Durva Ganpati Chaturthi: दूर्वा गणपति चतुर्थी के दिन भगवान गणेश की पूजा में दूर्वा अर्पित करने की विशेष परंपरा है। इसके साथ व्रत कथा का पाठ या श्रवण किया जाता है।
Durva Ganpati Chaturthi Vrat Katha: दूर्वा गणपति चतुर्थी का व्रत भगवान गणेश को समर्पित एक विशेष चतुर्थी व्रत माना जाता है। श्रावण शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि को भगवान गणपति की पूजा-अर्चना और व्रत करने की परंपरा है। इस दिन गणेश जी को दूर्वा अर्पित करने के साथ व्रत कथा का पाठ और श्रवण भी किया जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, दूर्वा गणपति चतुर्थी की कथा का पाठ श्रद्धापूर्वक करने से भगवान गणेश की कृपा प्राप्त होती है और व्रत का पुण्य फल मिलता है। इस व्रत से जुड़ी पौराणिक कथा में राजा अश्वसेन, देवल ऋषि और भगवान गणेश की महिमा का वर्णन मिलता है। आइए जानते हैं दूर्वा गणपति चतुर्थी से जुड़ी वह पौराणिक कथा, जिसका पाठ इस दिन भगवान गणेश की पूजा के दौरान किया जाता है।
राजा अश्वसेन को हुआ भयंकर ज्वर
पौराणिक कथा के अनुसार, प्राचीन समय में अंग देश में श्रमण शततारा नाम का एक नगर था। वहां अश्वसेन नाम के राजा राज्य करते थे। राजा अश्वसेन पराक्रमी, वीर और धार्मिक प्रवृत्ति के थे। वह नियमित रूप से धार्मिक अनुष्ठान करते, व्रत रखते और दान-पुण्य किया करते थे। उनकी ख्याति दूर-दूर तक फैली हुई थी और देवता, ब्राह्मण तथा अतिथि भी उनका सम्मान करते थे। राजा अश्वसेन ने अपने पराक्रम के बल पर पृथ्वी के बड़े भाग पर अपना अधिकार स्थापित कर लिया था। उनका राज्य समृद्ध था और प्रजा भी सुखी थी। लेकिन समय बीतने के साथ राजा एक भयंकर रोग से पीड़ित हो गए।
उन्हें तेज ज्वर और शरीर में अत्यधिक दाह होने लगा। रोग इतना गंभीर था कि अनेक प्रकार के उपचार कराने के बाद भी उन्हें राहत नहीं मिली। राजवैद्य और दूसरे विद्वानों ने अपनी ओर से बहुत प्रयास किए, लेकिन राजा का ज्वर कम नहीं हुआ। धीरे-धीरे राजा की स्थिति चिंताजनक होती चली गई। राजा अश्वसेन अपने रोग के कारण अत्यंत व्याकुल रहने लगे। उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि आखिर ऐसा कौन-सा उपाय किया जाए जिससे उन्हें इस असहनीय पीड़ा से मुक्ति मिल सके।
देवल ऋषि ने बताया चतुर्थी व्रत का महत्व
उसी समय महान ऋषि देवल राजा अश्वसेन के पास पहुंचे। राजा ने ऋषि को देखकर उनसे अपने रोग के बारे में बताया और निवेदन किया कि वे उन्हें ऐसा धार्मिक उपाय बताएं जिससे इस संकट से मुक्ति मिल सके। देवल ऋषि ने राजा को बताया कि उनके राज्य में चतुर्थी के श्रेष्ठ व्रत की परंपरा समाप्त हो गई है। इसी कारण राजा को इस प्रकार का कष्ट प्राप्त हो रहा है। ऋषि ने राजा को चतुर्थी व्रत का महत्व बताते हुए कहा कि यह भगवान गणेश को समर्पित अत्यंत पुण्यदायक व्रत है।
ऋषि देवल ने राजा को भगवान गणेश की आराधना करने और चतुर्थी व्रत विधिपूर्वक करने का निर्देश दिया। उन्होंने राजा को भगवान गणेश के मंत्र की दीक्षा भी दी और गणपति की उपासना का विधान बताया। राजा अश्वसेन ने ऋषि की आज्ञा को स्वीकार किया और भगवान गणेश की आराधना में लग गए।
श्रावण शुक्ल चतुर्थी पर राजा ने रखा व्रत
कुछ समय बाद श्रावण शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि आई। राजा अश्वसेन ने अपनी प्रजा के साथ मिलकर इस पवित्र तिथि पर चतुर्थी व्रत रखने का संकल्प लिया। राजा ने विधिपूर्वक भगवान गणेश का पूजन किया। भगवान गणपति को दूर्वा अर्पित की गई और श्रद्धापूर्वक उनकी आराधना की गई। पूरे दिन व्रत का पालन करते हुए राजा भगवान गणेश के नाम का स्मरण करते रहे।
चतुर्थी का व्रत पूरा करने के बाद पंचमी तिथि पर राजा ने विधिपूर्वक व्रत का पारण किया। भगवान गणेश की आराधना और चतुर्थी व्रत के प्रभाव से राजा अश्वसेन के भयंकर ज्वर और शरीर की दाह शांत होने लगी। धीरे-धीरे राजा पूर्ण रूप से स्वस्थ हो गए। उनके रोग से मुक्त होने के बाद राज्य में भी चतुर्थी व्रत की महिमा प्रसिद्ध हो गई। राजा अश्वसेन ने अपने राज्य में चतुर्थी व्रत की परंपरा को फिर से स्थापित कराया।
चतुर्थी व्रत की महिमा पूरे राज्य में फैली
राजा अश्वसेन के स्वस्थ होने के बाद उनके राज्य में लोग भगवान गणेश की भक्ति और चतुर्थी व्रत करने लगे। शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि पर भगवान गणेश का पूजन और व्रत किया जाने लगा। पौराणिक कथा में बताया गया है कि चतुर्थी व्रत के प्रभाव से राजा के राज्य में रहने वाले लोगों को भी अनेक प्रकार के कष्टों से मुक्ति मिली। राज्य में सुख-समृद्धि बढ़ी और लोग भगवान गणेश की आराधना में अधिक श्रद्धा रखने लगे। राजा अश्वसेन ने स्वयं भगवान गणेश के प्रति अपनी भक्ति को और अधिक दृढ़ किया और चतुर्थी व्रत की परंपरा को दूर-दूर तक प्रसिद्ध कराया।
एक पापी व्यक्ति ने भी अनजाने में रखा चतुर्थी व्रत
दूर्वा गणपति चतुर्थी की कथा में आगे एक ऐसे व्यक्ति का भी वर्णन मिलता है, जिसने जानबूझकर नहीं बल्कि परिस्थितिवश चतुर्थी का व्रत कर लिया था। कथा के अनुसार, एक दुष्ट और पापी व्यक्ति था जो अनेक प्रकार के बुरे कर्मों में लिप्त रहता था। उसे धर्म और व्रत का कोई विशेष ज्ञान नहीं था। एक बार संयोग से श्रावण शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि के दिन उसे भोजन और जल नहीं मिला। इस कारण उसका पूरा दिन बिना अन्न-जल के ही बीत गया।
उसे यह जानकारी भी नहीं थी कि उस दिन चतुर्थी तिथि है और उसका उपवास भगवान गणेश को समर्पित व्रत के रूप में हो रहा है। अगले दिन पंचमी तिथि आने पर उसने भोजन किया और इस प्रकार अनजाने में ही उसका चतुर्थी व्रत पूरा हो गया। कथा के अनुसार, उस अनजाने में किए गए व्रत के पुण्य प्रभाव से उसका भयंकर ज्वर भी दूर हो गया। हालांकि इसके बाद भी उसने अपने पापकर्मों का त्याग नहीं किया और अपने पुराने कर्मों में लगा रहा।
मृत्यु के बाद भगवान गणेश के दूत लेने पहुंचे
समय बीतने के बाद उस व्यक्ति की मृत्यु हो गई। उसके जीवन में अनेक पापकर्म थे, लेकिन श्रावण शुक्ल चतुर्थी के दिन अनजाने में किए गए व्रत का पुण्य उसके साथ था। कथा में वर्णन आता है कि मृत्यु के बाद भगवान गणेश के दूत उसे लेने पहुंचे। भगवान गणेश के दूत उसे अपने साथ ले गए और चतुर्थी व्रत के उस पुण्य के कारण उसे भगवान गणेश के धाम की प्राप्ति हुई।
दूर्वा गणपति चतुर्थी पर कथा पाठ का महत्व
दूर्वा गणपति चतुर्थी के दिन भगवान गणेश की पूजा में दूर्वा अर्पित करने की विशेष परंपरा है। इसके साथ व्रत कथा का पाठ या श्रवण किया जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, भगवान गणेश को दूर्वा अत्यंत प्रिय है, इसलिए इस दिन गणपति को दूर्वा अर्पित करके उनकी पूजा करने का विशेष महत्व बताया गया है। व्रत के दौरान भगवान गणेश का ध्यान करके उनकी पूजा की जाती है। पूजा के बाद दूर्वा गणपति चतुर्थी की व्रत कथा का पाठ किया जाता है और अंत में भगवान गणेश की आरती की जाती है।
(Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी ज्योतिषीय, पौराणिक और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है तथा केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है। अधिक जानकारी के लिए कृपया संबंधित विषय के विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य करें।)