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Jitiya Vrat: जितिया व्रत में क्यों की जाती है जीमूतवाहन की पूजा? जानिए पौराणिक कथा और धार्मिक महत्व

जीवांजलि, धर्म डेस्कPublished by:
Shakshi
सार

Jitiya Vrat: जितिया व्रत को जीवित्पुत्रिका व्रत भी कहा जाता है। इस व्रत में माताएं अपनी संतान की लंबी आयु और उसके जीवन की रक्षा के लिए उपवास रखती हैं। 

Jitiya Vrat
Jitiya Vrat: जितिया व्रत में माताएं अपनी संतान की लंबी आयु, सुख-समृद्धि और खुशहाल जीवन की कामना करती हैं। इस व्रत में भगवान जीमूतवाहन की पूजा का विशेष महत्व माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, जीमूतवाहन ने एक नाग माता के पुत्र की रक्षा के लिए अपना जीवन दांव पर लगा दिया था। उनके इसी त्याग और परोपकार की स्मृति में जितिया व्रत के दौरान उनकी पूजा की जाती है। लेकिन आखिर कौन थे जीमूतवाहन और उन्होंने एक अनजान मां के बेटे को बचाने के लिए इतना बड़ा बलिदान क्यों दिया? आइए जानते हैं इससे जुड़ी पौराणिक कथा और धार्मिक महत्व...

कौन थे भगवान जीमूतवाहन?

पौराणिक कथा के अनुसार, जीमूतवाहन गंधर्व वंश के एक धर्मपरायण और परोपकारी राजकुमार थे। वे दयालु स्वभाव के थे और दूसरों की सहायता करना अपना कर्तव्य समझते थे। उन्हें राज-पाट और सुख-सुविधाओं से अधिक दूसरों की सेवा करना पसंद था। कथा के अनुसार, जब उनके पिता ने वानप्रस्थ आश्रम अपनाने का निर्णय लिया, तब उन्होंने राजपाट की जिम्मेदारी जीमूतवाहन को सौंप दी।

हालांकि, जीमूतवाहन का मन शासन करने में नहीं लगता था। उन्होंने राजकाज की जिम्मेदारी अपने भाइयों को सौंप दी और स्वयं वन में जाकर पिता की सेवा करने लगे। इसी दौरान उनका विवाह मलयवती से हुआ। एक दिन वन में भ्रमण करते समय जीमूतवाहन की मुलाकात एक दुखी नाग माता से हुई। उनके विलाप ने जीमूतवाहन को व्याकुल कर दिया। जब उन्होंने महिला से उसके दुख का कारण पूछा, तो एक ऐसी घटना का पता चला जिसने उनके जीवन की दिशा बदल दी।

क्या है जीमूतवाहन और गरुड़ की कथा?

पौराणिक कथा के अनुसार, नागवंश और पक्षीराज गरुड़ के बीच एक समझौता हुआ था। इसके तहत नागों को गरुड़ के भोजन के लिए प्रतिदिन एक नाग सौंपना पड़ता था। ऐसा न करने पर गरुड़ पूरे नागवंश का संहार कर सकते थे। इस भय के कारण नाग अपनी ही जाति के एक सदस्य को प्रतिदिन बलि के रूप में भेजने के लिए विवश थे।

जिस नाग माता से जीमूतवाहन की मुलाकात हुई थी, उसका नाम शंखचूड़ था। वह अपने इकलौते पुत्र को खोने के डर से रो रही थी। उस दिन उसके बेटे की बारी थी और उसे गरुड़ के सामने जाना था। एक मां के लिए अपने इकलौते बेटे को मृत्यु के मुंह में जाते देखना असहनीय था। नाग माता की पीड़ा देखकर जीमूतवाहन का हृदय द्रवित हो उठा। उन्होंने उस महिला को सांत्वना दी और उसके पुत्र की जगह स्वयं गरुड़ के सामने जाने का निर्णय लिया। जीमूतवाहन जानते थे कि ऐसा करने पर उनकी जान भी जा सकती है, लेकिन वे एक मां को उसके बेटे से बिछड़ते नहीं देखना चाहते थे।

गरुड़ के सामने क्यों प्रस्तुत हुए जीमूतवाहन?

कथा के अनुसार, जीमूतवाहन ने शंखचूड़ को बचाने के लिए स्वयं को गरुड़ के सामने प्रस्तुत कर दिया। कुछ प्रचलित कथाओं में बताया जाता है कि वे लाल वस्त्र धारण कर उस स्थान पर पहुंचे, जहां गरुड़ नागों को अपना आहार बनाने आते थे। गरुड़ ने उन्हें नाग समझकर अपने पंजों में दबोच लिया और अपने साथ ले गए। इस दौरान जीमूतवाहन ने विरोध नहीं किया।

उनके धैर्य और सहनशीलता को देखकर गरुड़ को आश्चर्य हुआ। जब उन्होंने जीमूतवाहन की पहचान पूछी, तब उन्हें पूरे घटनाक्रम का पता चला। गरुड़ यह जानकर हैरान रह गए कि एक राजकुमार किसी दूसरे की संतान को बचाने के लिए अपनी जान देने को तैयार हो गया। जीमूतवाहन की करुणा, साहस और परोपकार की भावना ने उन्हें प्रभावित किया। इसके बाद गरुड़ ने जीमूतवाहन को मुक्त कर दिया।

कैसे बचा नागवंश का जीवन?

जीमूतवाहन के त्याग से प्रभावित होकर गरुड़ ने नागों को भविष्य में न खाने का वचन दिया। इस तरह नागवंश को प्रतिदिन होने वाली मृत्यु के भय से मुक्ति मिल गई। कुछ प्रचलित कथाओं में यह भी वर्णन मिलता है कि गरुड़ ने अमृत की सहायता से जीमूतवाहन और मृत नागों को जीवनदान दिया। इस प्रकार जीमूतवाहन ने केवल एक नागपुत्र की ही रक्षा नहीं की, बल्कि पूरे नागवंश के जीवन को सुरक्षित करने का मार्ग भी प्रशस्त किया। उनके इस महान कार्य के कारण उन्हें त्याग, दया और संतान की रक्षा के प्रतीक के रूप में याद किया जाने लगा।

जितिया व्रत में क्यों होती है जीमूतवाहन की पूजा?

जितिया व्रत को जीवित्पुत्रिका व्रत भी कहा जाता है। इस व्रत में माताएं अपनी संतान की लंबी आयु और उसके जीवन की रक्षा के लिए उपवास रखती हैं। जीमूतवाहन की कथा इस व्रत के प्रमुख धार्मिक आधारों में से एक मानी जाती है।

धार्मिक मान्यता है कि जिस प्रकार जीमूतवाहन ने एक असहाय मां के पुत्र की रक्षा के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया था, उसी प्रकार उनकी पूजा करने से संतान पर आने वाले संकट दूर होते हैं। व्रत रखने वाली महिलाएं उनसे अपने बच्चों की लंबी आयु, अच्छे स्वास्थ्य और सुखी जीवन की प्रार्थना करती हैं।

इस दिन भगवान जीमूतवाहन की पूजा के साथ उनकी कथा सुनने या पढ़ने की भी परंपरा है। कई जगहों पर कुशा से जीमूतवाहन की प्रतिमा बनाकर पूजा की जाती है। हालांकि, पूजा की विधि और परंपराओं में क्षेत्र के अनुसार अंतर देखने को मिलता है।


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(Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी ज्योतिषीय, पौराणिक और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है तथा केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है। अधिक जानकारी के लिए कृपया संबंधित विषय के विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य करें।)

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