Jyeshtha Purnima Vrat: सनातन धर्म में पूर्णिमा तिथि का विशेष धार्मिक महत्व माना जाता है। प्रत्येक माह की पूर्णिमा किसी न किसी देवी-देवता की आराधना और पुण्य कर्मों के लिए श्रेष्ठ मानी जाती है। ज्येष्ठ माह की पूर्णिमा भी अत्यंत पुण्यदायी मानी गई है। इस दिन भगवान विष्णु, माता लक्ष्मी और चंद्रदेव की पूजा का विधान है। इसके साथ ही पवित्र नदियों में स्नान, दान-पुण्य, व्रत और कथा श्रवण का विशेष महत्व बताया गया है। कई स्थानों पर इसी दिन वट पूर्णिमा व्रत भी किया जाता है। आइए जानते हैं वर्ष 2026 में ज्येष्ठ पूर्णिमा व्रत की तिथि, शुभ मुहूर्त और इसका धार्मिक महत्व।
ज्येष्ठ पूर्णिमा व्रत 2026 कब रखा जाएगा?
वैदिक पंचांग के अनुसार वर्ष 2026 में ज्येष्ठ पूर्णिमा का व्रत 30 जून, मंगलवार को रखा जाएगा। इस दिन पूर्णिमा तिथि में स्नान, दान, भगवान विष्णु की पूजा, चंद्रदेव का अर्घ्य और व्रत का विशेष महत्व रहेगा। श्रद्धालु प्रातःकाल पवित्र नदी या घर में गंगाजल मिश्रित जल से स्नान कर व्रत का संकल्प लेते हैं और पूरे दिन भगवान विष्णु एवं माता लक्ष्मी की उपासना करते हैं।
ज्येष्ठ पूर्णिमा 2026 तिथि
पूर्णिमा तिथि प्रारंभ – 29 जून 2026, सोमवार रात्रि 09:04 बजे
पूर्णिमा तिथि समाप्त – 30 जून 2026, मंगलवार रात्रि 11:22 बजे
उदयातिथि के अनुसार ज्येष्ठ पूर्णिमा का व्रत 30 जून 2026 को रखा जाएगा।
पूजा का शुभ मुहूर्त
ज्येष्ठ पूर्णिमा के दिन ब्रह्म मुहूर्त से लेकर प्रातःकाल तक स्नान और पूजा करना अत्यंत शुभ माना जाता है। सूर्योदय के बाद भगवान विष्णु, माता लक्ष्मी और चंद्रदेव की विधिपूर्वक पूजा की जाती है। इसके बाद दिनभर व्रत रखकर सायंकाल चंद्रमा के दर्शन कर अर्घ्य अर्पित किया जाता है। यदि संभव हो तो अभिजीत मुहूर्त या शुभ चौघड़िया में भी भगवान की पूजा की जा सकती है। हालांकि पूर्णिमा के दिन श्रद्धा और नियमपूर्वक किया गया पूजन पूरे दिन शुभ फलदायी माना गया है।
ज्येष्ठ पूर्णिमा व्रत का धार्मिक महत्व
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार ज्येष्ठ पूर्णिमा के दिन किया गया व्रत और पूजा विशेष पुण्य प्रदान करने वाला माना गया है। इस दिन भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की आराधना करने से जीवन में सुख-समृद्धि और धन-धान्य की वृद्धि की कामना की जाती है। पूर्णिमा तिथि चंद्रदेव को समर्पित मानी जाती है। इसलिए इस दिन चंद्रमा को अर्घ्य देने और चंद्र मंत्रों का जप करने का भी विधान बताया गया है। मान्यता है कि ऐसा करने से मानसिक शांति, सकारात्मक ऊर्जा और पारिवारिक सुख की प्राप्ति होती है।
ज्येष्ठ पूर्णिमा पर स्नान और दान का महत्व
ज्येष्ठ पूर्णिमा के दिन प्रातःकाल तीर्थ, नदी, सरोवर या गंगाजल युक्त जल से स्नान करना अत्यंत पुण्यकारी माना जाता है। स्नान के बाद भगवान विष्णु का पूजन कर दान करने का विशेष विधान है। इस दिन जल से भरा घड़ा, वस्त्र, छाता, पंखा, सत्तू, फल, अन्न, गुड़, शीतल पेय, दक्षिणा तथा जरूरतमंदों को भोजन कराने का विशेष महत्व बताया गया है। गर्मी के मौसम को ध्यान में रखते हुए जलदान और शीतल वस्तुओं का दान विशेष पुण्यदायी माना जाता है।
ज्येष्ठ पूर्णिमा व्रत की पूजा विधि
ज्येष्ठ पूर्णिमा के दिन प्रातःकाल जल्दी उठकर स्नान करें और स्वच्छ वस्त्र धारण करें। इसके बाद व्रत का संकल्प लें। पूजा स्थान को शुद्ध कर भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें। भगवान को पीले पुष्प, तुलसी दल, चंदन, अक्षत, धूप, दीप और नैवेद्य अर्पित करें। विष्णु सहस्रनाम, श्रीसूक्त, विष्णु मंत्र या 'ॐ नमो भगवते वासुदेवाय' मंत्र का जप किया जा सकता है। पूजा के बाद पूर्णिमा व्रत कथा का श्रवण करें और भगवान की आरती करें। सायंकाल चंद्रमा के उदय होने पर चंद्रदेव को जल, दूध मिश्रित जल या शुद्ध जल से अर्घ्य अर्पित करें तथा परिवार की सुख-समृद्धि की प्रार्थना करें।
वट पूर्णिमा से जुड़ा विशेष महत्व
कई क्षेत्रों में ज्येष्ठ पूर्णिमा के दिन वट पूर्णिमा व्रत भी मनाया जाता है। इस दिन सुहागिन महिलाएं वट वृक्ष की पूजा करती हैं और उसकी परिक्रमा कर धागा बांधती हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार यह व्रत अखंड सौभाग्य, पति की दीर्घायु और सुखी वैवाहिक जीवन की कामना से किया जाता है। वट वृक्ष को ब्रह्मा, विष्णु और महेश का स्वरूप माना गया है। इसलिए इसकी पूजा का विशेष धार्मिक महत्व बताया गया है।
इस दिन किन देवी-देवताओं की पूजा की जाती है?
ज्येष्ठ पूर्णिमा पर मुख्य रूप से भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की पूजा का विधान है। इसके साथ ही चंद्रदेव को अर्घ्य अर्पित किया जाता है। कई श्रद्धालु इस दिन भगवान सत्यनारायण की पूजा और कथा का आयोजन भी करते हैं। कुछ स्थानों पर पीपल और वट वृक्ष की पूजा भी की जाती है।
ज्येष्ठ पूर्णिमा पर किए जाने वाले प्रमुख धार्मिक कार्य
इस दिन प्रातः स्नान कर व्रत का संकल्प लिया जाता है। भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की पूजा की जाती है। तुलसी दल अर्पित कर विष्णु मंत्रों का जप किया जाता है। पूर्णिमा व्रत कथा या सत्यनारायण कथा का श्रवण किया जाता है। जरूरतमंदों को अन्न, जल, वस्त्र और अन्य उपयोगी वस्तुओं का दान किया जाता है। सायंकाल चंद्रदेव को अर्घ्य देकर व्रत का समापन किया जाता है।
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(Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी ज्योतिषीय, पौराणिक और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है तथा केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है। अधिक जानकारी के लिए कृपया संबंधित विषय के विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य करें।)