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Putrada Ekadashi: सावन पुत्रदा एकादशी को क्यों कहा जाता है पवित्रा एकादशी? जानें पौराणिक कथा

जीवांजलि, धर्म डेस्कPublished by:
Shakshi
सार

Putrada Ekadashi: पवित्रा एकादशी की कथा में राजा महीजित का प्रसंग प्रमुख रूप से आता है। कथा के अनुसार, महीष्मती नगरी के राजा महीजित बहुत शक्तिशाली और धर्मपरायण थे, लेकिन उनके कोई संतान नहीं थी।

Putrada Ekadashi
Putrada Ekadashi: सावन शुक्ल पक्ष की एकादशी को पुत्रदा एकादशी के नाम से जाना जाता है। इस एकादशी का संबंध भगवान विष्णु की उपासना और संतान प्राप्ति की कामना से माना जाता है। खास बात यह है कि सावन की पुत्रदा एकादशी को पवित्रा एकादशी और पवित्रोपना एकादशी के नाम से भी जाना जाता है। यह नाम केवल पवित्रता के अर्थ में नहीं है, बल्कि इसके पीछे एक खास धार्मिक कथा और परंपरा जुड़ी हुई है। आखिर सावन की पुत्रदा एकादशी का नाम पवित्रा एकादशी क्यों पड़ा? राजा महीजित की कथा का इससे क्या संबंध है और भगवान विष्णु की पूजा इस दिन क्यों की जाती है? आइए जानते हैं।

पुत्रदा और पवित्रा एकादशी एक ही है

सावन शुक्ल पक्ष की एकादशी को अलग-अलग क्षेत्रों में अलग नामों से जाना जाता है। इसे श्रावण पुत्रदा एकादशी, पवित्रा एकादशी और पवित्रोपना एकादशी कहा जाता है। धार्मिक ग्रंथों में इसे पुत्रदा एकादशी के रूप में वर्णित किया गया है। ‘पुत्रदा’ का अर्थ संतान प्रदान करने वाली एकादशी से लिया जाता है। वहीं ‘पवित्रा’ या ‘पवित्रोपना’ नाम इस दिन से जुड़ी विशेष धार्मिक परंपरा की ओर संकेत करता है। 

पवित्रा नाम क्यों पड़ा?

पवित्रा एकादशी के नाम को लेकर अलग-अलग क्षेत्रों में धार्मिक परंपराएं मिलती हैं। पवित्रोपना परंपरा में भगवान विष्णु को पवित्र नामक विशेष धागा अर्पित करने की मान्यता बताई जाती है। इस कारण भी सावन शुक्ल एकादशी को पवित्रोपना या पवित्रा एकादशी कहा जाता है। ‘पवित्र’ शब्द का संबंध शुद्ध और पवित्र करने वाली धार्मिक भावना से भी जोड़ा जाता है यानी इसे केवल इसलिए पवित्रा एकादशी नहीं कहा जाता कि इस दिन व्रत रखने से मन शुद्ध होता है, बल्कि इसके नाम के पीछे विशेष पूजा परंपरा भी जुड़ी हुई है।

 

Putrada Ekadashi

राजा महीजित की कथा

पवित्रा एकादशी की कथा में राजा महीजित का प्रसंग प्रमुख रूप से आता है। कथा के अनुसार, महीष्मती नगरी के राजा महीजित बहुत शक्तिशाली और धर्मपरायण थे, लेकिन उनके कोई संतान नहीं थी। संतान न होने के कारण राजा और उनकी प्रजा चिंतित रहती थी। राजा ने विद्वानों और ऋषियों से इसका उपाय पूछा। जब कोई समाधान नहीं मिला तो ऋषि लोमश के पास जाने की बात कही गई। ऋषि लोमश ने ध्यान करके राजा के पिछले जन्म के कर्मों के बारे में बताया।

पिछले जन्म से जुड़ा कारण

कथा के अनुसार, पिछले जन्म में राजा महीजित एक व्यापारी थे। एक बार यात्रा के दौरान उन्हें बहुत तेज प्यास लगी। उन्हें एक जलाशय दिखाई दिया, जहां एक गाय और उसका बछड़ा पानी पी रहे थे। व्यापारी ने उन्हें वहां से हटा दिया और खुद पानी पी लिया। ऋषि लोमश ने बताया कि इसी कर्म के कारण वर्तमान जन्म में राजा को संतान सुख नहीं मिल रहा था। इसके बाद ऋषि ने उन्हें सावन शुक्ल पक्ष की एकादशी का व्रत करने की सलाह दी। 

व्रत से पूरी हुई मनोकामना

ऋषि की सलाह पर राजा और रानी ने सावन शुक्ल एकादशी का व्रत रखा। भगवान विष्णु की पूजा की गई और पूरी श्रद्धा के साथ एकादशी का पालन किया गया। कथा के अनुसार, व्रत के पुण्य प्रभाव से राजा की संतान प्राप्ति की इच्छा पूरी हुई और उन्हें पुत्र की प्राप्ति हुई। इसी वजह से इस एकादशी को पुत्रदा एकादशी कहा जाता है।

 

Putrada Ekadashi

पवित्रा एकादशी का धार्मिक महत्व

पुत्रदा एकादशी को संतान की कामना से जुड़े व्रत के रूप में विशेष महत्व दिया गया है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, संतान की इच्छा रखने वाले दंपती इस दिन भगवान विष्णु की पूजा करते हैं और व्रत रखते हैं। इसके अलावा जिनके बच्चे हैं, वे भी संतान के सुख, दीर्घायु और मंगल की कामना से भगवान विष्णु की आराधना करते हैं। इस दिन भगवान विष्णु की पूजा के साथ एकादशी की कथा सुनने और उनका नाम स्मरण करने की परंपरा है।

पवित्रोपना परंपरा क्या है?

पवित्रा एकादशी का एक खास पहलू पवित्रोपना परंपरा है। कुछ वैष्णव परंपराओं में इस दिन भगवान विष्णु को पवित्र नामक धागा या माला अर्पित करने की परंपरा बताई जाती है। इसे भगवान के प्रति श्रद्धा और पूजा में हुई भूलों के लिए क्षमा मांगने से भी जोड़ा जाता है। हालांकि यह परंपरा सभी क्षेत्रों में एक जैसी नहीं है और अलग-अलग स्थानों पर इसके तरीके अलग मिलते हैं। 

भगवान विष्णु की होती है पूजा

पवित्रा एकादशी के दिन भगवान विष्णु की पूजा की जाती है। श्रद्धालु सुबह स्नान के बाद भगवान विष्णु का ध्यान करते हैं और उन्हें तुलसी दल, फल, फूल तथा नैवेद्य अर्पित करते हैं। इसके बाद एकादशी व्रत की कथा सुनी या पढ़ी जाती है। धार्मिक परंपरा में इस दिन भगवान विष्णु के नाम का जाप और रात्रि जागरण का भी उल्लेख मिलता है। व्रत रखने वाले श्रद्धालु अपनी क्षमता और पारिवारिक परंपरा के अनुसार उपवास करते हैं।
 
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(Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी ज्योतिषीय, पौराणिक और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है तथा केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है। अधिक जानकारी के लिए कृपया संबंधित विषय के विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य करें।) 

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