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Vighnaraja Sankashti Chaturthi: विघ्नराज संकष्टी चतुर्थी पर करें इस व्रत कथा का पाठ, गणेश जी की बनी रहेगी कृपा

जीवांजलि, धर्म डेस्कPublished by:
Shakshi
सार

Vighnaraja Sankashti Chaturthi: हिंदू धर्म में भगवान गणेश को प्रथम पूजनीय और विघ्नों को दूर करने वाला देवता माना जाता है। आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को विघ्नराज संकष्टी चतुर्थी के रूप में मनाया जाता है। 

Vighnaraja Sankashti Chaturthi Vrat
Vighnaraja Sankashti Chaturthi Vrat Katha: विघ्नराज संकष्टी चतुर्थी भगवान गणेश को समर्पित एक विशेष व्रत है। इस दिन भक्त विघ्नहर्ता गणेश जी की पूजा-अर्चना करते हैं और जीवन की परेशानियों से मुक्ति की कामना करते हैं। धार्मिक मान्यता है कि इस दिन व्रत रखने के साथ भगवान गणेश की व्रत कथा का पाठ करने से बप्पा की कृपा प्राप्त होती है। पौराणिक कथा में भगवान श्रीकृष्ण, उनके पौत्र अनिरुद्ध और बाणासुर का प्रसंग भी मिलता है। क्या आप जानते हैं कि भगवान श्रीकृष्ण ने भी इस व्रत को क्यों किया था और इससे उन्हें क्या फल मिला? आइए जानते हैं विघ्नराज संकष्टी चतुर्थी की व्रत कथा और इसका धार्मिक महत्व।

विघ्नराज संकष्टी चतुर्थी का महत्व

हिंदू धर्म में भगवान गणेश को प्रथम पूजनीय और विघ्नों को दूर करने वाला देवता माना जाता है। आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को विघ्नराज संकष्टी चतुर्थी के रूप में मनाया जाता है। इस दिन गणेश जी के विघ्नराज स्वरूप की पूजा की जाती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, बप्पा का यह स्वरूप भक्तों के जीवन में आने वाली बाधाओं को दूर करने वाला है। संकष्टी का अर्थ संकटों से मुक्ति दिलाने वाला माना जाता है। इसी वजह से इस दिन श्रद्धालु व्रत रखकर भगवान गणेश से सुख-शांति और जीवन में सफलता की प्रार्थना करते हैं। इस व्रत से जुड़ी पौराणिक कथा भगवान गणेश की महिमा और उनकी कृपा को दर्शाती है।

विघ्नराज संकष्टी चतुर्थी व्रत कथा

पौराणिक कथा के अनुसार, द्वापर युग में बाणासुर नाम का एक शक्तिशाली असुर राजा था। उसकी पुत्री उषा ने एक बार सपने में एक सुंदर युवक को देखा। वह उस युवक को अपना मन दे बैठी। जागने के बाद भी वह उसके विचारों में खोई रही। उषा ने अपनी सखी चित्रलेखा को सपने के बारे में बताया और उस युवक को खोजने में सहायता मांगी। चित्रलेखा चित्र बनाने में निपुण थी। उसने उषा के बताए हुलिए के आधार पर अनेक युवकों के चित्र बनाए। जब उसने अनिरुद्ध का चित्र बनाया, तो उषा ने उन्हें पहचान लिया। अनिरुद्ध भगवान श्रीकृष्ण के पौत्र थे। इसके बाद चित्रलेखा अपनी योगशक्ति से अनिरुद्ध को बाणासुर के महल में ले आई।

उधर, जब भगवान श्रीकृष्ण को अनिरुद्ध के लापता होने का पता चला, तो वे चिंतित हो गए। उन्होंने उनकी खोज शुरू की, लेकिन काफी प्रयासों के बाद भी अनिरुद्ध का पता नहीं चल पाया। इसी दौरान भगवान श्रीकृष्ण की मुलाकात लोमश ऋषि से हुई। उन्होंने ऋषि को अपने पौत्र के लापता होने की पूरी बात बताई और उनसे मार्गदर्शन मांगा।

श्रीकृष्ण ने क्यों रखा व्रत?

लोमश ऋषि ने भगवान श्रीकृष्ण को बताया कि अनिरुद्ध बाणासुर के महल में हैं। उन्होंने श्रीकृष्ण को आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी का व्रत करने की सलाह दी। ऋषि के अनुसार, इस दिन भगवान गणेश की विधिपूर्वक पूजा और व्रत करने से संकट दूर हो सकते हैं। ऋषि की बात सुनकर भगवान श्रीकृष्ण ने विघ्नराज संकष्टी चतुर्थी का व्रत रखा। उन्होंने श्रद्धापूर्वक गणेश जी की पूजा की और उनसे अनिरुद्ध को वापस लाने की प्रार्थना की। धार्मिक कथा के अनुसार, भगवान गणेश की कृपा से श्रीकृष्ण को बाणासुर के विरुद्ध युद्ध में विजय प्राप्त हुई और अनिरुद्ध को मुक्त कराया जा सका। इस कथा में भगवान शिव का प्रसंग भी आता है। युद्ध के दौरान भगवान शिव बाणासुर की रक्षा कर रहे थे, फिर भी श्रीकृष्ण ने उसे पराजित कर दिया। कथा के अनुसार, इस व्रत के प्रभाव से श्रीकृष्ण को अपने पौत्र को वापस पाने में सफलता मिली।

व्रत कथा से जुड़ी धार्मिक मान्यता

विघ्नराज संकष्टी चतुर्थी की इस कथा को भगवान गणेश की कृपा और उनके विघ्नहर्ता स्वरूप से जोड़कर देखा जाता है। मान्यता है कि जो भक्त सच्चे मन से इस दिन व्रत रखते हैं और गणेश जी का स्मरण करते हैं, उन्हें कठिन परिस्थितियों का सामना करने की शक्ति मिलती है। कथा में भगवान श्रीकृष्ण का व्रत करना यह दर्शाता है कि संकट के समय भगवान गणेश की आराधना की जाती है। भक्त इस दिन अपने परिवार की सुख-समृद्धि, शांति और मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए बप्पा से प्रार्थना करते हैं।

कैसे करें व्रत कथा का पाठ?

विघ्नराज संकष्टी चतुर्थी के दिन सुबह स्नान करने के बाद स्वच्छ वस्त्र पहनें। पूजा स्थल पर भगवान गणेश की प्रतिमा या तस्वीर स्थापित करें। इसके बाद गणेश जी को फूल, दूर्वा, चंदन और अपनी श्रद्धा के अनुसार फल या मोदक अर्पित करें। पूजा के दौरान भगवान गणेश का ध्यान करें और विघ्नराज संकष्टी चतुर्थी की व्रत कथा पढ़ें। कथा का पाठ करने के बाद गणेश जी की आरती करें और परिवार की सुख-शांति के लिए प्रार्थना करें। दिनभर व्रत रखने वाले श्रद्धालु अपनी परंपरा और सामर्थ्य के अनुसार उपवास के नियमों का पालन करते हैं।

चंद्र दर्शन के बाद खोलें व्रत

संकष्टी चतुर्थी के व्रत में चंद्र दर्शन का विशेष महत्व माना जाता है। परंपरा के अनुसार, शाम को भगवान गणेश की पूजा करने के बाद चंद्रमा के दर्शन किए जाते हैं और उन्हें अर्घ्य दिया जाता है। इसके बाद व्रत का पारण किया जाता है। चंद्रमा को अर्घ्य देते समय भक्त सुख-समृद्धि और परिवार की मंगलकामना करते हैं। हालांकि, चंद्रोदय का समय अलग-अलग शहरों में भिन्न हो सकता है, इसलिए व्रत रखने वाले श्रद्धालुओं को अपने स्थानीय पंचांग के अनुसार चंद्र दर्शन का समय देखना चाहिए।


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(Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी ज्योतिषीय, पौराणिक और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है तथा केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है। अधिक जानकारी के लिए कृपया संबंधित विषय के विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य करें।)

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