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Mangala Gauri Vrat: कब रखा जाएगा दूसरा मंगला गौरी व्रत, जानें तिथि, शुभ मुहूर्त, पूजन विधि और धार्मिक महत्व

जीवांजलि, धर्म डेस्कPublished by:
Shakshi
सार

Mangala Gauri Vrat: धार्मिक मान्यताओं के अनुसार मंगला गौरी माता पार्वती का ही मंगलमयी स्वरूप हैं। माता पार्वती ने भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त करने के लिए कठोर तप किया था। 

Mangala Gauri Vrat Details: 
Mangala Gauri Vrat Details: सावन का महीना भगवान शिव और माता पार्वती की आराधना के लिए सबसे पवित्र समय माना जाता है। इस पूरे महीने में आने वाले प्रत्येक मंगलवार को मंगला गौरी व्रत रखा जाता है। विशेष रूप से विवाहित महिलाएं अपने अखंड सौभाग्य, पति की लंबी आयु और सुखी दांपत्य जीवन की कामना से यह व्रत करती हैं। वहीं कई अविवाहित कन्याएं भी मनचाहा वर पाने की इच्छा से माता गौरी की पूजा करती हैं। अब पहले मंगला गौरी व्रत के बाद श्रद्धालुओं की नजर दूसरे मंगला गौरी व्रत पर है। क्या आप जानते हैं कि इस बार दूसरा मंगला गौरी व्रत कब रखा जाएगा? इसका शुभ मुहूर्त क्या है और पूजा किस विधि से करनी चाहिए? आइए जानते हैं।

कब है दूसरा मंगला गौरी व्रत?

पंचांग के अनुसार वर्ष 2026 में दूसरा मंगला गौरी व्रत 11 अगस्त 2026, मंगलवार को रखा जाएगा। सावन माह के प्रत्येक मंगलवार को यह व्रत किया जाता है और इस दिन माता गौरी के साथ भगवान शिव की भी विशेष पूजा की जाती है। धार्मिक मान्यता है कि श्रद्धा और नियमपूर्वक किया गया यह व्रत वैवाहिक जीवन में सुख-समृद्धि और सौभाग्य का आशीर्वाद प्रदान करता है।

दूसरे मंगला गौरी व्रत का शुभ मुहूर्त

वर्ष 2026 में सावन मास का दूसरा मंगला गौरी व्रत 11 अगस्त 2026 को है। इस दिन पूजा के लिए ब्रह्म मुहूर्त सुबह 04:20 से 05:02 तक, अभिजीत मुहूर्त दोपहर 12:00 से 12:54 तक और सामान्य पूजा का शुभ समय सुबह 09:06 से दोपहर 02:08 तक रहेगा।

 

Mangala Gauri Vrat Details: 

मंगला गौरी व्रत का धार्मिक महत्व

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार मंगला गौरी माता पार्वती का ही मंगलमयी स्वरूप हैं। माता पार्वती ने भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त करने के लिए कठोर तप किया था। इसी कारण विवाहित महिलाएं अपने दांपत्य जीवन की सुख-समृद्धि और पति की दीर्घायु के लिए इस व्रत को विशेष महत्व देती हैं।

मान्यता यह भी है कि जो महिलाएं सावन के सभी मंगलवारों को नियमपूर्वक मंगला गौरी व्रत करती हैं, उनके वैवाहिक जीवन में प्रेम, विश्वास और खुशहाली बनी रहती है। वहीं अविवाहित कन्याएं योग्य जीवनसाथी की कामना से इस व्रत को करती हैं। 

व्रत की शुरुआत कैसे करें?

सुबह ब्रह्म मुहूर्त या सूर्योदय के बाद उठकर स्नान करें और साफ या नए वस्त्र धारण करें। इसके बाद पूजा स्थान की सफाई कर लकड़ी की चौकी पर लाल या पीला वस्त्र बिछाएं। चौकी पर माता गौरी और भगवान शिव की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें। फिर व्रत का संकल्प लें और पूरे दिन नियमों का पालन करने का संकल्प करें।

पूजा के लिए आवश्यक सामग्री

माता गौरी और भगवान शिव की प्रतिमा या चित्र, लाल या पीला वस्त्र, रोली, हल्दी, कुमकुम, अक्षत, पुष्प और माला, बेलपत्र, दूर्वा, चंदन, धूप और दीप, घी, मौसमी फल, नारियल, पान, सुपारी, मिठाई, पंचामृत, श्रृंगार सामग्री, कलश और गंगाजल।

 

Mangala Gauri Vrat Details: 

इस विधि से करें माता गौरी की पूजा

मंगला गौरी व्रत के दिन प्रातःकाल जल्दी उठकर स्नान करें और स्वच्छ वस्त्र धारण करें। घर के पूजा स्थान को अच्छी तरह साफ करें और एक चौकी पर लाल या पीला वस्त्र बिछाकर माता गौरी की प्रतिमा स्थापित करें। यदि संभव हो तो भगवान शिव की प्रतिमा या शिवलिंग भी साथ में स्थापित करें।

इसके बाद कलश की स्थापना करें और उसमें जल, आम के पत्ते तथा नारियल रखें। सबसे पहले भगवान गणेश का स्मरण करें और पूजा का संकल्प लें। अब माता गौरी और भगवान शिव को गंगाजल अर्पित करें तथा रोली, हल्दी, अक्षत, पुष्प और सुहाग की सामग्री अर्पित करें।

माता गौरी को लाल पुष्प, सिंदूर, चूड़ियां, बिंदी, चुनरी और श्रृंगार का सामान अर्पित करना शुभ माना जाता है। इसके बाद धूप और दीप जलाकर विधिपूर्वक आरती करें। पूजा के दौरान मंगला गौरी व्रत कथा का पाठ या श्रवण अवश्य करें। कथा के बाद माता गौरी से परिवार की सुख-समृद्धि, पति की लंबी आयु और दांपत्य जीवन की खुशहाली की प्रार्थना करें। पूजा पूरी होने के बाद प्रसाद वितरित करें और अपनी श्रद्धा के अनुसार दान-दक्षिणा दें।
 

व्रत के दौरान किन नियमों का पालन किया जाता है?

मंगला गौरी व्रत में श्रद्धा और संयम का विशेष महत्व माना जाता है। व्रती को दिनभर सात्विक आचरण रखना चाहिए। कई महिलाएं निर्जल या फलाहार व्रत रखती हैं, जबकि कुछ एक समय सात्विक भोजन ग्रहण करती हैं। दिनभर माता गौरी का स्मरण, मंत्र जाप और पूजा करने की परंपरा है। व्रत के दिन क्रोध, विवाद और नकारात्मक व्यवहार से बचने की भी धार्मिक मान्यता है। पूजा पूरी होने के बाद प्रसाद ग्रहण किया जाता है।

16 संख्या का विशेष महत्व

मंगला गौरी व्रत में 16 संख्या का विशेष महत्व बताया गया है। कई परंपराओं में माता गौरी को 16 श्रृंगार अर्पित किए जाते हैं। कुछ स्थानों पर 16 दीपक जलाने, 16 प्रकार के पूजन अर्पित करने या 16 बार आरती करने की भी परंपरा देखने को मिलती है। यह माता के पूर्ण सौभाग्य स्वरूप की आराधना का प्रतीक माना जाता है। 

मंगला गौरी व्रत का धार्मिक महत्व

धार्मिक मान्यता के अनुसार मंगला गौरी व्रत माता पार्वती की आराधना का विशेष अवसर है। कहा जाता है कि माता पार्वती ने कठोर तपस्या करके भगवान शिव को पति के रूप में प्राप्त किया था। इसी कारण यह व्रत अखंड सौभाग्य, सुखी वैवाहिक जीवन और परिवार की समृद्धि से जुड़ा माना जाता है। विवाहित महिलाएं पति की लंबी आयु और परिवार के सुख-शांति की कामना से यह व्रत करती हैं, जबकि अविवाहित कन्याएं योग्य जीवनसाथी की प्राप्ति के लिए माता गौरी की पूजा करती हैं। धार्मिक ग्रंथों में इस व्रत को सौभाग्य और मंगल का प्रतीक माना गया है।





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(Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी ज्योतिषीय, पौराणिक और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है तथा केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है। अधिक जानकारी के लिए कृपया संबंधित विषय के विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य करें।)

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