाद श्रीकृष्ण ने फिर शंख बजाया, जिससे नरक के पापी जीव स्वर्ग पहुंच गए। इस प्रकार पांचजन्य शंख श्रीकृष्ण का प्रिय साथी बना और महाभारत युद्ध में इसका नाद धर्म की विजय का संदेश देता रहा।
शंखचूड़ दानव वध और अस्थियों से शंखों की उत्पत्ति
पुराणों में शंख की उत्पत्ति से जुड़ी एक और कथा शंखचूड़ दानव की है, जो शिव पुराण और अन्य ग्रंथों में वर्णित है। यह कथा सामान्य शंखों की उत्पत्ति बताती है। एक समय दैत्यराज दंभ को संतान नहीं हो रही थी। उसने भगवान विष्णु की घोर तपस्या की। प्रसन्न होकर विष्णु ने प्रकट होकर वर मांगा। दंभ ने कहा, “मुझे एक ऐसा पुत्र दो जो तीनों लोकों के लिए अजेय हो।” विष्णु ने “तथास्तु” कहकर वर दे दिया।
दंभ के यहां शंखचूड़ नामक पुत्र का जन्म हुआ। शंखचूड़ ने पुष्कर क्षेत्र में ब्रह्मा जी की घोर तपस्या की। ब्रह्मा प्रसन्न हुए और वर मांगा। शंखचूड़ ने कहा, “मैं देवताओं के लिए अजेय हो जाऊं।” ब्रह्मा ने “तथास्तु” कहा और उसे श्रीकृष्ण कवच प्रदान किया। जाते समय ब्रह्मा ने कहा कि धर्मध्वज की कन्या तुलसी से विवाह करो। शंखचूड़ ने तुलसी से विवाह किया। ब्रह्मा और विष्णु के वरदान से मदोन्मत्त होकर शंखचूड़ ने तीनों लोकों पर विजय प्राप्त कर ली। देवता त्रस्त होकर विष्णु के पास पहुंचे। विष्णु ने कहा कि उन्होंने स्वयं दंभ को ऐसा पुत्र देने का वरदान दिया है, अतः शिव से प्रार्थना करो।
देवताओं की प्रार्थना पर भगवान शिव शंखचूड़ से युद्ध करने चले, लेकिन श्रीकृष्ण कवच और तुलसी के पतिव्रत धर्म के कारण शिव भी उसे मार नहीं पाए, तब भगवान विष्णु ने ब्राह्मण का रूप धारण कर शंखचूड़ से श्रीकृष्ण कवच दान में ले लिया। इसके बाद विष्णु ने शंखचूड़ का रूप धारण कर तुलसी के पास पहुंचकर उसके पतिव्रत का भंग कर दिया। अब शंखचूड़ निर्बल हो गया। भगवान शिव ने उसे अपने त्रिशूल से भस्म कर दिया। शंखचूड़ की अस्थियां और भस्म समुद्र में फेंक दी गईं। समुद्र में बिखरी उन अस्थियों से नाना प्रकार के शंख उत्पन्न हुए।
शंखचूड़ विष्णु भक्त था, इसलिए लक्ष्मी-विष्णु को शंख का जल अत्यंत प्रिय है। सभी देवताओं को शंख से जल चढ़ाने का विधान है। चूंकि शिवजीf ने उसका वध किया था, इसलिए शंख का जल शिव को नहीं चढ़ाया जाता। शंखचूड़ की आत्मा राधा के शाप से मुक्त होकर गोलोक वृंदावन में श्रीकृष्ण के पास चली गई, क्योंकि पौराणिक कथा के अनुसार, श्रीदामा नामक कृष्णजी का सखा राधा के शाप से शंखचूड़ बना था।
(Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी ज्योतिषीय, पौराणिक और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है तथा केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है। अधिक जानकारी के लिए कृपया संबंधित विषय के विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य करें)