Narak Chaturdashi: दिवाली से एक दिन पहले मनाई जाने वाली नरक चतुर्दशी को छोटी दिवाली और रूप चौदस के नाम से भी जाना जाता है। इस दिन घरों में दीपक जलाने की परंपरा है, लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि छोटी दिवाली पर यमराज के नाम का दीपक क्यों जलाया जाता है? आखिर इस परंपरा के पीछे कौन-सी पौराणिक कथा जुड़ी है और यमराज को दीपदान करने से क्या फल मिलने की मान्यता है? आइए जानते हैं नरक चतुर्दशी पर यम दीपक जलाने की वजह और इससे जुड़ी पौराणिक कथा...
नरक चतुर्दशी पर यम दीपदान की परंपरा
हिंदू धर्म में नरक चतुर्दशी के दिन यमराज के नाम से दीपक जलाने का विशेष महत्व माना गया है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, इस दिन शाम के समय घर के मुख्य द्वार पर दक्षिण दिशा की ओर मुख करके दीपक जलाया जाता है। इसे यम दीपक या यमराज का दीपक कहा जाता है। मान्यता है कि ऐसा करने से परिवार के सदस्यों पर यमराज की कृपा बनी रहती है और अकाल मृत्यु का भय दूर होता है। इसी वजह से छोटी दिवाली के दिन लोग अपने घरों में दीप जलाकर यमराज से परिवार की सुख-समृद्धि और लंबी आयु की कामना करते हैं।
क्या है यम दीपक जलाने की पौराणिक कथा?
यम दीपदान से जुड़ी एक प्रचलित पौराणिक कथा राजा हेम और उनके पुत्र से संबंधित है। कथा के अनुसार, एक समय राजा हेम के घर पुत्र का जन्म हुआ। ज्योतिषियों ने जब बच्चे की कुंडली देखी तो बताया कि विवाह के चार दिन बाद उसकी मृत्यु हो जाएगी। यह सुनकर राजा और रानी काफी दुखी हो गए। राजा ने अपने पुत्र को इस संकट से बचाने के लिए उसे ऐसी जगह भेज दिया, जहां उसका विवाह और स्त्रियों से संपर्क न हो सके।
समय बीतने के साथ राजकुमार बड़ा हो गया। एक दिन उसकी मुलाकात एक सुंदर राजकुमारी से हुई और दोनों एक-दूसरे को पसंद करने लगे। इसके बाद उनका विवाह हो गया। लेकिन विवाह के चार दिन बाद ही राजकुमार की मृत्यु का समय आ गया। यमदूत उसके प्राण लेने पहुंचे तो राजकुमार की पत्नी का विलाप देखकर उनका हृदय भी दुखी हो गया। उन्होंने यमराज के सामने इस घटना का दुख व्यक्त किया।
यमराज ने बताया अकाल मृत्यु से बचने का उपाय
कथा के अनुसार, जब यमदूतों ने यमराज से पूछा कि मनुष्य को अकाल मृत्यु से बचाने का कोई उपाय है या नहीं, तो यमराज ने बताया कि जो व्यक्ति कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि पर विधि-विधान से दीपदान करता है, उसे अकाल मृत्यु के भय से मुक्ति मिलती है। इस दिन जो मनुष्य अपने घर के बाहर दक्षिण दिशा में दीपक जलाकर यमराज की पूजा करता है, उसके जीवन में अकाल मृत्यु का संकट टलने की मान्यता है। तभी से नरक चतुर्दशी पर यम दीपदान करने की परंपरा प्रचलित हुई।
दक्षिण दिशा में ही क्यों जलाया जाता है दीपक?
हिंदू धर्म में दक्षिण दिशा को यमराज की दिशा माना गया है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, यमलोक दक्षिण दिशा में स्थित है और यमराज को दक्षिण दिशा का अधिपति कहा जाता है। इसलिए नरक चतुर्दशी के दिन यमराज के नाम का दीपक दक्षिण दिशा की ओर मुख करके जलाया जाता है। मान्यता है कि इस तरह दीपदान करने से यमराज प्रसन्न होते हैं और परिवार के सदस्यों को लंबी आयु का आशीर्वाद देते हैं। यही वजह है कि इस दिन मुख्य द्वार के बाहर दीपक रखने की परंपरा विशेष रूप से निभाई जाती है।
कैसे करें यम दीपदान?
नरक चतुर्दशी के दिन शाम के समय यम दीपदान करना शुभ माना जाता है। इसके लिए मिट्टी का एक दीपक लें और उसमें सरसों का तेल डालकर रुई की बाती लगाएं। इसके बाद दीपक जलाकर घर के मुख्य द्वार के बाहर दक्षिण दिशा की ओर रखें। इस दौरान यमराज का स्मरण करते हुए परिवार की सुख-शांति, अच्छे स्वास्थ्य और लंबी आयु की कामना करें। कुछ स्थानों पर दीपक जलाते समय यमराज से अकाल मृत्यु के भय से रक्षा करने की प्रार्थना भी की जाती है।
यम दीपदान का क्या है धार्मिक महत्व?