facebook pixel
विज्ञापन
Home  mythology  bhagwat katha  bhagwat gita chapter 18 verse 74 sanjay s body got goosebumps after listening to gita why

Bhagavad Gita Chapter 18, Verse 74 : गीता सुनकर संजय के शरीर के रोंगटे खड़े हो गए ! क्यों ?

जीवांजलि धर्म डेस्कPublished by:
कोमल
सार

Bhagavad Gita Chapter 18, Verse 74  :आज आप भागवत गीता के लेख में पढ़ेंगे कि  कैसे गीता सुनकर संजय के शरीर के रोंगटे खड़े हो गए ! क्यों ?

Bhagwat Gita
Bhagavad Gita Shlok In Hindi:आज आप भागवत गीता के लेख में पढ़ेंगे कि  कैसे गीता सुनकर संजय के शरीर के रोंगटे खड़े हो गए ! क्यों ?

सञ्जय उवाच। 

इत्यहं वासुदेवस्य पार्थस्य च महात्मनः, संवादमिममश्रौषमद्भुतं रोमहर्षणम् ( अध्याय 18, श्लोक 74 )


सञ्जयःउवाच-संजय ने कहा; इति–इस प्रकार; अहम्-मैं; वासुदेवस्य–श्रीकृष्ण का; पार्थस्य–तथा अर्जुन का; च-और; महा-आत्मनः:-उदार चित्त आत्मा का; संवादम्-वार्तालाप; इमम् यह; अश्रौषम्-सुना है; अद्भुतम्-अद्भुत; रोम-हर्षणम्-शरीर के रोंगटे खड़े करने वाला।

अर्थ -  संजय ने कहा, इस प्रकार से मैंने वासुदेव श्रीकृष्ण और उदारचित्त पृथापुत्र अर्जुन के बीच अद्भुत संवाद सुना। यह इतना रोमांचकारी संदेश है कि इससे मेरे शरीर के रोंगटे खड़े हो गए हैं। 

व्याख्या - 'इत्यं वासुदेवस्य पार्थस्य च महात्मनः' सञ्जय कहते हैं कि इस तरह मैंने भगवान वासुदेव और महात्मा पृथानन्दन अर्जुन का यह संवाद सुना, जो कि अत्यन्त अद्भुत, विलक्षण है और जिसकी याद मात्र हर्ष के मारे रोमाञ्चित करने वाली है। यहाँ “इति” पद का तात्पर्य है कि पहले अध्याय के बीसवें श्लोक में “अथ व्यवस्थितान् दृष्ट्वा धार्तराष्ट्रान् कपिध्वजः” पदों से सञ्जय श्रीकृष्ण और अर्जुन के संवादरूप गीता का आरम्भ करते हैं और यहाँ “इति” पद से उस संवाद की समाप्ति करते हैं।

अर्जुन के लिये महात्मनः विशेषण देने का तात्पर्य है कि अर्जुन कितने महान विलक्षण पुरुष हैं, जिनकी आज्ञा का पालन स्वयं भगवान करते हैं। अर्जुन कहते हैं कि हे अच्युत! मेरे रथ को दोनों सेनाओं के बीच में खड़ा कर दो तो भगवान दोनों सेनाओं के बीच में रथ को खड़ा कर देते हैं। गीता में अर्जुन जहाँ-जहाँ प्रश्न करते हैं, वहाँ-वहाँ भगवान बड़े प्यार से और विलक्षण रीति से प्रायः विस्तारपूर्वक उत्तर देते हैं। इस प्रकार महात्मा अर्जुन और भगवान वासुदेव के संवाद को मैंने सुना है।

'संवादमिममश्रौषमद्भुतं रोमहर्षणम्' - इस संवाद में अद्भुत और रोमहर्षणपना क्या है? शास्त्रों में प्रायः ऐसी बात आती है कि संसार की निवृत्ति करने से ही मनुष्य पारमार्थिक मार्ग पर चल सकता है और उसका कल्याण हो सकता है। मनुष्यों में भी प्रायः ऐसी ही धारणा बैठी हुई है कि घर-परिवार आदि को छोड़कर साधु-संन्यासी बनने से ही कल्याण होता है। परन्तु गीता कहती है कि कोई भी परिस्थिति, अवस्था, घटना, काल आदि क्यों न हो, उसी के सदुपयोग से मनुष्य का कल्याण हो सकता है।

इतना ही नहीं, वह परिस्थिति बढ़िया से बढ़िया हो या घटिया से घटिया, सौम्य से सौम्य हो या घोर से घोर,  विहित युद्ध जैसी प्रवृत्ति हो, जिसमें दिनभर मनुष्यों का गला काटना पड़ता है। उसमें भी मनुष्य का कल्याण हो सकता है, मुक्ति हो सकती है। कारण कि जन्म-मरण रूप बन्धन में संसार का राग ही कारण है। उस राग को मिटाने में परिस्थिति का सदुपयोग करना ही हेतु है, अर्थात् जो पुरुष परिस्थिति में राग-द्वेष न करके अपने कर्तव्य का पालन करता है, वह सुखपूर्वक मुक्त हो जाता है। यही इस संवाद में अद्भुतपना है। 

भगवान का स्वयं अवतार लेकर मनुष्य जैसा काम करते हुए अपने आपको प्रकट कर देना और कहना, मेरी शरण में आ जा, यह अत्यन्त गोपनीय रहस्य की बात कह देना, यही संवाद में रोमहर्षण करने वाला, प्रसन्न करने वाला और आनन्द देने वाला है।
 

धार्मिक कहानियां सुनने और पढ़ने के लिए हमारे WhatsApp चैनल से जुड़ें।

WhatsApp Channel