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Kokila Vrat Katha: कोकिला व्रत पर जरूर पढ़ें ये व्रत कथा, घर में बनी रहेगी सुख-समृद्धि

जीवांजलि, धर्म डेस्कPublished by:
Shakshi
सार

Kokila Vrat Katha: भगवान शिव के वचन के अनुसार माता पार्वती ने पृथ्वी पर कोयल का रूप धारण किया। कहा जाता है कि उन्होंने घने वन में निवास किया, जहां वे निरंतर भगवान शिव का ध्यान करती रहीं। 

Kokila Vrat Katha
Kokila Vrat Katha: सनातन धर्म में कोकिला व्रत का विशेष महत्व माना गया है। यह व्रत मुख्य रूप से भगवान शिव और माता पार्वती को समर्पित होता है। धार्मिक मान्यता है कि इस दिन व्रत के साथ कोकिला व्रत कथा का श्रवण या पाठ अवश्य करना चाहिए। पौराणिक कथाओं के अनुसार यह व्रत माता पार्वती के उस प्रसंग से जुड़ा है, जब उन्हें एक शाप के कारण कोयल (कोकिला) का रूप धारण करना पड़ा था। इसी कारण इस व्रत का नाम कोकिला व्रत पड़ा। मान्यता है कि विधिपूर्वक व्रत रखकर श्रद्धा से इस कथा का पाठ करने से भगवान शिव और माता पार्वती की कृपा प्राप्त होती है तथा परिवार में सुख-समृद्धि और सौभाग्य बना रहता है। आइए जानते हैं कोकिला व्रत से जुड़ी संपूर्ण पौराणिक कथा...

माता पार्वती को क्यों धारण करना पड़ा कोकिला का रूप?

पौराणिक कथा के अनुसार एक समय कैलाश पर्वत पर भगवान शिव और माता पार्वती विराजमान थे। उसी समय किसी कारणवश दोनों के बीच वार्तालाप के दौरान मतभेद उत्पन्न हो गया। भगवान शिव ने माता पार्वती से कुछ कहा, जिसका उत्तर देवी ने क्रोधवश कठोर शब्दों में दे दिया। भगवान शिव ने इसे अनुचित माना और क्रोधित होकर माता पार्वती को शाप दे दिया कि उन्हें कुछ समय तक कोयल अर्थात कोकिला का रूप धारण कर पृथ्वी पर रहना होगा।

भगवान शिव के मुख से शाप सुनते ही माता पार्वती अत्यंत व्यथित हो गईं। उन्होंने भगवान शिव से क्षमा याचना की और शाप से मुक्ति का उपाय पूछा। तब भगवान शिव का क्रोध शांत हुआ और उन्होंने कहा कि शाप की अवधि पूर्ण होने पर तथा कठोर तप और उनका स्मरण करने पर उन्हें पुनः अपना दिव्य स्वरूप प्राप्त होगा।

 

Kokila Vrat Katha

पृथ्वी पर कोकिला रूप में माता पार्वती का निवास

भगवान शिव के वचन के अनुसार माता पार्वती ने पृथ्वी पर कोयल का रूप धारण किया। कहा जाता है कि उन्होंने घने वन में निवास किया, जहां वे निरंतर भगवान शिव का ध्यान करती रहीं। कोकिला रूप में रहते हुए उन्होंने किसी प्रकार का अहंकार नहीं किया और पूरी श्रद्धा के साथ तपस्या में लीन रहीं। वन में रहने के दौरान उनकी मधुर वाणी को सुनकर ऋषि-मुनि और वन्य जीव भी आकर्षित हो जाते थे। किंतु माता पार्वती का संपूर्ण मन भगवान शिव के ध्यान में ही लगा रहता था। वे दिन-रात शिव नाम का जप करती थीं और अपने शाप की अवधि समाप्त होने की प्रतीक्षा करती रहीं।

कठोर तपस्या से प्रसन्न हुए भगवान शिव

दीर्घकाल तक तप करने के बाद भगवान शिव माता पार्वती की भक्ति और तपस्या से अत्यंत प्रसन्न हुए। उन्होंने कोकिला रूप में ही माता पार्वती को दर्शन दिए। भगवान शिव ने कहा कि उनकी तपस्या पूर्ण हो चुकी है और अब शाप की अवधि भी समाप्त हो गई है। इसके बाद भगवान शिव ने माता पार्वती को पुनः उनका दिव्य स्वरूप प्रदान किया। माता पार्वती अपने वास्तविक रूप में वापस कैलाश लौट आईं। भगवान शिव और माता पार्वती का पुनर्मिलन अत्यंत मंगलमय माना गया। इसी घटना की स्मृति में कोकिला व्रत का विधान प्रचलित हुआ।

 

Kokila Vrat Katha

कोकिला व्रत कथा

धार्मिक परंपरा के अनुसार एक नगर में एक धर्मनिष्ठ स्त्री रहती थी। वह भगवान शिव और माता पार्वती की अनन्य भक्त थी। उसके जीवन में अनेक प्रकार की कठिनाइयां थीं, लेकिन उसने कभी अपनी भक्ति नहीं छोड़ी। एक दिन उसे एक विद्वान ब्राह्मण से कोकिला व्रत के विषय में जानकारी मिली। ब्राह्मण ने उसे बताया कि यदि श्रद्धा और नियमपूर्वक कोकिला व्रत रखकर माता पार्वती की कथा सुनी जाए तो भगवान शिव और माता पार्वती की कृपा प्राप्त होती है।

उस स्त्री ने पूर्ण श्रद्धा के साथ व्रत का संकल्प लिया। उसने प्रातः स्नान कर भगवान शिव और माता पार्वती का पूजन किया। पूरे दिन उपवास रखा और संध्या के समय कोकिला व्रत कथा का श्रवण किया। पूजा के बाद उसने भगवान शिव से प्रार्थना की कि जिस प्रकार उन्होंने माता पार्वती को शाप से मुक्त कर पुनः अपना सान्निध्य दिया, उसी प्रकार उसके जीवन की सभी बाधाएं भी दूर करें।

कुछ समय बाद उसके जीवन की कठिन परिस्थितियां समाप्त होने लगीं। उसके परिवार में सुख-शांति का वातावरण स्थापित हुआ और घर में समृद्धि का वास हुआ। इस घटना के बाद नगर के अनेक लोगों ने भी श्रद्धा से कोकिला व्रत करना आरंभ किया। कहा जाता है कि तभी से इस व्रत की महिमा दूर-दूर तक प्रसिद्ध हो गई।

कथा श्रवण का धार्मिक विधान

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार कोकिला व्रत के दिन भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा के बाद इस कथा का पाठ या श्रवण किया जाता है। कथा सुनने के पश्चात शिव-पार्वती की आरती की जाती है और उनसे अखंड सौभाग्य, सुख-समृद्धि तथा परिवार के कल्याण की प्रार्थना की जाती है। मान्यता है कि बिना कथा सुने या पढ़े व्रत की धार्मिक प्रक्रिया पूर्ण नहीं मानी जाती। 




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(Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी ज्योतिषीय, पौराणिक और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है तथा केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है। अधिक जानकारी के लिए कृपया संबंधित विषय के विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य करें।)

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