Bhagavad Gita Chapter 18, Verse 77 : श्रीमद्भगवद्गीता के पिछले लेख में आपने जाना कि संजय का हर्ष और गीता उपदेश की अनोखी महिमा आज हम आपको बताएंगे की भगवान कृष्ण का विराट स्वरूप देखकर संजय को क्या अनुभव हुआ
Bhagavad Gita Chapter 18, Shlok 77 : श्रीमद्भगवद्गीता के पिछले लेख में आपने जाना कि संजय का हर्ष और गीता उपदेश की अनोखी महिमा आज हम आपको बताएंगे की भगवान कृष्ण का विराट स्वरूप देखकर संजय को क्या अनुभव हुआ
तच्च संस्मृत्य संस्मृत्य रूपमत्यद्भुतं हरे: , विस्मयो मे महानराजन्हृष्यामि च पुन: पुन ( अध्याय 18, श्लोक 77 )
तत्-उस; च–भी; संस्मृत्य-संस्मृत्य-बार-बार स्मरण करके; रूपम्-विराट रूप को; अति-अत्यधिक; अद्भुतम्-आश्चर्यजनक; हरे:-भगवान् श्रीकृष्ण के; विस्मय:-आश्चर्य; मे-मेरा; महान महान; राजन्– राजा; हृष्यामि मैं हर्ष से रोमांचित हो रहा हूँ; च-और; पुनः-पुनः-बारम्बार।
अर्थ - हे राजन्! भगवान् श्री कृष्ण के उस अत्यन्त अद्भुत विराट रूप को याद कर-करके मेरे को बड़ा भारी आश्चर्य हो रहा है और मैं बार-बार हर्षित हो रहा हूँ।
व्याख्या - यहाँ संजय केवल एक द्रष्टा नहीं हैं, बल्कि उस दिव्य संवाद और विराट दर्शन के साक्षी भी हैं। जब अर्जुन ने कुरुक्षेत्र में श्रीकृष्ण से अपना विश्वरूप दिखाने की प्रार्थना की, तब भगवान् ने अपनी योगमाया से अर्जुन को दिव्य चक्षु प्रदान कर अनन्त मुखों, अनन्त भुजाओं, असंख्य रूपों और सम्पूर्ण लोकों को समेटे हुए विराट स्वरूप का दर्शन कराया। यह दृश्य इतना विलक्षण और अद्भुत था कि केवल अर्जुन ही नहीं, बल्कि इसे सुनने वाले संजय भी भीतर से हिल उठे।
संजय, जो दूर बैठकर दिव्य दृष्टि के माध्यम से सब देख-सुन रहे थे, उस विराट रूप का स्मरण मात्र करते ही रोमांचित हो उठते हैं। यहाँ 'संस्मृत्य-संस्मृत्य' शब्द पर ध्यान देना चाहिए। इसका अर्थ है, केवल एक बार नहीं, बल्कि बार-बार स्मरण करने पर भी नवीनता और आश्चर्य का अनुभव होना। सामान्य अनुभवों में स्मृति के साथ भाव फीके पड़ जाते हैं, परन्तु आध्यात्मिक अनुभवों में स्मृति जितनी गहरी होती है, आनन्द उतना ही बढ़ता जाता है। यही कारण है कि संजय कहते हैं, मैं बारम्बार याद करता हूँ और बारम्बार हर्षित हो जाता हूँ।
'अति अद्भुतम्' और 'विस्मयः महान्' शब्द यहाँ महत्वपूर्ण हैं। सामान्य अद्भुतता थोड़ी देर तक आकर्षित करती है, लेकिन भगवान् का विराट रूप मनुष्य-बुद्धि की सीमाओं को तोड़कर अनन्तता का अनुभव कराता है। उसमें समय, स्थान और द्रव्य की सभी सीमाएं लुप्त हो जाती हैं। यही कारण है कि संजय को केवल आश्चर्य ही नहीं, बल्कि विस्मय की चरम अवस्था प्राप्त होती है।
'हरेः रूपम्' का एक और गूढ़ संकेत है- यह रूप केवल बाहरी विराटता का ही प्रतीक नहीं है, बल्कि इसमें संहारक और रक्षक दोनों शक्तियाँ निहित हैं। एक ओर समस्त देवताओं और लोकपालों का दर्शन हुआ, तो दूसरी ओर असंख्य योद्धाओं को कृष्ण के दहकते मुख में प्रवेश करते देखा गया। यह दृश्य सृष्टि के अनादि-अनन्त चक्र की अनुभूति कराता है। सृष्टि, स्थिति और संहार सब एक ही परमात्मा में हैं।
संजय का यह रोमांच बताता है कि आध्यात्मिक अनुभूतियाँ केवल सुनने वाले को भी छू जाती हैं। अर्जुन ने तो प्रत्यक्ष रूप से दर्शन किया, पर संजय केवल दिव्य दृष्टि से दूर से देखकर भी आजीवन उस अनुभव में डूब गए। यही कारण है कि वे धृतराष्ट्र से कहते हैं , राजन् ! इस संवाद और इस विराट रूप का स्मरण मुझे निरन्तर हर्षित कर देता है।
यहाँ से एक गहरा आध्यात्मिक संदेश भी मिलता है -भगवान् का स्मरण केवल एक बार का अनुभव नहीं है। जब भी, जितनी बार भी कोई साधक भगवान् के दिव्य रूप और लीलाओं का स्मरण करता है, उसका हृदय उतनी ही बार उल्लसित और पवित्र हो जाता है। यह स्मरण केवल ज्ञान या दर्शन तक सीमित नहीं, बल्कि आत्मा की गहराई में आनंद और शांति का स्रोत है।