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Durva Ganpati Chaturthi: दूर्वा गणपति चतुर्थी व्रत का कैसे करें पारण, जानें संपूर्ण विधि, नियम व धार्मिक महत्व

जीवांजलि, धर्म डेस्कPublished by:
Shakshi
सार

Durva Ganpati Chaturthi: दूर्वा गणपति चतुर्थी में दूर्वा का विशेष महत्व है। भगवान गणेश की पूजा में दूर्वा को प्रमुख पूजन सामग्री माना जाता है और भक्त श्रद्धा के साथ इसे गणपति को अर्पित करते हैं। 

Durva Ganpati Chaturthi
Durva Ganpati Chaturthi: दूर्वा गणपति चतुर्थी का व्रत भगवान गणेश को समर्पित माना जाता है। इस दिन भक्त विधि-विधान से गणपति की पूजा करते हैं और उन्हें दूर्वा अर्पित करते हैं। मान्यता है कि चतुर्थी का यह व्रत भगवान गणेश की कृपा पाने और जीवन के विघ्नों को दूर करने के लिए विशेष फलदायी होता है। लेकिन क्या आपको पता है कि इस व्रत को रखने के बाद पारण भी विशेष विधि से किया जाता है? क्या पारण चतुर्थी तिथि में ही करना चाहिए या पंचमी तिथि में? आइए जानते हैं दूर्वा गणपति चतुर्थी व्रत के पारण की संपूर्ण विधि, नियम और धार्मिक महत्व...

चतुर्थी व्रत के बाद कब करें पारण

दूर्वा गणपति चतुर्थी व्रत के संबंध में प्रचलित धार्मिक विधि के अनुसार व्रत का पारण पंचमी तिथि में किया जाता है। यानी चतुर्थी के दिन भगवान गणेश की पूजा, व्रत कथा और आरती करने के बाद व्रत को जारी रखा जाता है और अगले दिन पंचमी तिथि में विधि के अनुसार पारण किया जाता है। धार्मिक परंपराओं में तिथि के अनुसार पारण का विशेष महत्व माना गया है। हालांकि अलग-अलग क्षेत्रों और परिवारों में व्रत की परंपरा में थोड़ा अंतर हो सकता है। 

पारण से पहले करें गणपति का स्मरण

पंचमी तिथि में पारण करने से पहले सुबह उठकर स्नान करें और स्वच्छ वस्त्र धारण करें। इसके बाद पूजा स्थान की सफाई करके भगवान गणेश के सामने दीपक जलाएं। गणपति का ध्यान करते हुए उन्हें प्रणाम करें और व्रत पूर्ण होने के लिए उनका आशीर्वाद लें। यदि घर में भगवान गणेश की प्रतिमा स्थापित की गई है तो उनके सामने जल, अक्षत, फूल और दूर्वा अर्पित की जा सकती है। इसके बाद गणपति मंत्र का जाप या गणपति अथर्वशीर्ष का पाठ करना भी शुभ माना जाता है।

 

 
Bhagavan Ganesh Ke Avataar:

पारण की विधि

पारण से पहले भगवान गणेश की विधिवत पूजा करें। गणपति को दूर्वा, फूल, धूप, दीप और नैवेद्य अर्पित करें। इसके बाद भगवान गणेश की आरती करें। पूजा पूर्ण होने के बाद भगवान को भोग लगाया गया प्रसाद ग्रहण करके व्रत खोला जा सकता है। धार्मिक परंपरा में पंचमी तिथि पर ब्राह्मण की उपस्थिति में पारण करने का भी उल्लेख मिलता है। ऐसी स्थिति में पूजा और भोग के बाद ब्राह्मण को भोजन या यथाशक्ति दान देकर व्रत का पारण किया जाता है। 

पारण में क्या खाएं

व्रत के बाद अचानक बहुत अधिक या भारी भोजन करने के बजाय पहले हल्का और सात्विक भोजन करना उचित माना जाता है। पारण के लिए फल, दूध, मखाना, साबूदाना, कुट्टू या सिंघाड़े से बने सात्विक व्यंजन और भगवान गणेश को अर्पित किया गया प्रसाद लिया जा सकता है। अगर किसी ने पूरे दिन निर्जल या केवल फलाहार का व्रत रखा है तो पारण के समय पहले जल या दूध ग्रहण करने के बाद थोड़ी मात्रा में भोजन करना बेहतर माना जाता है। व्रत की अपनी पारिवारिक परंपरा के अनुसार भोजन का चयन किया जा सकता है।

दूर्वा अर्पित करने का महत्व

दूर्वा गणपति चतुर्थी में दूर्वा का विशेष महत्व है। भगवान गणेश की पूजा में दूर्वा को प्रमुख पूजन सामग्री माना जाता है और भक्त श्रद्धा के साथ इसे गणपति को अर्पित करते हैं। धार्मिक मान्यता में दूर्वा भगवान गणेश को प्रिय मानी गई है। पूजा में दूर्वा अर्पित करते समय उसे स्वच्छ रखना चाहिए। दूर्वा को भगवान गणेश के चरणों में या प्रतिमा पर श्रद्धापूर्वक अर्पित किया जाता है। दूर्वा के साथ मोदक या लड्डू का भोग भी लगाया जाता है।

 

Durva Ganpati Chaturthi

पारण के समय इन बातों का रखें ध्यान

दूर्वा गणपति चतुर्थी व्रत का पारण जल्दबाजी में नहीं करना चाहिए। सबसे पहले स्नान करके पूजा करें, गणपति को भोग लगाएं और आरती के बाद ही व्रत खोलें। पंचमी तिथि में पारण करने की परंपरा का पालन किया जाता है। यदि आपके परिवार में पारण को लेकर कोई विशेष नियम चला आ रहा है तो उसी के अनुसार व्रत पूर्ण करना उचित माना जाता है।

पूजा के दौरान भगवान गणेश को दूर्वा, फूल, धूप, दीप और नैवेद्य अर्पित करें। चतुर्थी के दिन व्रत कथा और गणपति स्तोत्र का पाठ करने की भी परंपरा है। इसके बाद आरती करके भगवान गणेश से व्रत की पूर्णता और अपनी मनोकामना के लिए प्रार्थना की जाती है। 

धार्मिक मान्यता में व्रत का महत्व

दूर्वा गणपति चतुर्थी के व्रत को भगवान गणेश की आराधना से जुड़ा विशेष व्रत माना गया है। धार्मिक ग्रंथों में चतुर्थी व्रत की महिमा का वर्णन मिलता है। मान्यता है कि श्रद्धा और नियमपूर्वक इस व्रत को करने से भगवान गणेश की कृपा प्राप्त होती है तथा जीवन में सुख, समृद्धि और शुभता बनी रहती है। इस व्रत में केवल उपवास रखना ही महत्वपूर्ण नहीं माना जाता, बल्कि चतुर्थी के दिन भगवान गणेश की पूजा, दूर्वा अर्पण, व्रत कथा, आरती और अगले दिन विधिपूर्वक पारण करने की परंपरा भी जुड़ी हुई है। इसलिए व्रत रखने वाले भक्तों के लिए पारण भी पूजा का ही एक महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है।


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(Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी ज्योतिषीय, पौराणिक और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है तथा केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है। अधिक जानकारी के लिए कृपया संबंधित विषय के विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य करें।)

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