Naag Panchami: हिंदू धर्म में नागों को भगवान शिव से भी जोड़कर देखा जाता है। भगवान शिव के गले में विराजमान नाग उनकी शक्ति और दिव्य स्वरूप का प्रतीक माने जाते हैं।
Naag Panchami Vrat Katha: सावन मास की शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को नाग पंचमी का पर्व श्रद्धा और आस्था के साथ मनाया जाता है। इस दिन नाग देवता की पूजा करने, उन्हें दूध अर्पित करने और व्रत कथा का पाठ करने की विशेष धार्मिक मान्यता है। मान्यता है कि नाग पंचमी के दिन विधि-विधान से नाग देवता की पूजा करने और उनकी कथा सुनने से नाग देवता प्रसन्न होते हैं और परिवार पर अपनी कृपा बनाए रखते हैं।
हिंदू धर्म में नागों को भगवान शिव से भी जोड़कर देखा जाता है। भगवान शिव के गले में विराजमान नाग उनकी शक्ति और दिव्य स्वरूप का प्रतीक माने जाते हैं। यही कारण है कि सावन के महीने में आने वाली नाग पंचमी का महत्व और भी बढ़ जाता है। इस दिन कई महिलाएं नाग देवता को भाई का स्वरूप मानकर उनकी पूजा करती हैं और परिवार की सुख-समृद्धि की कामना करती हैं।
अगर आप भी नाग पंचमी का व्रत रखते हैं तो पूजा के बाद नाग पंचमी की व्रत कथा का पाठ जरूर करें। धार्मिक मान्यता के अनुसार, कथा के श्रवण और पाठ से नाग देवता का आशीर्वाद प्राप्त होता है। तो आइए जानते हैं नाग पंचमी की यह प्रचलित व्रत कथा...
नाग पंचमी व्रत कथा
प्राचीन काल में एक सेठजी के सात पुत्र थे। सातों के विवाह हो चुके थे। सबसे छोटे पुत्र की पत्नी श्रेष्ठ चरित्र वाली, विदुषी और सुशील थी, परंतु उसका कोई भाई नहीं था। एक दिन बड़ी बहू ने घर लीपने के लिए पीली मिट्टी लाने को सभी बहुओं से साथ चलने को कहा। सभी बहुएं धलिया और खुरपी लेकर मिट्टी खोदने लगीं। तभी वहां एक सर्प निकला, जिसे बड़ी बहू खुरपी से मारने लगी। यह देखकर छोटी बहू ने उसे रोकते हुए कहा- 'मत मारो इसे, यह बेचारा निरपराध है।'
यह सुनकर बड़ी बहू ने उसे नहीं मारा, तब सर्प एक ओर जाकर बैठ गया। छोटी बहू ने उससे कहा- 'हम अभी लौटकर आती हैं, तुम यहां से जाना मत।' यह कहकर वह सभी के साथ मिट्टी लेकर घर चली गई और वहां कामकाज में फंसकर सर्प से जो वादा किया था, उसे भूल गई। दूसरे दिन उसे वह बात याद आई तो वह सबको साथ लेकर उसी स्थान पर पहुंची। वहां सर्प को बैठा देखकर वह बोली- 'सर्प भैया, नमस्कार।' सर्प ने कहा- 'तू मुझे भैया कह चुकी है, इसलिए तुझे छोड़ देता हूं। नहीं तो झूठी बात कहने के कारण तुझे अभी डस लेता।'
वह बोली- 'भैया, मुझसे भूल हो गई, उसकी क्षमा मांगती हूं।' तब सर्प बोला- 'अच्छा, तू आज से मेरी बहन हुई और मैं तेरा भाई हुआ। तुझे जो मांगना हो, मांग ले।' वह बोली- 'भैया, मेरा कोई नहीं है। अच्छा हुआ जो तू मेरा भाई बन गया।' कुछ दिन व्यतीत होने पर वह सर्प मनुष्य का रूप धारण करके उसके घर आया और बोला- 'मेरी बहन को भेज दो।' सबने कहा- 'इसके तो कोई भाई नहीं था।' तब वह बोला- 'मैं दूर के रिश्ते में इसका भाई हूं। बचपन में ही बाहर चला गया था।' उसके विश्वास दिलाने पर घर के लोगों ने छोटी बहू को उसके साथ भेज दिया।
सर्प ने बताई सच्चाई
सर्प ने मार्ग में बताया कि 'मैं वहीं सर्प हूं, इसलिए तू डरना नहीं और जहां चलने में कठिनाई हो, वहां मेरी पूंछ पकड़ लेना।' उसने सर्प के कहे अनुसार ही किया और इस प्रकार वह उसके घर पहुंच गई। वहां के धन-ऐश्वर्य को देखकर वह चकित हो गई। एक दिन सर्प की माता ने उससे कहा- 'मैं एक काम से बाहर जा रही हूं, तू अपने भाई को ठंडा दूध पिला देना।' उसे यह बात ध्यान नहीं रही और उसने अपने भाई को गर्म दूध पिला दिया, जिससे उसका मुख बुरी तरह जल गया। यह देखकर सर्प की माता बहुत क्रोधित हुई। परंतु सर्प के समझाने पर वह शांत हो गई। तब सर्प ने कहा कि बहन को अब उसके घर भेज देना चाहिए। इसके बाद सर्प और उसके पिता ने उसे बहुत सा सोना, चांदी, जवाहरात, वस्त्र-भूषण आदि देकर उसके घर पहुंचा दिया।
बड़ी बहू की ईर्ष्या
इतना ढेर सारा धन देखकर बड़ी बहू ने ईर्ष्या से कहा- 'भाई तो बड़ा धनवान है, तुझे तो उससे और भी धन लाना चाहिए।' सर्प ने यह वचन सुन लिया तो वह सभी वस्तुएं सोने की लाकर दे दीं। यह देखकर बड़ी बहू ने कहा- 'इन्हें झाड़ने की झाड़ू भी सोने की होनी चाहिए।' तब सर्प ने झाड़ू भी सोने की लाकर रख दी। सर्प ने छोटी बहू को हीरा-मणियों का एक अद्भुत हार दिया था। उसकी प्रशंसा उस देश की रानी ने भी सुनी और वह राजा से बोली- 'सेठ की छोटी बहू का हार यहां आना चाहिए।'
राजा ने मंत्री को हुक्म दिया कि उससे वह हार लेकर शीघ्र उपस्थित हो। मंत्री ने सेठजी के पास जाकर कहा- 'महारानीजी छोटी बहू का हार पहनेंगी, वह उससे लेकर मुझे दे दो।' सेठजी ने डर के कारण छोटी बहू से हार मंगाकर मंत्री को दे दिया। छोटी बहू को यह बात बहुत बुरी लगी। उसने अपने सर्प भाई को याद किया और उसके आने पर प्रार्थना की- 'भैया! रानी ने हार छीन लिया है। तुम कुछ ऐसा करो कि जब वह हार उसके गले में रहे, तब तक के लिए सर्प बन जाए और जब वह मुझे लौटा दे, तब हीरों और मणियों का हो जाए।'
सर्प ने ठीक वैसा ही किया। जैसे ही रानी ने हार पहना, वैसे ही वह सर्प बन गया। यह देखकर रानी चीख पड़ी और रोने लगी। यह देखकर राजा ने सेठ के पास खबर भेजी कि छोटी बहू को तुरंत भेजो। सेठजी डर गए कि राजा न जाने क्या करेगा। वे स्वयं छोटी बहू को साथ लेकर राजा के सामने उपस्थित हुए। राजा ने छोटी बहू से पूछा- 'तूने क्या जादू किया है? मैं तुझे दंड दूंगा।' छोटी बहू बोली- 'राजन, क्षमा कीजिए। यह हार ही ऐसा है कि मेरे गले में हीरों और मणियों का रहता है और दूसरे के गले में सर्प बन जाता है।' यह सुनकर राजा ने वह सर्प बना हार उसे देकर कहा- 'अभी पहनकर दिखाओ।'
सर्प का बहन के प्रति प्रेम
छोटी बहू ने जैसे ही उसे पहना, वैसे ही वह हार फिर से हीरों और मणियों का हो गया। यह देखकर राजा को उसकी बात पर विश्वास हो गया और उसने प्रसन्न होकर उसे बहुत सी मुद्राएं भी पुरस्कार में दीं। छोटी बहू अपने हार और इन मुद्राओं सहित घर लौट आई। उसके धन को देखकर बड़ी बहू ने ईर्ष्या के कारण उसके पति को सिखाया कि छोटी बहू के पास कहीं से धन आया है। यह सुनकर उसके पति ने अपनी पत्नी को बुलाकर कहा- 'ठीक-ठीक बता कि यह धन तुझे कौन देता है?' तब वह सर्प को याद करने लगी।
उसी समय सर्प प्रकट होकर कहा- 'यदि मेरी धर्म बहन के आचरण पर संदेह प्रकट करेगा तो मैं उसे खा लूंगा।' यह सुनकर छोटी बहू का पति बहुत प्रसन्न हुआ और उसने सर्प देवता का बड़ा सत्कार किया। उसी दिन से नाग पंचमी का त्योहार मनाया जाता है और स्त्रियां सर्प को भाई मानकर उसकी पूजा करती हैं।
धार्मिक महत्व
मान्यता है कि नाग पंचमी के दिन श्रद्धापूर्वक नाग देवता की पूजा करने और इस व्रत कथा का पाठ या श्रवण करने से नाग देवता की कृपा प्राप्त होती है। इस दिन श्रद्धालु नाग देवता से अपने परिवार की सुख-शांति, समृद्धि और मंगल की कामना करते हैं। अगर आप भी नाग पंचमी का व्रत रख रहे हैं तो पूरे श्रद्धाभाव से नाग देवता का पूजन करें और इस व्रत कथा का पाठ जरूर करें। नाग देवता और भगवान शिव की कृपा आपके परिवार पर बनी रहे।
(Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी ज्योतिषीय, पौराणिक और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है तथा केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है। अधिक जानकारी के लिए कृपया संबंधित विषय के विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य करें।)