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Mangala Gauri Vrat: कब रखा जाएगा आखिरी मंगला गौरी व्रत? जानें तिथि, पूजन विधि और धार्मिक महत्व

जीवांजलि, धर्म डेस्कPublished by:
Shakshi
सार

Mangala Gauri Vrat: आखिरी मंगला गौरी व्रत के दिन सुबह स्नान करके स्वच्छ कपड़े पहनें और व्रत का संकल्प लें। इसके बाद पूजा स्थान को साफ करके एक चौकी पर लाल कपड़ा बिछाएं। इस पर माता मंगला गौरी की तस्वीर या प्रतिमा स्थापित करें।

Mangala Gauri Vrat
Mangala Gauri Vrat: सावन का महीना भगवान शिव और माता पार्वती की आराधना के लिए विशेष माना जाता है। सावन में जहां सोमवार का दिन भगवान शिव को समर्पित होता है, वहीं मंगलवार को माता गौरी की पूजा की जाती है। इसी वजह से सावन के मंगलवार को रखा जाने वाला मंगला गौरी व्रत सुहागिन महिलाओं के लिए खास माना जाता है। इस व्रत में महिलाएं माता पार्वती की पूजा कर अपने दांपत्य जीवन की सुख-शांति और पति की लंबी उम्र की कामना करती हैं। साल 2026 में मंगला गौरी व्रत की शुरुआत 4 अगस्त से हुई लेकिन क्या आपको पता है कि आखिरी मंगला गौरी व्रत कब रखा जाएगा और इस व्रत में पूजा किस तरह करनी चाहिए और इसका धार्मिक महत्व क्या है? आइए जानते हैं...

कब अगस्त को रखा जाएगा आखिरी व्रत

इस साल सावन का महीना 30 जुलाई से शुरू हुआ है। सावन में कुल चार मंगलवार पड़े हैं, जिन पर मंगला गौरी व्रत रखा जा रहा है। पहला व्रत 4 अगस्त, दूसरा 11 अगस्त और तीसरा 18 अगस्त को रखा गया। अब चौथा और आखिरी मंगला गौरी व्रत 25 अगस्त 2026, मंगलवार को रखा जाएगा। इसके बाद 28 अगस्त को सावन पूर्णिमा के साथ सावन मास समाप्त हो जाएगा। आखिरी मंगला गौरी व्रत 25 अगस्त को रखा जाएगा।

माता गौरी को समर्पित है व्रत

मंगला गौरी व्रत माता पार्वती के गौरी स्वरूप को समर्पित माना जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार माता गौरी सौभाग्य, दांपत्य सुख और मंगल की देवी मानी जाती हैं। इसी कारण सावन के मंगलवार को महिलाएं माता गौरी का व्रत रखकर उनकी पूजा करती हैं। खास तौर पर विवाहित महिलाएं इस व्रत को पति की दीर्घायु, सुखी दांपत्य जीवन और परिवार की खुशहाली की कामना से करती हैं। कई जगहों पर नवविवाहित महिलाओं के लिए भी इस व्रत की विशेष परंपरा देखने को मिलती है।

 

Mangala Gauri Vrat

कैसे करें मंगला गौरी की पूजा

आखिरी मंगला गौरी व्रत के दिन सुबह स्नान करके स्वच्छ कपड़े पहनें और व्रत का संकल्प लें। इसके बाद पूजा स्थान को साफ करके एक चौकी पर लाल कपड़ा बिछाएं। इस पर माता मंगला गौरी की तस्वीर या प्रतिमा स्थापित करें। पूजा में माता गौरी के साथ भगवान शिव और गणेश जी का पूजन भी किया जाता है। सबसे पहले गणेश जी का पूजन करें। इसके बाद माता गौरी को रोली, अक्षत, चंदन, सिंदूर, फूल, धूप और दीप अर्पित करें। मंगला गौरी व्रत की पूजा में 16 संख्या का विशेष महत्व बताया गया है। परंपरा के अनुसार माता को 16 श्रृंगार की सामग्री, 16 फूल, 16 पान, 16 सुपारी, 16 लौंग, 16 इलायची, 16 लड्डू और अन्य पूजन सामग्री अर्पित की जाती है। अपनी श्रद्धा और सामर्थ्य के अनुसार इन सामग्रियों का इस्तेमाल किया जा सकता है।

16 बत्तियों वाला दीपक

मंगला गौरी की पूजा में 16 बत्तियों वाले दीपक की भी परंपरा है। इसके लिए आटे का दीपक बनाकर उसमें 16 बत्तियां लगाई जाती हैं और घी का दीपक जलाया जाता है। इसके बाद माता गौरी का ध्यान करके उनकी विधि-विधान से पूजा की जाती है। पूजा के दौरान माता को सुहाग की सामग्री अर्पित करना भी शुभ माना जाता है। इसमें सिंदूर, चूड़ियां, बिंदी, मेहंदी और अन्य श्रृंगार सामग्री शामिल की जा सकती है।

 

Mangala Gauri Vrat

पढ़ें मंगला गौरी व्रत कथा

पूजा के बाद मंगला गौरी व्रत की कथा पढ़ना या सुनना परंपरा का हिस्सा माना जाता है। इसके बाद माता की आरती करें और परिवार की सुख-शांति की कामना करें। धार्मिक परंपरा के अनुसार व्रत रखने वाली महिलाएं दिनभर उपवास या फलाहार करती हैं और पूजा के बाद प्रसाद ग्रहण करती हैं। 

क्या है धार्मिक महत्व

मंगला गौरी व्रत को वैवाहिक जीवन से जुड़ी मनोकामनाओं के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है। धार्मिक मान्यता है कि माता गौरी की पूजा करने से महिलाओं को अखंड सौभाग्य और दांपत्य जीवन में सुख-शांति का आशीर्वाद मिलता है। इस व्रत में भगवान शिव और माता पार्वती की संयुक्त आराधना भी की जाती है। सावन शिव-पार्वती की आराधना का महीना माना जाता है, इसलिए सावन के मंगलवार को माता गौरी की पूजा का विशेष महत्व बताया गया है। 

आखिरी व्रत पर क्या करें

25 अगस्त को आखिरी मंगला गौरी व्रत रखने वाली महिलाएं सुबह स्नान के बाद संकल्प लेकर माता गौरी की पूजा कर सकती हैं। पूजा में 16 संख्या की सामग्री का इस्तेमाल, सुहाग की वस्तुएं अर्पित करना, 16 बत्तियों वाला दीपक जलाना, व्रत कथा सुनना और आरती करना प्रमुख परंपराएं हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार जो महिलाएं मंगला गौरी व्रत की परंपरा लंबे समय तक निभाती हैं, वे निर्धारित अवधि के बाद उद्यापन भी करती हैं।


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(Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी ज्योतिषीय, पौराणिक और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है तथा केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है। अधिक जानकारी के लिए कृपया संबंधित विषय के विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य करें।) 

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