Sawan Second Somvar: सावन के दूसरे सोमवार का व्रत रखने वाले श्रद्धालु इस दिन भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा करने के बाद सोमवार व्रत की कथा का पाठ कर सकते हैं।
Sawan Second Somvar: सावन का महीना भगवान शिव की आराधना के लिए विशेष माना जाता है। इस पूरे महीने में सोमवार के दिन शिव भक्त व्रत रखते हैं और विधि-विधान से भगवान भोलेनाथ की पूजा करते हैं। सावन के सोमवार को शिवलिंग पर जल, दूध, बेलपत्र, धतूरा और अन्य पूजन सामग्री अर्पित करने के साथ शिव मंत्रों का जाप और व्रत कथा का पाठ करने की भी परंपरा है। धार्मिक मान्यता है कि सावन सोमवार के दिन भगवान शिव की पूजा के साथ व्रत कथा का श्रवण या पाठ करने से भोलेनाथ की विशेष कृपा प्राप्त होती है।
सावन के दूसरे सोमवार का व्रत रखने वाले श्रद्धालु इस दिन भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा करने के बाद सोमवार व्रत की कथा का पाठ कर सकते हैं। सोमवार व्रत से जुड़ी एक प्रचलित पौराणिक कथा में भगवान शिव की कृपा, उनकी भक्ति और व्रत के महत्व का वर्णन मिलता है। आइए जानते हैं सावन सोमवार की इस व्रत कथा को...
सावन सोमवार व्रत की पौराणिक कथा
पौराणिक कथा के अनुसार, एक नगर में एक साहूकार रहता था। वह बहुत धनवान था और उसके घर में किसी प्रकार की कमी नहीं थी। उसके पास अपार धन-संपत्ति थी, लेकिन उसके जीवन में एक बड़ी चिंता थी। साहूकार की कोई संतान नहीं थी। संतान प्राप्ति की इच्छा से वह भगवान शिव की भक्ति करने लगा। साहूकार प्रत्येक सोमवार को भगवान शिव का व्रत रखता और पूरे विधि-विधान से शिवलिंग की पूजा करता था।
वह भगवान भोलेनाथ का जलाभिषेक करता, बेलपत्र अर्पित करता और श्रद्धापूर्वक भगवान शिव से संतान प्राप्ति की प्रार्थना करता था। सोमवार के दिन वह जरूरतमंदों को दान भी करता था और भगवान शिव की आराधना में अपना समय बिताता था। साहूकार की पत्नी भी भगवान शिव की भक्त थी। दोनों पति-पत्नी नियमित रूप से सोमवार का व्रत रखते और भगवान शिव की पूजा करते थे। लंबे समय तक उनकी यह साधना चलती रही।
भगवान शिव ने सुनी साहूकार की प्रार्थना
साहूकार की भक्ति से भगवान शिव प्रसन्न हुए। एक दिन माता पार्वती ने भगवान शिव से साहूकार की भक्ति और उसकी इच्छा के बारे में पूछा, तब भगवान शिव ने बताया कि वह साहूकार लंबे समय से उनकी पूजा कर रहा है और संतान प्राप्ति की इच्छा रखता है। माता पार्वती ने भगवान शिव से साहूकार की मनोकामना पूर्ण करने का आग्रह किया। भगवान शिव ने उसकी भक्ति से प्रसन्न होकर उसे संतान प्राप्ति का वरदान दिया, लेकिन साथ ही यह भी कहा कि उसके पुत्र की आयु कम होगी। कुछ समय बाद साहूकार के घर पुत्र का जन्म हुआ। पुत्र के जन्म से परिवार में खुशी छा गई।
साहूकार ने अपने पुत्र का पालन-पोषण बड़े प्रेम से किया। जब बालक की आयु 11 वर्ष हुई तो साहूकार ने उसे उसके मामा के साथ काशी भेजने का निर्णय लिया, ताकि वहां रहकर वह शिक्षा प्राप्त कर सके। काशी जाते समय साहूकार ने अपने पुत्र और उसके मामा को आवश्यक धन दिया। रास्ते में दोनों एक नगर में पहुंचे। उसी नगर में एक राजा की पुत्री का विवाह होने वाला था। विवाह की तैयारियां चल रही थीं।
साहूकार के पुत्र ने निभाई विवाह की जिम्मेदारी
कथा के अनुसार, विवाह के दिन वर पक्ष के लोगों के सामने एक समस्या उत्पन्न हो गई। किसी कारण से वर पक्ष को चिंता होने लगी कि विवाह में कोई बाधा न आ जाए। साहूकार के पुत्र को देखकर वर पक्ष ने उसे वर के स्थान पर बैठाने का निर्णय लिया। साहूकार के पुत्र का विवाह राजकुमारी से कर दिया गया। विवाह के बाद उसने राजकुमारी को सच्चाई बता दी कि वह वास्तविक वर नहीं है और वह काशी जाकर शिक्षा प्राप्त करने के लिए निकला है। कहा जाता है कि विवाह के बाद साहूकार का पुत्र अपनी यात्रा पर आगे बढ़ गया। इस दौरान उसे अपने जीवन के उस समय के बारे में पता था, जो भगवान शिव के वरदान के अनुसार बहुत कठिन होने वाला था।
काशी में भगवान शिव की कृपा
साहूकार का पुत्र अपने मामा के साथ काशी पहुंचा। वहां दोनों ने भगवान शिव की आराधना शुरू कर दी। साहूकार का पुत्र भी नियमित रूप से भगवान शिव की पूजा करता था और सोमवार का व्रत रखता था। जब उसकी आयु 12 वर्ष पूरी होने का समय आया, तब वह गंभीर रूप से बीमार पड़ गया। बीमारी बढ़ती गई और अंततः उसकी मृत्यु हो गई। उसके मामा ने बहुत दुखी होकर भगवान शिव से प्रार्थना की।
कथा के अनुसार, उस समय भगवान शिव और माता पार्वती वहां उपस्थित थे। माता पार्वती ने बालक की स्थिति देखकर भगवान शिव से उसकी रक्षा करने का आग्रह किया। भगवान शिव ने कहा कि यह बालक उसी साहूकार का पुत्र है, जिसे उन्होंने उसकी भक्ति से प्रसन्न होकर संतान का वरदान दिया था और उसकी आयु निर्धारित की थी। माता पार्वती ने भगवान शिव से उस बालक को जीवनदान देने की प्रार्थना की। माता पार्वती के आग्रह और बालक के परिवार की भगवान शिव के प्रति भक्ति को देखते हुए भगवान शिव ने उसे पुनः जीवन प्रदान कर दिया।
भगवान शिव की कृपा से बालक को मिला जीवन
भगवान शिव के आशीर्वाद से साहूकार का पुत्र जीवित हो गया। उसे देखकर उसका मामा अत्यंत प्रसन्न हुआ। इसके बाद दोनों ने भगवान शिव की पूजा की और काशी में रहकर धार्मिक अनुष्ठान किए। जब साहूकार का पुत्र अपने घर वापस लौटने लगा तो रास्ते में वही नगर आया जहां उसका विवाह हुआ था। राजा को जब पता चला कि साहूकार का पुत्र जीवित है और वही वास्तविक युवक है जिससे उसकी पुत्री का विवाह हुआ था, तो उसने प्रसन्न होकर उसका स्वागत किया। साहूकार का पुत्र अपनी पत्नी के साथ अपने घर लौट आया। जब साहूकार और उसकी पत्नी को पता चला कि उनका पुत्र जीवित लौट आया है तो उनकी खुशी का ठिकाना नहीं रहा।
भगवान शिव की भक्ति से जुड़ी है यह कथा
सोमवार व्रत की इस पौराणिक कथा का संबंध भगवान शिव की आराधना से माना जाता है। धार्मिक परंपरा में सावन सोमवार के दिन शिव पूजा के साथ इस कथा का पाठ करने का विशेष महत्व बताया गया है। श्रद्धालु प्रातः स्नान आदि से निवृत्त होकर भगवान शिव और माता पार्वती का ध्यान करते हैं। इसके बाद शिवलिंग पर जल और अन्य पूजन सामग्री अर्पित करके सोमवार व्रत कथा का पाठ किया जाता है।
(Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी ज्योतिषीय, पौराणिक और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है तथा केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है। अधिक जानकारी के लिए कृपया संबंधित विषय के विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य करें।)