Ashvin Kalashtami 2026: आश्विन मास की कालाष्टमी भगवान कालभैरव की पूजा-अर्चना के लिए विशेष मानी जाती है। हिंदू धर्म में भगवान कालभैरव को भगवान शिव का रौद्र स्वरूप माना गया है। मान्यता है कि कालाष्टमी के दिन विधि-विधान से कालभैरव की पूजा करने और व्रत रखने से भय से मुक्ति मिलती है तथा जीवन में सुख-शांति बनी रहती है। हर महीने कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को कालाष्टमी मनाई जाती है। ऐसे में आइए जानते हैं कि साल 2026 में आश्विन कालाष्टमी कब मनाई जाएगी, इस दिन की तिथि क्या है और धार्मिक दृष्टि से इसका क्या महत्व है।
आश्विन कालाष्टमी 2026 की तिथि
हिंदू पंचांग के अनुसार, वर्ष 2026 में आश्विन मास की कालाष्टमी 3 अक्टूबर, शनिवार को मनाई जाएगी। इस दिन आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि रहेगी। दिल्ली के पंचांग के अनुसार, अष्टमी तिथि 3 अक्टूबर को सुबह 7 बजकर 59 मिनट पर शुरू होगी और 4 अक्टूबर को सुबह 5 बजकर 51 मिनट पर समाप्त होगी।
भगवान कालभैरव की होती है पूजा
कालाष्टमी का दिन भगवान कालभैरव को समर्पित है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, कालभैरव भगवान शिव के उग्र स्वरूप हैं। उन्हें समय का अधिपति और भक्तों की रक्षा करने वाला देवता माना जाता है। इसी वजह से कालाष्टमी पर उनकी पूजा का विशेष महत्व बताया गया है। मान्यता है कि भगवान कालभैरव की आराधना करने से व्यक्ति के मन से भय दूर होता है और वह कठिन परिस्थितियों का सामना करने का साहस प्राप्त करता है। भक्त इस दिन भगवान कालभैरव से अपने परिवार की सुख-समृद्धि और सुरक्षा की कामना करते हैं।
कालाष्टमी का धार्मिक महत्व
हिंदू धर्म में कालाष्टमी को भगवान कालभैरव की कृपा प्राप्त करने का विशेष दिन माना जाता है। इस दिन व्रत और पूजा करने वाले श्रद्धालु भगवान से जीवन की बाधाओं को दूर करने की प्रार्थना करते हैं। धार्मिक मान्यताओं में कालभैरव को नकारात्मक शक्तियों से रक्षा करने वाला देवता भी माना गया है। कालाष्टमी का महत्व केवल व्रत रखने तक सीमित नहीं है। इस दिन भगवान शिव और उनके कालभैरव स्वरूप का स्मरण करना भी शुभ माना जाता है। भक्त अपनी श्रद्धा के अनुसार पूजा-पाठ, मंत्र जाप और दान-पुण्य करते हैं।
कैसे करें कालभैरव की पूजा?
आश्विन कालाष्टमी के दिन सुबह स्नान करने के बाद स्वच्छ वस्त्र धारण करें। इसके बाद भगवान कालभैरव का स्मरण करते हुए व्रत और पूजा का संकल्प लें। घर के पूजा स्थल पर भगवान कालभैरव की तस्वीर या प्रतिमा स्थापित करके दीपक जलाएं और पुष्प अर्पित करें। पूजा के दौरान भगवान कालभैरव को फल, मिठाई और अपनी श्रद्धा के अनुसार भोग अर्पित किया जा सकता है। इसके बाद भगवान की आरती करें और उनसे परिवार की सुख-शांति तथा रक्षा की प्रार्थना करें। श्रद्धालु इस दिन कालभैरव मंत्र का जाप भी करते हैं। कालाष्टमी की पूजा में रात्रि का विशेष महत्व माना जाता है। इसलिए भक्त शाम के समय भी भगवान कालभैरव की पूजा-अर्चना करते हैं। व्रत रखने वाले श्रद्धालु अपनी परंपरा और सामर्थ्य के अनुसार व्रत के नियमों का पालन करते हैं।
यह भी पढ़ें-
(
Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी ज्योतिषीय, पौराणिक और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है तथा केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है। अधिक जानकारी के लिए कृपया संबंधित विषय के विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य करें।)