Narak Chaturdashi 2026: दीपावली का पर्व केवल दीप जलाने और खुशियां मनाने तक सीमित नहीं है, बल्कि इससे कई पौराणिक कथाएं और धार्मिक मान्यताएं भी जुड़ी हुई हैं। दीपावली से एक दिन पहले मनाई जाने वाली नरक चतुर्दशी का विशेष महत्व है। इसे छोटी दिवाली और रूप चौदस के नाम से भी जाना जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, इसी दिन भगवान श्रीकृष्ण ने अत्याचारी राक्षस नरकासुर का वध करके हजारों बंदी महिलाओं को उसके अत्याचारों से मुक्त कराया था। यही वजह है कि इस दिन भगवान श्रीकृष्ण की पूजा करना शुभ माना जाता है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि नरकासुर कौन था और उसके वध के पीछे भगवान श्रीकृष्ण की क्या भूमिका थी? आइए जानते हैं नरक चतुर्दशी पर श्रीकृष्ण की पूजा का पौराणिक महत्व और इससे जुड़ी मान्यताएं।
कब है नरक चतुर्दशी 2026?
हिंदू पंचांग के अनुसार, नरक चतुर्दशी का पर्व कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि को मनाया जाता है। वर्ष 2026 में नरक चतुर्दशी 8 नवंबर, रविवार को मनाई जाएगी। इस दिन सुबह सूर्योदय से पहले अभ्यंग स्नान करने की परंपरा है। दिल्ली में अभ्यंग स्नान का शुभ समय सुबह 5 बजकर 41 मिनट से 6 बजकर 38 मिनट तक रहेगा। चतुर्दशी तिथि 7 नवंबर को सुबह 10 बजकर 47 मिनट से शुरू होकर 8 नवंबर को सुबह 11 बजकर 27 मिनट तक रहेगी।
कौन था नरकासुर?
पौराणिक कथाओं के अनुसार, नरकासुर को भौमासुर के नाम से भी जाना जाता था। वह धरती माता का पुत्र था और प्राग्ज्योतिषपुर नामक स्थान पर शासन करता था। शुरुआत में वह शक्तिशाली और पराक्रमी था, लेकिन धीरे-धीरे उसके अंदर अहंकार बढ़ने लगा। अपनी शक्ति के घमंड में उसने देवताओं और ऋषियों को परेशान करना शुरू कर दिया। उसने देवताओं की माता अदिति के कुंडल छीन लिए और कई राजकुमारियों को बंदी बनाकर अपने महल में कैद कर लिया था। उसके अत्याचारों से परेशान होकर देवताओं ने भगवान श्रीकृष्ण से सहायता मांगी।
श्रीकृष्ण ने क्यों किया नरकासुर का वध?
धार्मिक कथाओं के अनुसार, देवताओं की प्रार्थना सुनकर भगवान श्रीकृष्ण ने नरकासुर का अंत करने का निश्चय किया। इस युद्ध में उनकी पत्नी सत्यभामा भी उनके साथ गई थीं। भगवान श्रीकृष्ण गरुड़ पर सवार होकर नरकासुर के राज्य पहुंचे। वहां पहुंचकर उन्होंने नरकासुर की सेना और उसके शक्तिशाली सेनापतियों का सामना किया। इसके बाद भयंकर युद्ध हुआ, जिसमें भगवान श्रीकृष्ण ने अपने सुदर्शन चक्र से नरकासुर का वध कर दिया। नरकासुर के मारे जाने के बाद उसके महल में बंदी बनाई गई हजारों महिलाओं को मुक्त कराया गया। भागवत पुराण के अनुसार, इनकी संख्या 16 हजार बताई गई है।
सत्यभामा की क्या थी भूमिका?
नरकासुर के वध की कथा में सत्यभामा की भूमिका भी विशेष मानी जाती है। कई प्रचलित धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, सत्यभामा को धरती माता का अवतार माना जाता है। कुछ लोककथाओं में बताया जाता है कि नरकासुर को वरदान प्राप्त था कि उसकी मृत्यु उसकी माता के हाथों ही होगी। इसी वजह से सत्यभामा ने भगवान श्रीकृष्ण के साथ युद्ध में हिस्सा लिया और नरकासुर के अंत में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही। हालांकि, भागवत पुराण में भगवान श्रीकृष्ण द्वारा सुदर्शन चक्र से नरकासुर का वध किए जाने का वर्णन मिलता है। इस कथा के माध्यम से श्रीकृष्ण और सत्यभामा की वीरता का भी स्मरण किया जाता है।
नरक चतुर्दशी पर श्रीकृष्ण की पूजा का महत्व
नरक चतुर्दशी पर भगवान श्रीकृष्ण की पूजा करने के पीछे सबसे बड़ी मान्यता बुराई पर अच्छाई की जीत से जुड़ी है। धार्मिक विश्वास है कि इस दिन श्रीकृष्ण की आराधना करने से जीवन के नकारात्मक प्रभावों और बुरी शक्तियों से मुक्ति मिलती है। जिस प्रकार भगवान श्रीकृष्ण ने नरकासुर के अत्याचारों का अंत करके लोगों को भय से मुक्त कराया था, उसी प्रकार भक्त भी उनसे अपने जीवन के कष्ट दूर करने और सुख-शांति बनाए रखने की प्रार्थना करते हैं। इस दिन श्रीकृष्ण के साथ सत्यभामा का स्मरण करना भी शुभ माना जाता है।
कैसे करें भगवान श्रीकृष्ण की पूजा?
नरक चतुर्दशी के दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान करने के बाद स्वच्छ वस्त्र धारण करने की परंपरा है। इसके बाद भगवान श्रीकृष्ण की प्रतिमा या तस्वीर के सामने दीपक जलाकर पूजा की जा सकती है। उन्हें फूल, तुलसी दल, फल और माखन-मिश्री अर्पित किए जाते हैं। इसके बाद भगवान श्रीकृष्ण के मंत्रों का जाप और उनकी आरती की जाती है। भक्त इस दिन नरकासुर वध की कथा का श्रवण भी करते हैं। मान्यता है कि सच्चे मन से भगवान की आराधना करने से उनका आशीर्वाद प्राप्त होता है।
नरक चतुर्दशी पर दीपक जलाने की परंपरा
नरक चतुर्दशी पर दीपक जलाने की परंपरा भी भगवान श्रीकृष्ण द्वारा नरकासुर के वध से जुड़ी मानी जाती है। पौराणिक मान्यता के अनुसार, नरकासुर के अंत के बाद लोगों ने खुशी में दीप जलाकर इस विजय का उत्सव मनाया था। तभी से इस दिन घरों में दीपक जलाने की परंपरा प्रचलित हुई। इसके अलावा शाम के समय यमदेव के नाम से दीपदान करने की भी मान्यता है। इस दिन जलाए जाने वाले दीपक अंधकार पर प्रकाश और बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक माने जाते हैं।
अभ्यंग स्नान का भी है विशेष महत्व
नरक चतुर्दशी पर सूर्योदय से पहले अभ्यंग स्नान करना विशेष फलदायी माना जाता है। इस दिन शरीर पर तिल के तेल से मालिश करके उबटन लगाने और फिर स्नान करने की परंपरा है। धार्मिक मान्यता है कि भगवान श्रीकृष्ण ने नरकासुर का वध करने के बाद अभ्यंग स्नान किया था। इसलिए भक्त भी इस दिन स्नान करके अपने शरीर और मन की शुद्धि का संकल्प लेते हैं। उत्तर भारत में इसी परंपरा के कारण नरक चतुर्दशी को रूप चौदस भी कहा जाता है।
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(Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी ज्योतिषीय, पौराणिक और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है तथा केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है। अधिक जानकारी के लिए कृपया संबंधित विषय के विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य करें।)