Jaya Parvati Vrat Katha: धार्मिक मान्यताओं के अनुसार जया पार्वती व्रत की पूजा तब पूर्ण मानी जाती है, जब मां पार्वती की आराधना के साथ इस व्रत कथा का श्रद्धापूर्वक श्रवण या पाठ किया जाए।
Jaya Parvati Vrat Katha: सनातन धर्म में जया पार्वती व्रत का विशेष महत्व माना गया है। यह व्रत मुख्य रूप से मां पार्वती और भगवान शिव को समर्पित होता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, यह व्रत विशेष रूप से अखंड सौभाग्य, सुखी दांपत्य जीवन और योग्य वर की प्राप्ति के लिए किया जाता है। विवाहित महिलाएं अपने पति की लंबी आयु और वैवाहिक सुख के लिए इस व्रत का पालन करती है। वहीं अविवाहित कन्याएं भगवान शिव जैसे श्रैष्ठ वर की कामना से यह व्रत रखती हैं। जया पार्वती व्रत के दौरान मां पार्वती की पूजा के साथ व्रत कथा का श्रवण और पाठ अत्यंत शुभ माना गया है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, इस व्रत की कथा का श्रद्धापूर्वक पाठ करने से मां गौरी की विशेष कृपा प्राप्त होती है।
जया पार्वती व्रत की पौराणिक कथा
प्राचीन समय की बात है। एक नगर में एक धर्मनिष्ठ ब्राह्मण दंपति निवास करते थे। दोनों भगवान शिव और मां पार्वती के परम भक्त थे। उनके घर में धन-धान्य की कोई कमी नहीं थी, लेकिन संतान न होने के कारण उनका जीवन अधूरा प्रतीत होता था। दोनों प्रतिदिन शिव-पार्वती की पूजा करते और संतान प्राप्ति के लिए प्रार्थना करते थे। एक दिन एक संत उनके घर आए। ब्राह्मण दंपति ने श्रद्धा से उनकी सेवा की। उनकी सेवा से प्रसन्न होकर संत ने उनके दुख का कारण पूछा। तब ब्राह्मण ने विनम्रता से कहा कि जीवन में सब कुछ होने के बावजूद संतान का सुख नहीं मिला है।
संत ने ध्यान लगाकर कहा कि नगर से दूर वन में एक प्राचीन शिवलिंग स्थापित है। वह स्थान वर्षों से उपेक्षित पड़ा है। यदि वे दोनों वहां जाकर श्रद्धापूर्वक भगवान शिव और मां पार्वती की आराधना करें तथा नियमपूर्वक जया पार्वती व्रत का पालन करें तो उनकी मनोकामना अवश्य पूरी होगी।
वन में शिव-पार्वती की आराधना
संत के निर्देशानुसार ब्राह्मण और उनकी पत्नी प्रतिदिन वन में स्थित शिवलिंग के पास जाने लगे। वहां उन्होंने स्थान की सफाई की, जलाभिषेक किया, बेलपत्र, पुष्प और धूप-दीप अर्पित किए। दोनों पूर्ण श्रद्धा के साथ भगवान शिव और मां पार्वती का स्मरण करते हुए जया पार्वती व्रत का पालन करने लगे। कई दिनों तक उन्होंने बिना किसी बाधा के यह व्रत किया। एक दिन पूजा के बाद जब ब्राह्मण लौट रहे थे, तभी उन्हें एक विषैले सर्प ने डस लिया। कुछ ही क्षणों में उनका शरीर निश्चेष्ट होकर भूमि पर गिर पड़ा।
मां पार्वती ने सुनी भक्त की पुकार
जब ब्राह्मणी ने अपने पति को मृत अवस्था में देखा तो वह विलाप करने लगी। उसने भगवान शिव और मां पार्वती का स्मरण करते हुए प्रार्थना की कि यदि उसकी भक्ति सच्ची है और उसने पूरे नियम से जया पार्वती व्रत किया है तो उसके पति के प्राण वापस लौटा दिए जाएं। ब्राह्मणी की करुण पुकार सुनकर मां पार्वती अत्यंत द्रवित हो गईं। उन्होंने भगवान शिव से अपने भक्त पर कृपा करने का आग्रह किया। भगवान शिव ने मां पार्वती की प्रार्थना स्वीकार की और अपनी दिव्य शक्ति से ब्राह्मण को पुनर्जीवित कर दिया। जब ब्राह्मण को चेतना प्राप्त हुई तो दोनों पति-पत्नी भगवान शिव और मां पार्वती के चरणों में नतमस्तक हो गए। उन्होंने अपनी रक्षा और कृपा के लिए बार-बार प्रणाम किया।
मां पार्वती ने दिया सौभाग्य का वरदान
भक्त दंपति की अटूट श्रद्धा और व्रत के पालन से प्रसन्न होकर मां पार्वती ने उन्हें अखंड सौभाग्य, सुखी दांपत्य जीवन और संतान सुख का वरदान दिया। भगवान शिव ने भी आशीर्वाद देते हुए कहा कि जो भी श्रद्धापूर्वक जया पार्वती व्रत करेगा और इसकी कथा का पाठ अथवा श्रवण करेगा, उस पर मां गौरी की कृपा बनी रहेगी। कुछ समय बाद ब्राह्मण दंपति के घर एक तेजस्वी पुत्र का जन्म हुआ। उनका परिवार सुख, समृद्धि और आनंद से भर गया। नगर में इस चमत्कार की चर्चा होने लगी और अनेक लोगों ने श्रद्धा के साथ जया पार्वती व्रत करना आरंभ कर दिया।
भगवान शिव और मां पार्वती की तपस्या से जुड़ी मान्यता
एक अन्य पौराणिक मान्यता के अनुसार देवी पार्वती ने भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त करने के लिए अत्यंत कठोर तप किया था। उन्होंने अनेक वर्षों तक कठिन व्रत और उपवास रखकर भगवान शिव की आराधना की। उनकी अटूट तपस्या और समर्पण से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें अपनी अर्धांगिनी के रूप में स्वीकार किया। इसी स्मृति में मां पार्वती की आराधना के साथ जया पार्वती व्रत का विधान बताया गया है। इस व्रत में माता गौरी का पूजन कर उनके समक्ष दांपत्य सुख और अखंड सौभाग्य की कामना की जाती है तथा व्रत कथा का पाठ किया जाता है।
जया पार्वती व्रत कथा का पाठ क्यों किया जाता है
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार जया पार्वती व्रत की पूजा तब पूर्ण मानी जाती है, जब मां पार्वती की आराधना के साथ इस व्रत कथा का श्रद्धापूर्वक श्रवण या पाठ किया जाए। कथा में भक्त की निष्ठा, मां पार्वती की करुणा और भगवान शिव की कृपा का वर्णन मिलता है। इसी कारण व्रत के दौरान कथा का विशेष स्थान बताया गया है। व्रत करने वाली महिलाएं पूजा के बाद मां गौरी और भगवान शिव के समक्ष दीप प्रज्वलित कर इस कथा का पाठ करती हैं। कई स्थानों पर परिवार के सभी सदस्य एक साथ बैठकर कथा सुनते हैं और अंत में भगवान शिव तथा मां पार्वती की आरती कर प्रसाद ग्रहण करते हैं।
(Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी ज्योतिषीय, पौराणिक और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है तथा केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है। अधिक जानकारी के लिए कृपया संबंधित विषय के विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य करें।)