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Gauri Vrat Katha: गौरी व्रत पर करें इस कथा का पाठ, मां पार्वती और भगवान शिव की बनी रहेगी विशेष कृपा

जीवांजलि, धर्म डेस्कPublished by:
Shakshi
सार

Gauri Vrat Katha: माता पार्वती की अटूट श्रद्धा और दृढ़ निश्चय देखकर भगवान शिव अत्यंत प्रसन्न हुए। उन्होंने तत्काल अपना वास्तविक दिव्य स्वरूप प्रकट किया। भगवान शिव को अपने सामने देखकर माता पार्वती ने श्रद्धापूर्वक उन्हें प्रणाम किया। 

Gauri Vrat Katha
Gauri Vrat Katha: सावन मास में आने वाला गौरी व्रत मां पार्वती की आराधना को समर्पित एक अत्यंत पावन व्रत माना जाता है। इस व्रत को विशेष रूप से सुहागिन महिलाएं और अविवाहित कन्याएं श्रद्धा एवं विधि-विधान के साथ करती हैं। धार्मिक मान्यता के अनुसार, गौरी व्रत के दौरान मां पार्वती की पूजा के साथ उनकी पौराणिक कथा का श्रवण या पाठ करना भी अत्यंत शुभ माना जाता है। कहा जाता है कि बिना कथा सुने या पढ़े व्रत का पूर्ण फल प्राप्त नहीं होता। इस दिन श्रद्धापूर्वक गौरी व्रत कथा का पाठ करने से मां पार्वती और भगवान शिव की विशेष कृपा प्राप्त होती है। पुराणों में वर्णित यह कथा माता पार्वती की कठोर तपस्या, भगवान शिव की प्रसन्नता और दिव्य मिलन का वर्णन करती है।

गौरी व्रत की पौराणिक कथा

पौराणिक कथाओं के अनुसार, प्राचीन समय में पर्वतराज हिमवान और उनकी पत्नी रानी मैना के यहां एक दिव्य कन्या ने जन्म लिया। यह कन्या देवी सती का ही पुनर्जन्म थीं, जिन्हें मां पार्वती के नाम से जाना गया। बचपन से ही मां पार्वती अत्यंत तेजस्विनी, धार्मिक और शिवभक्ति में लीन रहती थीं। देवर्षि नारद एक दिन हिमवान के महल पहुंचे। उन्होंने बालिका पार्वती को देखकर भविष्यवाणी की कि उनका विवाह स्वयं भगवान शिव के साथ होगा। हालांकि, उन्होंने यह भी बताया कि भगवान शिव अत्यंत विरक्त, योगी और तपस्वी हैं, इसलिए उन्हें पति रूप में प्राप्त करने के लिए पार्वती को कठिन तप करना होगा।

देवर्षि नारद के वचन सुनने के बाद माता पार्वती के मन में भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त करने का दृढ़ संकल्प जाग उठा। समय बीतने पर उन्होंने अपने माता-पिता से वन में जाकर तपस्या करने की अनुमति मांगी। प्रारंभ में हिमवान और मैना ने उन्हें रोकने का प्रयास किया, लेकिन पुत्री के अटल निश्चय को देखकर उन्होंने अनुमति प्रदान कर दी।

 

मां पार्वती की कठोर तपस्या

वन में पहुंचकर माता पार्वती ने भगवान शिव की आराधना आरंभ की। प्रारंभ में उन्होंने फलाहार किया। कुछ समय बाद उन्होंने केवल पत्तों का सेवन करना शुरू कर दिया। फिर उन्होंने पत्तों का भी त्याग कर दिया। इसी कारण उन्हें "अपर्णा" नाम से भी जाना गया, क्योंकि उन्होंने एक पत्ता तक ग्रहण नहीं किया। वर्षों तक चलने वाली इस कठिन तपस्या के दौरान उन्होंने कठोर व्रत, ध्यान और शिव मंत्र का निरंतर जप किया। उनकी तपस्या इतनी प्रबल थी कि तीनों लोकों में उसकी चर्चा होने लगी। देवता, ऋषि और सिद्धगण भी माता पार्वती की अटूट भक्ति देखकर आश्चर्यचकित थे।

भगवान शिव ने ली पार्वती की परीक्षा

माता पार्वती की तपस्या पूर्ण होने पर भगवान शिव ने उनकी भक्ति की परीक्षा लेने का निश्चय किया। वे एक वृद्ध ब्राह्मण का रूप धारण करके पार्वती के सामने पहुंचे। ब्राह्मण रूप में भगवान शिव ने पार्वती से पूछा कि इतनी कठोर तपस्या करने का उद्देश्य क्या है। माता पार्वती ने विनम्रतापूर्वक उत्तर दिया कि वह भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त करना चाहती हैं, तब उस ब्राह्मण ने भगवान शिव के स्वरूप की निंदा करनी शुरू कर दी। उसने कहा कि शिव शरीर पर भस्म धारण करते हैं, गले में सर्प रखते हैं, श्मशान में निवास करते हैं और उनका रहन-सहन सामान्य नहीं है। उसने पार्वती को किसी अन्य योग्य राजकुमार से विवाह करने की सलाह दी।

माता पार्वती ने यह सब सुनकर अत्यंत शांत भाव से उत्तर दिया कि भगवान शिव समस्त सृष्टि के स्वामी हैं। वे महादेव हैं, देवों के भी देव हैं। उनके समान कोई दूसरा नहीं है। उन्होंने कहा कि चाहे कितनी भी कठिनाइयां आएं, वे केवल भगवान शिव को ही अपना पति स्वीकार करेंगी।

भगवान शिव ने दिया दिव्य स्वरूप का दर्शन

माता पार्वती की अटूट श्रद्धा और दृढ़ निश्चय देखकर भगवान शिव अत्यंत प्रसन्न हुए। उन्होंने तत्काल अपना वास्तविक दिव्य स्वरूप प्रकट किया। भगवान शिव को अपने सामने देखकर माता पार्वती ने श्रद्धापूर्वक उन्हें प्रणाम किया। महादेव ने कहा कि उनकी तपस्या सफल हो चुकी है और वे स्वयं उन्हें पत्नी रूप में स्वीकार करते हैं। भगवान शिव ने माता पार्वती को वरदान दिया कि जो भी श्रद्धापूर्वक उनकी आराधना करेगा और सच्चे मन से गौरी व्रत करेगा, उस पर उनकी विशेष कृपा बनी रहेगी।

 

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भगवान शिव और माता पार्वती का दिव्य विवाह

भगवान शिव की स्वीकृति के बाद पर्वतराज हिमवान के महल में विवाह की तैयारियां प्रारंभ हुईं। देवताओं, ऋषियों, गंधर्वों और अप्सराओं को इस दिव्य विवाह में आमंत्रित किया गया। भगवान शिव अपनी अद्भुत बारात लेकर हिमालय पहुंचे। उनके साथ भूत, प्रेत, गण, योगी और देवगण भी थे। प्रारंभ में बारात का स्वरूप देखकर रानी मैना चिंतित हो गईं, लेकिन भगवान शिव ने अत्यंत सुंदर और मनोहर रूप धारण कर सभी को प्रसन्न कर दिया। विधि-विधान और वैदिक मंत्रों के साथ भगवान शिव और माता पार्वती का विवाह संपन्न हुआ। इस दिव्य विवाह का उल्लेख शिव पुराण सहित अनेक पौराणिक ग्रंथों में मिलता है।

गौरी व्रत पर कथा पाठ का धार्मिक महत्व

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार गौरी व्रत के दिन पूजा के उपरांत इस पौराणिक कथा का श्रद्धापूर्वक पाठ या श्रवण किया जाता है। कथा में माता पार्वती की तपस्या, भगवान शिव की परीक्षा और दोनों के दिव्य विवाह का स्मरण किया जाता है। इसी कारण इस दिन शिव-पार्वती के विवाह प्रसंग का विशेष रूप से पाठ करने की परंपरा प्राचीन समय से चली आ रही है। पूजा के समय भगवान शिव और मां गौरी का ध्यान करने के बाद कथा का पाठ किया जाता है। कथा पूर्ण होने पर शिव-पार्वती की आरती उतारी जाती है और उन्हें नैवेद्य अर्पित किया जाता है। इसके बाद व्रतधारी श्रद्धापूर्वक भगवान शिव और मां पार्वती से आशीर्वाद की कामना करते हैं।



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(Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी ज्योतिषीय, पौराणिक और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है तथा केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है। अधिक जानकारी के लिए कृपया संबंधित विषय के विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य करें।)

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