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Masik Krishna Janmashtami: कब मनाई जाएगी आषाढ़ मासिक कृष्ण जन्माष्टमी? जानें तिथि, शुभ मुहूर्त व धार्मिक महत्व

जीवांजलि, धर्म डेस्कPublished by:
Shakshi
सार

Masik Krishna Janmashtami: आषाढ़ मासिक कृष्ण जन्माष्टमी पर भगवान श्रीकृष्ण की पूजा पूरे दिन की जा सकती है। हालांकि प्रातःकाल स्नान के बाद पूजा करना तथा रात्रि में श्रीकृष्ण के बाल स्वरूप का विशेष पूजन करना अत्यंत शुभ माना जाता है।

Masik Krishna Janmashtami
Masik Krishna Janmashtami: सनातन धर्म में भगवान श्रीकृष्ण की उपासना का विशेष महत्व माना गया है। हर वर्ष भाद्रपद मास की कृष्ण पक्ष अष्टमी को श्रीकृष्ण जन्माष्टमी का भव्य उत्सव मनाया जाता है, लेकिन इसके अलावा प्रत्येक माह आने वाली कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को मासिक कृष्ण जन्माष्टमी भी श्रद्धापूर्वक मनाई जाती है। आषाढ़ मास की मासिक कृष्ण जन्माष्टमी का भी अपना विशेष धार्मिक महत्व है। इस दिन भगवान श्रीकृष्ण की विधिपूर्वक पूजा-अर्चना, व्रत और भजन-कीर्तन करने से भक्तों पर उनकी विशेष कृपा बनी रहती है। आइए जानते हैं कि वर्ष 2026 में आषाढ़ मासिक कृष्ण जन्माष्टमी कब मनाई जाएगी, अष्टमी तिथि कब से कब तक रहेगी, पूजा का शुभ मुहूर्त क्या है और इस दिन का धार्मिक महत्व क्या माना गया है।

आषाढ़ मासिक कृष्ण जन्माष्टमी तिथि

वैदिक पंचांग के अनुसार आषाढ़ मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि का आरंभ 17 जून 2026 को रात्रि 11 बजकर 48 मिनट पर होगा। वहीं इस तिथि का समापन 18 जून 2026 को रात्रि 9 बजकर 37 मिनट पर होगा। उदयातिथि के आधार पर आषाढ़ मासिक कृष्ण जन्माष्टमी का व्रत और पूजा 18 जून 2026, गुरुवार को की जाएगी। इस दिन भगवान श्रीकृष्ण के बाल स्वरूप की विशेष पूजा का विधान है।

अष्टमी तिथि

अष्टमी तिथि प्रारंभ – 17 जून 2026, रात्रि 11:48 बजे
अष्टमी तिथि समाप्त – 18 जून 2026, रात्रि 9:37 बजे

पूजा का शुभ मुहूर्त

आषाढ़ मासिक कृष्ण जन्माष्टमी पर भगवान श्रीकृष्ण की पूजा पूरे दिन की जा सकती है। हालांकि प्रातःकाल स्नान के बाद पूजा करना तथा रात्रि में श्रीकृष्ण के बाल स्वरूप का विशेष पूजन करना अत्यंत शुभ माना जाता है। श्रद्धालु अपनी परंपरा और स्थानीय पंचांग के अनुसार निशीथ काल में भी विशेष पूजा-अर्चना कर सकते हैं।

मासिक कृष्ण जन्माष्टमी का धार्मिक महत्व

मासिक कृष्ण जन्माष्टमी भगवान श्रीकृष्ण को समर्पित विशेष तिथि मानी जाती है। मान्यता है कि इस दिन श्रद्धापूर्वक व्रत रखकर भगवान श्रीकृष्ण का पूजन करने से उनकी कृपा प्राप्त होती है। भक्त इस अवसर पर श्रीकृष्ण के बाल स्वरूप का श्रृंगार करते हैं, उन्हें नए वस्त्र धारण कराते हैं तथा विभिन्न प्रकार के भोग अर्पित करते हैं। इस दिन श्रीकृष्ण के नाम का जप, विष्णु सहस्रनाम, श्रीकृष्ण स्तोत्र, गोविंद नामावली तथा श्रीमद्भागवत के दशम स्कंध का पाठ करना भी शुभ माना गया है। अनेक श्रद्धालु दिनभर उपवास रखकर रात्रि में पूजा के बाद व्रत का पारण करते हैं।

कैसे करें आषाढ़ मासिक कृष्ण जन्माष्टमी की पूजा?

प्रातः ब्रह्ममुहूर्त में उठकर स्नान करें और स्वच्छ वस्त्र धारण करें। इसके बाद पूजा स्थान की सफाई कर भगवान श्रीकृष्ण की प्रतिमा या बाल गोपाल को स्थापित करें। यदि घर में पहले से बाल गोपाल विराजमान हैं तो उनका पंचामृत अथवा गंगाजल से अभिषेक करें। इसके बाद भगवान को पीले अथवा सुंदर वस्त्र पहनाएं और मुकुट, मोरपंख, बांसुरी तथा आभूषणों से उनका श्रृंगार करें। पूजा में चंदन, अक्षत, पुष्प, तुलसी दल, धूप, दीप और नैवेद्य अर्पित करें। भगवान श्रीकृष्ण को तुलसी दल अर्पित करना अत्यंत आवश्यक माना गया है। पूजन के दौरान "ॐ नमो भगवते वासुदेवाय" मंत्र का जप करें। इसके बाद श्रीकृष्ण की आरती करें और परिवार के साथ प्रसाद ग्रहण करें।

व्रत रखने की विधि

मासिक कृष्ण जन्माष्टमी का व्रत श्रद्धा और नियमपूर्वक रखा जाता है। व्रती प्रातः स्नान के बाद व्रत का संकल्प लेते हैं। दिनभर सात्विक आचरण रखते हुए भगवान श्रीकृष्ण का स्मरण किया जाता है। कई श्रद्धालु निर्जल व्रत रखते हैं, जबकि कुछ लोग फलाहार करके भी व्रत का पालन करते हैं। रात्रि में भगवान श्रीकृष्ण की विशेष पूजा के बाद भोग लगाया जाता है और आरती संपन्न की जाती है। इसके पश्चात व्रत का पारण किया जाता है।

भगवान श्रीकृष्ण को क्या अर्पित करें?

आषाढ़ मासिक कृष्ण जन्माष्टमी के दिन भगवान श्रीकृष्ण को उनकी प्रिय वस्तुएं अर्पित करने का विशेष महत्व बताया गया है। इस दिन माखन, मिश्री, दूध, दही, मक्खन, खीर, पंजीरी, पंचामृत, फल तथा तुलसी दल का भोग लगाया जाता है। कई स्थानों पर धनिया की पंजीरी और माखन-मिश्री का प्रसाद विशेष रूप से तैयार किया जाता है।

इस दिन किन बातों का रखें ध्यान?

मासिक कृष्ण जन्माष्टमी के दिन पूजा से पहले स्नान कर स्वच्छ वस्त्र पहनने चाहिए। भगवान को बिना तुलसी दल के भोग नहीं लगाना चाहिए। पूजा के समय मन, वचन और कर्म की पवित्रता बनाए रखने का प्रयास करना चाहिए। यदि व्रत रखा गया है तो उसका संकल्प पूर्ण श्रद्धा से निभाना चाहिए। रात्रि पूजा के बाद भगवान की आरती कर प्रसाद का वितरण करना शुभ माना जाता है।


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(Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी ज्योतिषीय, पौराणिक और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है तथा केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है। अधिक जानकारी के लिए कृपया संबंधित विषय के विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य करें।)

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