facebook pixel
विज्ञापन
Home›  dharm›  vrat›  mahalakshmi vrat 2026 ka kaise kare paran janiye sampurn vidhi niyam aur dharmik mahatva

Mahalakshmi Vrat 2026: महालक्ष्मी व्रत का कैसे करें पारण? जानें संपूर्ण विधि, नियम और धार्मिक महत्व

जीवांजलि, धर्म डेस्कPublished by:
Shakshi
सार

Mahalakshmi Vrat 2026: साल 2026 में महालक्ष्मी व्रत की शुरुआत 19 सितंबर, शनिवार को हुई थी। यह व्रत भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि से शुरू होकर आश्विन माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि तक चलता है। 

Mahalakshmi Vrat
Mahalakshmi Vrat 2026: महालक्ष्मी व्रत मां लक्ष्मी की आराधना के लिए विशेष माना जाता है। 16 दिनों तक चलने वाले इस व्रत में भक्त मां लक्ष्मी की पूजा-अर्चना कर सुख-समृद्धि और खुशहाली की कामना करते हैं। व्रत के अंतिम दिन पूजा के साथ उसका विधिपूर्वक समापन करना भी महत्वपूर्ण माना जाता है। ऐसे में व्रत रखने वाले श्रद्धालुओं के मन में अक्सर सवाल होता है कि महालक्ष्मी व्रत का पारण कब और कैसे करना चाहिए? क्या पारण से पहले विशेष पूजा या उद्यापन करना जरूरी है? आइए जानते हैं महालक्ष्मी व्रत के पारण की संपूर्ण विधि, नियम और धार्मिक महत्व।

कब होगा महालक्ष्मी व्रत का समापन?

साल 2026 में महालक्ष्मी व्रत की शुरुआत 19 सितंबर, शनिवार को हुई थी। यह व्रत भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि से शुरू होकर आश्विन माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि तक चलता है। इस वर्ष व्रत का समापन 3 अक्टूबर 2026, शनिवार को होगा। हालांकि, व्रत के अंतिम दिन की पूजा, उद्यापन और पारण की तिथि को लेकर स्थानीय पंचांग और पारिवारिक परंपरा का ध्यान रखना चाहिए।

महालक्ष्मी व्रत के पारण की विधि

महालक्ष्मी व्रत का पारण करने से पहले सुबह उठकर स्नान करें और स्वच्छ वस्त्र धारण करें। इसके बाद पूजा स्थल की सफाई कर मां लक्ष्मी की प्रतिमा या तस्वीर के सामने दीपक जलाएं। पूजा में धूप, फूल, अक्षत, रोली, फल और मिठाई जैसी सामग्री रख सकते हैं। इसके बाद मां लक्ष्मी का ध्यान करते हुए विधि-विधान से पूजा करें। माता को अपनी श्रद्धा के अनुसार भोग अर्पित करें और महालक्ष्मी व्रत की कथा का पाठ करें। पूजा के अंत में मां लक्ष्मी की आरती करें और व्रत के दौरान हुई किसी भी भूल के लिए क्षमा प्रार्थना करें।

पूजा पूरी होने के बाद अपनी सामर्थ्य के अनुसार जरूरतमंदों को अन्न, वस्त्र या अन्य उपयोगी वस्तुओं का दान कर सकते हैं। इसके बाद परिवार के सदस्यों के साथ प्रसाद ग्रहण करें और सात्विक भोजन से व्रत का पारण करें। ध्यान रखें कि पारण की सटीक विधि अलग-अलग क्षेत्रों और परिवारों की परंपराओं के अनुसार भिन्न हो सकती है।

16 गांठ वाले डोरे का क्या करें?

महालक्ष्मी व्रत में 16 गांठों वाले पवित्र डोरे का विशेष महत्व माना जाता है। व्रत की शुरुआत में इसे पूजा के बाद धारण किया जाता है और पूरे व्रत के दौरान इसकी पूजा की जाती है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, यह डोरा मां लक्ष्मी के प्रति श्रद्धा और व्रत के संकल्प का प्रतीक होता है।

व्रत के समापन पर डोरे को लेकर अपने परिवार की परंपरा का पालन करना चाहिए। कुछ परंपराओं में इसे विधिपूर्वक उतारकर पूजा स्थल पर रखा जाता है, जबकि कुछ जगहों पर इसे विसर्जित करने या ब्राह्मण को अर्पित करने की मान्यता है। इसलिए डोरे को लेकर कोई एक नियम सभी परंपराओं पर लागू नहीं होता।

महालक्ष्मी व्रत के उद्यापन की विधि

महालक्ष्मी व्रत के समापन पर कई परिवारों में उद्यापन करने की परंपरा है। उद्यापन के लिए पूजा स्थल को साफ करके चौकी पर लाल या पीला वस्त्र बिछाएं। इसके बाद मां लक्ष्मी की प्रतिमा स्थापित कर उन्हें फूल, फल, मिठाई और अन्य पूजन सामग्री अर्पित करें।

पूजा के दौरान महालक्ष्मी व्रत की कथा सुनें या पढ़ें। इसके बाद मां लक्ष्मी की आरती करें और परिवार की सुख-समृद्धि की कामना करें। अपनी सामर्थ्य के अनुसार ब्राह्मण या जरूरतमंद व्यक्ति को भोजन कराना और दान देना भी उद्यापन का हिस्सा माना जाता है। हालांकि, उद्यापन की विस्तृत विधि हर क्षेत्र में एक जैसी नहीं है। इसलिए यदि आपने किसी विशेष संकल्प या पारिवारिक परंपरा के अनुसार व्रत रखा है, तो उसी के अनुरूप उद्यापन करना चाहिए।

पारण करते समय इन नियमों का रखें ध्यान

  • पारण से पहले मां लक्ष्मी की पूजा और आरती करें।
  • पूजा में सात्विक सामग्री का इस्तेमाल करें और स्वच्छता का ध्यान रखें।
  • व्रत खोलते समय अपनी परंपरा के अनुसार फल, मिठाई या सात्विक भोजन ग्रहण करें।
  • पारण के दिन किसी जरूरतमंद की सहायता करना और दान देना शुभ माना जाता है।
  • यदि व्रत के दौरान 16 गांठों वाला डोरा धारण किया है, तो उसे लेकर अपनी पारिवारिक परंपरा का पालन करें।
  • पारण और उद्यापन के लिए अपने स्थानीय पंचांग में दी गई तिथि और समय का ध्यान रखें।
यदि किसी कारण से पूरे 16 दिनों तक व्रत रखना संभव नहीं हुआ है, तो अपनी श्रद्धा के अनुसार पूजा कर सकते हैं। व्रत के नियमों में स्वास्थ्य और शारीरिक क्षमता का ध्यान रखना भी जरूरी है।

महालक्ष्मी व्रत का धार्मिक महत्व

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, महालक्ष्मी व्रत मां लक्ष्मी को प्रसन्न करने और उनका आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए किया जाता है। मां लक्ष्मी को धन, वैभव, ऐश्वर्य और सुख-समृद्धि की देवी माना गया है। इस व्रत में श्रद्धालु लगातार कई दिनों तक माता की पूजा करते हैं और परिवार में सुख-शांति की कामना करते हैं। व्रत के अंतिम दिन विधिपूर्वक पूजा, दान और पारण करने को संकल्प की पूर्णता से जोड़कर देखा जाता है। मान्यता है कि सच्चे मन से मां लक्ष्मी की आराधना करने और जरूरतमंदों की सहायता करने से जीवन में सुख-समृद्धि बनी रहती है। यही वजह है कि महालक्ष्मी व्रत में पूजा के साथ-साथ संयम, श्रद्धा और सेवा भाव को भी महत्व दिया जाता है।


यह भी पढ़ें-

Shivling Parikrama: शिवलिंग की परिक्रमा पूरी क्यों नहीं की जाती? जानें धार्मिक मान्यता और इसका कारण 

Shivling Puja: शिवलिंग पर क्यों चढ़ाया जाता है कच्चा दूध? जानिए धार्मिक महत्व 

Sawan 2026: सावन में शिवलिंग पर बेलपत्र चढ़ाने का सही नियम क्या है? जानिए धार्मिक मान्यता 

(Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी ज्योतिषीय, पौराणिक और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है तथा केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है। अधिक जानकारी के लिए कृपया संबंधित विषय के विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य करें।)

धार्मिक कहानियां सुनने और पढ़ने के लिए हमारे WhatsApp चैनल से जुड़ें।

WhatsApp Channel