Parama Ekadashi 2026: द्वादशी तिथि के दिन प्रातःकाल ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान करें और स्वच्छ वस्त्र धारण करें। इसके बाद घर के पूजा स्थल में भगवान विष्णु, माता लक्ष्मी और तुलसी जी का पूजन करें।
Parama Ekadashi 2026: सनातन धर्म में एकादशी व्रत का विशेष महत्व बताया गया है। अधिक मास के कृष्ण पक्ष में आने वाली परमा एकादशी को भगवान विष्णु की आराधना के लिए अत्यंत पुण्यदायी माना जाता है। इस दिन श्रद्धालु विधि-विधान से व्रत रखकर भगवान विष्णु का पूजन करते हैं और अगले दिन द्वादशी तिथि में व्रत का पारण करते हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, एकादशी व्रत तभी पूर्ण माना जाता है जब उसका पारण शास्त्रसम्मत विधि से किया जाए।
आज परमा एकादशी का व्रत रखा जा रहा है, इसलिए व्रतधारियों के लिए पारण की विधि, नियम और धार्मिक महत्व जानना आवश्यक है। आइए जानते हैं कि परमा एकादशी व्रत का पारण किस प्रकार किया जाता है।
क्या होता है पारण?
हिंदू धर्म में व्रत के समापन की प्रक्रिया को पारण कहा जाता है। एकादशी के दिन उपवास रखने के बाद द्वादशी तिथि में उचित समय पर अन्न या फल ग्रहण करके व्रत का समापन किया जाता है। शास्त्रों में बताया गया है कि यदि व्रत का पारण सही समय पर न किया जाए तो व्रत का पूर्ण फल प्राप्त नहीं होता। परमा एकादशी का व्रत भगवान विष्णु को समर्पित है, इसलिए पारण से पहले भगवान का स्मरण और पूजा करना आवश्यक माना गया है।
परमा एकादशी व्रत पारण की संपूर्ण विधि
द्वादशी तिथि के दिन प्रातःकाल ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान करें और स्वच्छ वस्त्र धारण करें। इसके बाद घर के पूजा स्थल में भगवान विष्णु, माता लक्ष्मी और तुलसी जी का पूजन करें।
पूजन के दौरान भगवान विष्णु को पीले पुष्प, तुलसी दल, चंदन और नैवेद्य अर्पित करें। इसके बाद व्रत पूर्ण होने की प्रार्थना करते हुए भगवान से आशीर्वाद मांगें।
पारण करने से पहले भगवान विष्णु को भोग लगाना शुभ माना जाता है। भोग में फल, मिष्ठान्न, खीर या सात्विक भोजन अर्पित किया जा सकता है। भोग अर्पित करने के बाद प्रसाद ग्रहण करें।
इसके पश्चात जल पीकर, तुलसी पत्र ग्रहण करके या सात्विक भोजन करके व्रत का पारण किया जाता है। कई श्रद्धालु सबसे पहले तुलसी युक्त जल ग्रहण कर पारण आरंभ करते हैं, जिसे अत्यंत शुभ माना गया है।
पारण के समय किन बातों का रखें ध्यान?
धार्मिक ग्रंथों के अनुसार पारण सदैव द्वादशी तिथि में ही करना चाहिए। द्वादशी तिथि समाप्त होने के बाद पारण करना उचित नहीं माना जाता। पारण के समय सात्विक भोजन ही ग्रहण करना चाहिए। लहसुन, प्याज, मांसाहार और तामसिक पदार्थों से बचना चाहिए।
व्रत समाप्त होने के बाद भी भगवान विष्णु का स्मरण करते हुए भोजन ग्रहण करना शुभ माना जाता है। यदि किसी कारणवश पूर्ण भोजन करना संभव न हो तो फल, दूध या जल ग्रहण करके भी पारण किया जा सकता है। हालांकि पारण का समय निकलने से पहले व्रत का समापन करना आवश्यक माना गया है।
पारण से पहले दान का महत्व
परमा एकादशी के संदर्भ में दान-पुण्य का विशेष महत्व बताया गया है। द्वादशी के दिन पारण से पूर्व या पारण के बाद अपनी श्रद्धा अनुसार ब्राह्मण, साधु-संत, जरूरतमंद या गौ सेवा के लिए दान देना शुभ माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार अन्न, वस्त्र, दक्षिणा, फल या जलदान करने से व्रत का पुण्य और अधिक बढ़ता है। कई श्रद्धालु इस दिन भगवान विष्णु के नाम से अन्नदान भी करते हैं।
परमा एकादशी और पंचरात्रि व्रत का संबंध
अधिक मास की परमा एकादशी का संबंध पंचरात्रि व्रत से भी बताया गया है। कुछ श्रद्धालु एकादशी से आरंभ होकर पांच दिनों तक विशेष नियमों का पालन करते हैं। ऐसे साधक भी द्वादशी तिथि में एकादशी व्रत का पारण करते हैं, जबकि पंचरात्रि व्रत की अन्य धार्मिक प्रक्रियाएं निर्धारित नियमों के अनुसार आगे चलती हैं।
धार्मिक ग्रंथों में परमा एकादशी को भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त करने वाली विशेष एकादशी माना गया है, इसलिए इस दिन रखा गया व्रत और उसका विधिपूर्वक पारण दोनों समान रूप से महत्वपूर्ण माने जाते हैं।
पारण के दौरान तुलसी का विशेष महत्व
भगवान विष्णु की पूजा में तुलसी का विशेष स्थान है। मान्यता है कि तुलसी के बिना भगवान विष्णु की पूजा अधूरी मानी जाती है। इसी कारण एकादशी व्रत के पारण में भी तुलसी का उपयोग शुभ माना गया है। कई परंपराओं में पारण की शुरुआत तुलसी दल युक्त जल ग्रहण करके की जाती है। इसके बाद भगवान का प्रसाद ग्रहण कर सात्विक भोजन किया जाता है। इससे व्रत की धार्मिक प्रक्रिया पूर्ण मानी जाती है।