Jitiya Vrat 2026: मां और संतान का रिश्ता बेहद खास होता है। बच्चे की लंबी उम्र, अच्छी सेहत और खुशहाल जीवन के लिए मां हर संभव कोशिश करती है। इसी ममता और संतान के प्रति प्रेम से जुड़ा है जितिया व्रत, जिसे जीवित्पुत्रिका या जिउतिया व्रत भी कहा जाता है। इस दिन माताएं अपनी संतान की सलामती की कामना से व्रत रखती हैं। कई जगह यह व्रत निर्जला रखा जाता है, जिसमें अन्न और जल का त्याग किया जाता है। धार्मिक मान्यता है कि जितिया व्रत करने से संतान पर आने वाले संकट दूर होते हैं। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि आखिर जितिया व्रत रखने की परंपरा कैसे शुरू हुई और इसके पीछे क्या मान्यता है? आइए जानते हैं इसकी वजह और धार्मिक महत्व।
कब रखा जाएगा जितिया व्रत?
हिंदू पंचांग के अनुसार, जितिया व्रत आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को रखा जाता है। वर्ष 2026 में यह व्रत 3 अक्टूबर, शनिवार को रखा जाएगा। इस दिन माताएं संतान की लंबी उम्र और उसके सुखी जीवन की कामना से व्रत करती हैं। जितिया व्रत मुख्य रूप से बिहार, झारखंड, पूर्वी उत्तर प्रदेश और मिथिलांचल के क्षेत्रों में श्रद्धा के साथ मनाया जाता है।
क्यों रखा जाता है यह व्रत?
जितिया व्रत रखने के पीछे सबसे प्रमुख मान्यता संतान की लंबी उम्र और उसकी रक्षा से जुड़ी है। माताएं यह व्रत अपने बच्चों के अच्छे स्वास्थ्य, सुख-समृद्धि और खुशहाल भविष्य की कामना से करती हैं। मान्यता है कि श्रद्धापूर्वक व्रत करने और भगवान जीमूतवाहन की पूजा करने से संतान पर आने वाले संकट दूर होते हैं।
इस व्रत को केवल उपवास तक सीमित नहीं माना जाता, बल्कि यह मां के त्याग, प्रेम और संतान के प्रति समर्पण का प्रतीक भी है। कई परिवारों में यह परंपरा पीढ़ियों से चली आ रही है। घर की बड़ी महिलाएं नई पीढ़ी को व्रत की कथा और इससे जुड़ी मान्यताओं के बारे में बताती हैं। इस तरह जितिया व्रत धार्मिक आस्था के साथ पारिवारिक परंपरा से भी जुड़ा हुआ है।
जीमूतवाहन से जुड़ी है मान्यता
जितिया व्रत में गंधर्वराज जीमूतवाहन की पूजा का विशेष महत्व माना जाता है। उनसे जुड़ी पौराणिक कथा त्याग, करुणा और दूसरे के जीवन की रक्षा करने का संदेश देती है। कथा के अनुसार, जीमूतवाहन एक दयालु और परोपकारी राजकुमार थे। एक दिन उन्हें पता चला कि गरुड़ के भय से नागों को अपना जीवन गंवाना पड़ता है। नागों को बचाने के लिए जीमूतवाहन ने स्वयं को गरुड़ के सामने प्रस्तुत कर दिया, ताकि किसी दूसरे नाग की जान बच सके। जीमूतवाहन के इस त्याग और साहस से गरुड़ प्रभावित हुए। कथा के अनुसार, इसके बाद नागों की रक्षा का मार्ग निकला। इसी प्रसंग को जितिया व्रत की धार्मिक मान्यताओं से जोड़कर देखा जाता है। जीमूतवाहन की पूजा करते हुए माताएं अपनी संतान की रक्षा और लंबी उम्र की प्रार्थना करती हैं।
चील और सियारिन की कथा
जितिया व्रत से जुड़ी एक अन्य प्रचलित लोककथा चील और सियारिन की है। कथा के अनुसार, एक चील और सियारिन ने कुछ महिलाओं को व्रत करते हुए देखा। दोनों ने भी व्रत रखने का संकल्प लिया, लेकिन कठिन समय आने पर उनके आचरण में अंतर दिखाई दिया। लोककथा में चील को नियम और श्रद्धा के साथ व्रत पूरा करने वाली बताया गया है, जबकि सियारिन व्रत के नियमों का पालन नहीं कर पाती। आगे चलकर इस कथा को दोनों के जीवन में आए अंतर से जोड़कर सुनाया जाता है। इसीलिए जितिया व्रत की कथा सुनने के साथ व्रत के नियमों और संकल्प का पालन करना भी महत्वपूर्ण माना जाता है।
कैसे रखा जाता है जितिया व्रत?
जितिया व्रत की शुरुआत कई जगह नहाय-खाय की परंपरा से होती है। इस दिन महिलाएं स्नान करके सात्विक भोजन करती हैं। इसके अगले दिन मुख्य व्रत रखा जाता है। व्रत के दिन भगवान जीमूतवाहन की पूजा की जाती है और उनसे संतान के कल्याण की कामना की जाती है। कई क्षेत्रों में यह व्रत निर्जला रखा जाता है। इसमें व्रती अन्न और जल ग्रहण नहीं करती हैं। शाम के समय पूजा के दौरान जितिया व्रत की कथा सुनी या पढ़ी जाती है। इसके बाद परंपरा के अनुसार पूजा-अर्चना की जाती है।
व्रत का पारण कब होता है?
जितिया व्रत का पारण अगले दिन किया जाता है। वर्ष 2026 में मुख्य व्रत 3 अक्टूबर को है, जबकि पारण 4 अक्टूबर, रविवार को किया जाएगा। इस व्रत में माताएं अपनी संतान के साथ-साथ परिवार की सुख-शांति और खुशहाली की भी कामना करती हैं। धार्मिक मान्यता के अनुसार, श्रद्धा से किया गया जितिया व्रत संतान के जीवन में सुख और मंगल की प्रार्थना का प्रतीक है।
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Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी ज्योतिषीय, पौराणिक और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है तथा केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है। अधिक जानकारी के लिए कृपया संबंधित विषय के विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य करें।)