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Nirjala Ekadashi 2025 : निर्जला एकादशी कों क्यों कहते हैं भीमसेन या पांडव एकादशी, जानें पौराणिक कथा...

जीवांजलिPublished by:
राघवेंद्र तिवारी
सार

Nirjala Ekadashi 2025 : निर्जला एकादशी को साल की सभी एकादशियों में सर्वश्रेष्ठ माना जाता है। इस साल यह एकादशी 6 जून 2025 को मनाई जाएगी। इस दिन भगवान विष्णु की पूजा की जाती है।

Nirjala Ekadashi 2025
Nirjala Ekadashi 2025 : निर्जला एकादशी को साल की सभी एकादशियों में सबसे सर्वश्रेष्ठ माना गया है। वैदिक पंचांग के अनुसार, इस साल यानी 2025 में यह एकादशी 6 जून को मनाई जाएगी। इस दिन भगवान विष्णु की पूजा की जाती है। भक्त बिना कुछ खाए और बिना जल ग्रहण किए भगवान विष्णु की पूजा करते हैं। कहा जाता है कि ऐसा करने से भक्त पापों से मुक्त हो जाते हैं।

एकादशियां वर्ष में 24 बार आती हैं लेकिन जब अधिकमास या मलमास पड़ता है तो कुल एकादशियों की संख्या 26 के करीब हो जाती है। ज्येष्ठ माह में आने वाली एकादशी व्रत को सभी एकादशियों में महत्वपूर्ण माना जाता है। इसे निर्जला एकादशी के नाम से जाना जाता है। बता दें कि जेष्ठ माह में पड़ने वाली निर्जला एकादशी को भीमसेनी एकादशी के नाम से भी जाना जाता है। साथ ही साथ पांडव एकादशी भी कहा जाता है। अब आप सोच रहे होंगे कि आखिर निर्जला एकादशी को भीमसेन एकादशी या पांडव एकादशी के नाम से क्यों जाना जाता है। तो इसके पीछे एक पौराणिक कथा है, आइए जानते हैं।

पौराणिक कथा भी प्रचलित है

इस एकादशी का नाम भीमसेनी एकादशी या पांडव एकादशी पड़ने के पीछे एक पौराणिक कथा है। एक बार भीम ने महर्षि व्यास पांडवों से पूछा कि महर्षि, मुझे यह बताएं कि युधिष्ठिर, अर्जुन, नकुल, सहदेव, माता कुंती और द्रौपदी सभी एकादशी का व्रत करते हैं लेकिन पेट की अग्नि के कारण मैं यह व्रत करने में असमर्थ हूं, तो क्या ऐसा कोई व्रत है जो मुझे एक साथ चौबीस एकादशियों का फल दे सके?

पौराणिक कथाओं के अनुसार, महर्षि व्यास जानते थे कि भीम भोजन बिना नहीं रह सकते, तब महर्षि व्यास जी ने भीम से कहा कि वत्स तुम्हें ज्येष्ठ महीने के शुक्ल पक्ष की निर्जला एकादशी का व्रत रखना चाहिए क्योंकि इस व्रत में स्नान और आचमन के समय जल ग्रहण करने से कोई पाप नहीं लगता और व्रत करने वाले को सभी 24 एकादशियों का फल मिलता है। भीम ने बड़ी हिम्मत के साथ निर्जला एकादशी का व्रत किया, लेकिन सुबह होते-होते वे भोजन और जल के अभाव में बेहोश हो गए। तब पांडवों ने गंगाजल, तुलसी और चरणामृत का प्रयोग कर उन्हें बेहोशी से बाहर निकाला। इसलिए इसे भीमसेन एकादशी भी कहा जाता है।

जब वेदव्यास ने पांडवों को चारों पुरुषार्थ- धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष देने वाली एकादशी व्रत का संकल्प दिलाया, तब महाबली भीम ने सबसे पहले इस व्रत का पालन किया। उसके बाद बाकी पांडवों ने भी श्री हरि का यह व्रत किया। जिससे उन्हें इस लोक में सुख, यश और सिद्धियां प्राप्त हुईं और अंत में मोक्ष की प्राप्ति हुई।

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