Jitiya Vrat: जितिया व्रत संतान की लंबी आयु और सुख-समृद्धि की कामना के लिए रखा जाने वाला एक महत्वपूर्ण पर्व है। इस दिन माताएं निर्जला उपवास रखकर भगवान जीमूतवाहन की पूजा करती हैं। जितिया को जीवित्पुत्रिका और जिउतिया के नाम से भी जाना जाता है। इस पर्व की परंपरा बिहार, झारखंड, पूर्वी उत्तर प्रदेश और मिथिला समेत कई क्षेत्रों में विशेष रूप से प्रचलित है, लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि आखिर जितिया व्रत की शुरुआत कैसे हुई? इसके पीछे किस राजा के त्याग की कहानी जुड़ी है और क्यों इस दिन जीमूतवाहन की पूजा की जाती है? आइए जानते हैं जितिया पर्व की शुरुआत से जुड़ी पौराणिक कथा और इसका धार्मिक महत्व।
कैसे हुई जितिया की शुरुआत?
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, जितिया व्रत की शुरुआत राजा जीमूतवाहन के त्याग और परोपकार से जुड़ी है। पौराणिक कथा में बताया गया है कि जीमूतवाहन ने एक नाग माता के पुत्र की जान बचाने के लिए अपना जीवन तक दांव पर लगा दिया था। उनके इस निस्वार्थ भाव से प्रसन्न होकर पक्षीराज गरुड़ ने नागों को अपना आहार न बनाने का वचन दिया। मान्यता है कि इसी घटना के बाद संतान की रक्षा और उसकी लंबी आयु की कामना से जीवित्पुत्रिका व्रत करने की परंपरा शुरू हुई। हालांकि, जितिया से जुड़ी चील और सियारिन की लोककथा भी प्रचलित है, जिसे कई क्षेत्रों में व्रत के अवसर पर सुनाया जाता है।
राजा जीमूतवाहन की कथा
पौराणिक कथा के अनुसार, जीमूतवाहन गंधर्व राजकुमार थे। वह दयालु और परोपकारी स्वभाव के थे। पिता की सेवा करने के लिए उन्होंने राजपाट का मोह छोड़ दिया और वन में रहने लगे। एक दिन वह अपने साले मित्रावसु के साथ वन में घूम रहे थे। तभी उन्हें एक वृद्ध महिला के रोने की आवाज सुनाई दी। जीमूतवाहन ने देखा कि एक महिला अपने पुत्र के वियोग की आशंका में विलाप कर रही है। उन्होंने उसके दुख का कारण पूछा।
महिला ने बताया कि वह नागवंश से संबंध रखती है और उसके पुत्र शंखचूड़ को पक्षीराज गरुड़ के सामने बलि के रूप में प्रस्तुत किया जाना है। नागों और गरुड़ के बीच हुए पुराने विवाद के कारण नागवंश के एक सदस्य को नियमित रूप से गरुड़ का आहार बनना पड़ता था। अपने इकलौते पुत्र को खोने के डर से मां बेहद दुखी थी। उसकी व्यथा सुनकर जीमूतवाहन का हृदय द्रवित हो गया। उन्होंने नाग माता को भरोसा दिलाया कि वह उसके पुत्र की रक्षा करेंगे।
शंखचूड़ की जगह खुद बने बलि
नाग माता को दिया हुआ वचन निभाने के लिए जीमूतवाहन ने एक बड़ा फैसला लिया। उन्होंने शंखचूड़ की जगह स्वयं गरुड़ के सामने जाने का निश्चय किया। इसके बाद वह उस स्थान पर पहुंच गए, जहां गरुड़ नागों को अपना आहार बनाने आते थे। कथा के अनुसार, जीमूतवाहन लाल वस्त्र धारण कर बलि स्थल पर लेट गए। जब गरुड़ वहां पहुंचे, तो उन्होंने जीमूतवाहन को अपने पंजों में दबोच लिया।
इस दौरान जीमूतवाहन ने न तो विरोध किया और न ही अपनी पहचान बताई। उनका उद्देश्य केवल एक मां के पुत्र की जान बचाना था। कुछ समय बाद गरुड़ को आश्चर्य हुआ कि उनके पंजों में आया युवक भयभीत क्यों नहीं है। उन्होंने जीमूतवाहन से उनका परिचय पूछा। तब जीमूतवाहन ने पूरी घटना बताई और समझाया कि वह एक निर्दोष नाग की जान बचाने के लिए वहां आए हैं।
गरुड़ ने दिया जीवनदान
जीमूतवाहन के त्याग और करुणा को देखकर गरुड़ बेहद प्रभावित हुए। उन्हें एहसास हुआ कि एक दूसरे के प्राणों की रक्षा के लिए कोई अपना जीवन भी दांव पर लगा सकता है। गरुड़ ने जीमूतवाहन को छोड़ दिया और भविष्य में नागों को अपना आहार न बनाने का वचन दिया।
कुछ पौराणिक वर्णनों में यह भी बताया गया है कि गरुड़ ने पहले मारे जा चुके नागों को दोबारा जीवन प्रदान किया। इस तरह जीमूतवाहन के त्याग से नागवंश पर मंडरा रहा संकट दूर हुआ और नाग माता को अपने पुत्र के जीवित रहने का सुख मिला। धार्मिक मान्यता के अनुसार, इसी घटना के कारण जीमूतवाहन को संतान की रक्षा करने वाले देवता के रूप में पूजा जाने लगा। माताएं उनसे अपनी संतान की लंबी आयु और मंगलमय जीवन की प्रार्थना करती हैं।
चील और सियारिन की कथा
जितिया व्रत से जुड़ी एक अन्य लोकप्रिय कथा चील और सियारिन की है। लोकमान्यता के अनुसार, नर्मदा नदी के पास एक चील और एक सियारिन रहती थीं। दोनों के बीच गहरी मित्रता थी। एक दिन उन्होंने कुछ महिलाओं को जितिया व्रत करते और पूजा की तैयारी करते देखा। इससे प्रेरित होकर दोनों ने भी व्रत रखने का संकल्प लिया। कथा के अनुसार, चील ने पूरी श्रद्धा और नियम के साथ व्रत किया, लेकिन सियारिन भूख सहन नहीं कर पाई और उसने व्रत के दौरान भोजन कर लिया।
समय बीतने पर दोनों ने मनुष्य योनि में जन्म लिया। मान्यता के अनुसार, चील के रूप में जन्मी स्त्री के बच्चे जीवित रहे, जबकि सियारिन के बच्चों की मृत्यु हो गई। इस घटना को व्रत के संकल्प और नियमों से जोड़कर देखा जाता है। यही वजह है कि कई जगह जितिया की पूजा के दौरान चील और सियारिन की कथा सुनने की परंपरा है।
जितिया व्रत का धार्मिक महत्व
जितिया व्रत का सबसे बड़ा धार्मिक महत्व संतान की लंबी आयु, अच्छे स्वास्थ्य और सुख-समृद्धि की कामना से जुड़ा है। माताएं इस दिन भगवान जीमूतवाहन की पूजा करती हैं और अपने बच्चों के मंगलमय जीवन की प्रार्थना करती हैं। इस व्रत में निर्जला उपवास रखने की परंपरा भी प्रचलित है। व्रत करने वाली महिलाएं श्रद्धा के साथ पूजा करती हैं और जितिया की कथा सुनती हैं। धार्मिक मान्यता है कि जीमूतवाहन की पूजा और व्रत कथा के श्रवण से संतान पर उनका आशीर्वाद बना रहता है। जितिया की कथा में जीमूतवाहन का त्याग विशेष महत्व रखता है। उन्होंने बिना किसी स्वार्थ के दूसरे की संतान की रक्षा की थी। इसी वजह से यह पर्व मातृत्व, संतान के प्रति प्रेम और दूसरों के जीवन की रक्षा करने की भावना से जुड़ा माना जाता है।
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Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी ज्योतिषीय, पौराणिक और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है तथा केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है। अधिक जानकारी के लिए कृपया संबंधित विषय के विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य करें।)