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Ashwin Ekadashi 2026: आश्विन एकादशी का नाम कैसे पड़ा इंदिरा एकादशी? जानें पौराणिक कथा

जीवांजलि, धर्म डेस्कPublished by:
Shakshi
सार

Ashwin Ekadashi 2026: आश्विन महीने के कृष्ण पक्ष में पड़ने वाली एकादशी को इंदिरा एकादशी कहा जाता है। पितृपक्ष के दौरान आने के कारण इस एकादशी का संबंध पितरों की मुक्ति और उनके कल्याण से भी जुड़ा है।

इंदिरा एकादशी
Ashwin Ekadashi 2026: हिंदू धर्म में एकादशी तिथि भगवान विष्णु की आराधना के लिए विशेष मानी जाती है। हर महीने आने वाली एकादशी का अपना अलग नाम और धार्मिक महत्व होता है। आश्विन महीने के कृष्ण पक्ष में पड़ने वाली एकादशी को इंदिरा एकादशी कहा जाता है। पितृपक्ष के दौरान आने के कारण इस एकादशी का संबंध पितरों की मुक्ति और उनके कल्याण से भी जुड़ा है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस दिन व्रत और पूजा करने से पितरों को मोक्ष की प्राप्ति में सहायता मिलती है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि आश्विन एकादशी का नाम इंदिरा एकादशी कैसे पड़ा? इसके पीछे राजा इंद्रसेन और उनके पिता से जुड़ी कौन-सी पौराणिक कथा है? आइए जानते हैं इस एकादशी की पूरी कथा...

कब आती है इंदिरा एकादशी?

इंदिरा एकादशी आश्विन महीने के कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि को मनाई जाती है। वर्ष 2026 में यह व्रत 6 अक्टूबर, मंगलवार को रखा जाएगा। धार्मिक मान्यता के अनुसार, इस दिन भगवान विष्णु की पूजा करने, व्रत रखने और पितरों के निमित्त धार्मिक कार्य करने का विशेष महत्व है। इंदिरा एकादशी की कथा भगवान श्रीकृष्ण ने राजा युधिष्ठिर को सुनाई थी। इस कथा में बताया गया है कि किस तरह राजा इंद्रसेन ने एकादशी का व्रत करके अपने पिता को यमलोक से मुक्ति दिलाई थी। इसी वजह से यह एकादशी पितरों के उद्धार से जुड़ी मानी जाती है।

राजा इंद्रसेन की थी नगरी

पौराणिक कथा के अनुसार, सतयुग में महिष्मती नाम की एक नगरी थी। वहां इंद्रसेन नाम के एक प्रतापी और धर्मात्मा राजा राज्य करते थे। राजा इंद्रसेन भगवान विष्णु के परम भक्त थे। उनके राज्य में सुख-समृद्धि थी और वह अपनी प्रजा का पालन-पोषण धर्म के मार्ग पर चलते हुए करते थे। राजा के पास धन-धान्य की कोई कमी नहीं थी। उनका परिवार भी सुखी था।

वह नियमित रूप से भगवान विष्णु का स्मरण करते और धार्मिक कार्यों में लगे रहते थे। एक दिन राजा इंद्रसेन अपनी राजसभा में बैठे हुए थे, तभी वहां देवर्षि नारद का आगमन हुआ। राजा ने नारद मुनि का आदर-सत्कार किया और उन्हें आसन पर बैठाया। इसके बाद कुशलक्षेम पूछते हुए उनके आने का कारण जानना चाहा। तब नारद मुनि ने राजा को ऐसी बात बताई, जिसे सुनकर वह चिंतित हो गए।

यमलोक में मिले राजा के पिता

देवर्षि नारद ने राजा इंद्रसेन से कहा कि एक बार जब वह ब्रह्मलोक से यमलोक गए थे, तब वहां उनकी मुलाकात राजा के पिता से हुई थी। राजा के पिता धर्मात्मा और दान-पुण्य करने वाले व्यक्ति थे, लेकिन किसी पूर्व कर्म और एकादशी व्रत के नियम भंग होने के कारण उन्हें यमलोक में रहना पड़ रहा था। नारद मुनि ने बताया कि राजा के पिता ने उनके माध्यम से अपने पुत्र के लिए एक संदेश भेजा है। वह चाहते हैं कि राजा इंद्रसेन आश्विन महीने के कृष्ण पक्ष की एकादशी का व्रत करें और उससे प्राप्त पुण्य उन्हें समर्पित कर दें। ऐसा करने से उन्हें यमलोक से मुक्ति मिल सकती है।

अपने पिता की यह स्थिति जानकर राजा इंद्रसेन दुखी हो गए। उन्होंने नारद मुनि से पूछा कि वह कौन-सा व्रत करें, जिससे उनके पिता को मुक्ति मिल सके। तब देवर्षि नारद ने उन्हें इंदिरा एकादशी के व्रत का महत्व और उसकी विधि बताई।

नारद मुनि ने बताया व्रत का विधान

नारद मुनि ने राजा इंद्रसेन को बताया कि आश्विन महीने के कृष्ण पक्ष की दशमी तिथि से ही इस व्रत की तैयारी शुरू कर देनी चाहिए। दशमी के दिन स्नान करने के बाद पितरों के निमित्त श्राद्ध करना चाहिए। इसके बाद एक समय भोजन करके रात्रि में जमीन पर शयन करना चाहिए। अगले दिन यानी एकादशी तिथि पर सुबह स्नान आदि से निवृत्त होकर भगवान विष्णु के सामने व्रत का संकल्प लेना चाहिए। इस दिन श्रद्धापूर्वक भगवान विष्णु की पूजा करनी चाहिए। कथा के अनुसार, मध्याह्न में भगवान शालिग्राम का पूजन करने, ब्राह्मणों को भोजन कराने और दान-दक्षिणा देने का भी विधान बताया गया है।

रात्रि में भगवान विष्णु का स्मरण और जागरण करना चाहिए। इसके बाद द्वादशी तिथि पर विधिपूर्वक पूजा करके व्रत का पारण करना चाहिए। नारद मुनि ने राजा से कहा कि यदि वह पूरी श्रद्धा के साथ इंदिरा एकादशी का व्रत करेंगे, तो उनके पिता को यमलोक से मुक्ति मिल जाएगी।

व्रत के प्रभाव से पिता को मिली मुक्ति

देवर्षि नारद से व्रत की विधि जानने के बाद राजा इंद्रसेन ने इंदिरा एकादशी आने पर पूरे विधि-विधान और श्रद्धा के साथ व्रत किया। उन्होंने भगवान विष्णु की पूजा की और व्रत से प्राप्त पुण्य अपने पिता को समर्पित कर दिया। पौराणिक कथा के अनुसार, राजा के व्रत का प्रभाव हुआ और उनके पिता को यमलोक से मुक्ति मिल गई। वह दिव्य विमान पर सवार होकर स्वर्गलोक चले गए। इस तरह राजा इंद्रसेन की भक्ति और इंदिरा एकादशी के पुण्य से उनके पिता का उद्धार हुआ।

कथा में आगे बताया गया है कि राजा इंद्रसेन ने भी लंबे समय तक धर्मपूर्वक राज्य किया। अंत में उन्हें भी स्वर्ग की प्राप्ति हुई। भगवान श्रीकृष्ण ने राजा युधिष्ठिर को यह कथा सुनाते हुए इंदिरा एकादशी के महत्व का वर्णन किया था।

कैसे पड़ा इंदिरा एकादशी नाम?

पौराणिक मान्यता के अनुसार, आश्विन महीने के कृष्ण पक्ष की एकादशी को इंदिरा एकादशी कहा जाता है। पद्म पुराण में भगवान श्रीकृष्ण द्वारा इस एकादशी का नाम इंदिरा बताए जाने और राजा इंद्रसेन के पिता के उद्धार की कथा का वर्णन मिलता है।

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(Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी ज्योतिषीय, पौराणिक और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है तथा केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है। अधिक जानकारी के लिए कृपया संबंधित विषय के विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य करें।)

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