Gauri Vrat 2026: गौरी व्रत के दौरान कई श्रद्धालु सात्विक भोजन ग्रहण करते हैं, जबकि कुछ लोग दिनभर उपवास रखकर केवल फलाहार करते हैं। इस अवधि में लहसुन, प्याज, मांसाहार और तामसिक भोजन से परहेज किया जाता है।
Gauri Vrat: सनातन धर्म में मां पार्वती की उपासना को सुखी वैवाहिक जीवन, सौभाग्य और मनोकामनाओं की पूर्ति से जोड़कर देखा जाता है। इन्हीं महत्वपूर्ण व्रतों में से एक है गौरी व्रत, जिसे विशेष रूप से अविवाहित कन्याएं और सुहागिन महिलाएं श्रद्धा के साथ करती हैं। मान्यता है कि इस व्रत के दौरान पूरे पांच दिनों तक मां गौरी और भगवान शिव की आराधना करने से योग्य जीवनसाथी की प्राप्ति, दांपत्य जीवन में सुख-शांति और परिवार में समृद्धि का आशीर्वाद मिलता है। हर वर्ष इस व्रत का श्रद्धालुओं को बेसब्री से इंतजार रहता है। क्या आप जानते हैं कि वर्ष 2026 में गौरी व्रत कब से शुरू होगा, इसका समापन कब होगा और इन पांच दिनों में किस प्रकार पूजा की जाती है? आइए जानते हैं।
कब से शुरू होगा गौरी व्रत 2026?
हिंदू पंचांग के अनुसार गौरी व्रत आषाढ़ शुक्ल एकादशी से आरंभ होकर आषाढ़ पूर्णिमा तक चलता है। वर्ष 2026 में यह व्रत 25 जुलाई, शनिवार से शुरू होगा और 29 जुलाई, बुधवार को पूर्णिमा के दिन समाप्त होगा। इस प्रकार श्रद्धालु लगातार पांच दिनों तक मां गौरी और भगवान शिव की पूजा-अर्चना करेंगे।
गौरी व्रत की तिथियां
25 जुलाई 2026 – आषाढ़ शुक्ल एकादशी (व्रत का आरंभ) 26 जुलाई 2026 – द्वादशी 27 जुलाई 2026 – त्रयोदशी 28 जुलाई 2026 – चतुर्दशी 29 जुलाई 2026 – आषाढ़ पूर्णिमा (व्रत का समापन)
गौरी व्रत का धार्मिक महत्व
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार मां पार्वती ने भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त करने के लिए कठोर तप और व्रत किए थे। उसी तपस्या की स्मृति में गौरी व्रत करने की परंपरा चली आ रही है। मान्यता है कि जो कन्याएं पूरे विधि-विधान से यह व्रत करती हैं, उन्हें योग्य और सद्गुणी जीवनसाथी का आशीर्वाद मिलता है। वहीं विवाहित महिलाएं अपने पति की लंबी आयु, दांपत्य जीवन में प्रेम और परिवार की सुख-समृद्धि की कामना से यह व्रत रखती हैं। गुजरात सहित देश के कई हिस्सों में यह व्रत विशेष श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाया जाता है।
पांच दिनों तक कैसे की जाती है पूजा?
गौरी व्रत के दौरान श्रद्धालु प्रतिदिन सुबह स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करते हैं। इसके बाद पूजा स्थल को शुद्ध कर मां गौरी और भगवान शिव की प्रतिमा या चित्र स्थापित किए जाते हैं। पूजा के समय मां गौरी को श्रृंगार की वस्तुएं जैसे चुनरी, सिंदूर, चूड़ियां, बिंदी, कुमकुम, अक्षत, पुष्प और फल अर्पित किए जाते हैं।
भगवान शिव को जल, गंगाजल, बेलपत्र, धतूरा, भस्म और सफेद पुष्प अर्पित किए जाते हैं। इसके बाद शिव-पार्वती की आरती कर उनकी कृपा की प्रार्थना की जाती है। इन पांच दिनों तक श्रद्धालु नियमित रूप से पूजा करते हैं और अंतिम दिन विशेष पूजा के साथ व्रत का समापन करते हैं।
गौरी व्रत में क्या खाया जाता है?
गौरी व्रत के दौरान कई श्रद्धालु सात्विक भोजन ग्रहण करते हैं, जबकि कुछ लोग दिनभर उपवास रखकर केवल फलाहार करते हैं। इस अवधि में लहसुन, प्याज, मांसाहार और तामसिक भोजन से परहेज किया जाता है। व्रत में फल, दूध, दही, मखाना, सूखे मेवे, साबूदाना, सिंघाड़े का आटा, कुट्टू के आटे से बने व्यंजन और अन्य सात्विक खाद्य पदार्थों का सेवन किया जाता है। कई स्थानों पर व्रत के अंतिम दिन विशेष प्रसाद बनाकर मां गौरी को अर्पित किया जाता है।
गौरी व्रत के दौरान किन बातों का रखा जाता है ध्यान?
धार्मिक परंपराओं के अनुसार व्रत करने वाले श्रद्धालु इन पांच दिनों तक संयम और सात्विकता का विशेष पालन करते हैं। प्रतिदिन समय पर पूजा करना, भगवान शिव और मां गौरी का ध्यान करना तथा पूजा स्थल की पवित्रता बनाए रखना शुभ माना जाता है। कई श्रद्धालु इन दिनों शिव-पार्वती से जुड़े मंत्रों, स्तोत्रों और भजनों का पाठ भी करते हैं। व्रत के समापन पर विधि-विधान से पूजा कर भगवान शिव और मां गौरी का आशीर्वाद प्राप्त किया जाता है।
गौरी व्रत से जुड़ी प्रमुख धार्मिक मान्यताएं
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार यह व्रत मां पार्वती की विशेष कृपा प्राप्त करने का अवसर माना जाता है। कहा जाता है कि श्रद्धा और नियमपूर्वक किए गए इस व्रत से विवाह में आने वाली बाधाएं दूर होती हैं और वैवाहिक जीवन में सुख-शांति बनी रहती है। यह भी मान्यता है कि भगवान शिव और मां गौरी की संयुक्त पूजा करने से दंपति के बीच प्रेम, विश्वास और पारिवारिक सौहार्द में वृद्धि होती है। इसी कारण अविवाहित कन्याओं के साथ-साथ विवाहित महिलाएं भी पूरे श्रद्धाभाव से इस व्रत का पालन करती हैं।
गौरी व्रत का समापन कैसे किया जाता है?
पांचवें दिन यानी आषाढ़ पूर्णिमा पर विशेष पूजा का आयोजन किया जाता है। इस दिन मां गौरी और भगवान शिव का विधि-विधान से पूजन कर पुष्प, फल, नैवेद्य और प्रसाद अर्पित किया जाता है। पूजा के बाद आरती की जाती है और परिवार के सदस्यों में प्रसाद वितरित किया जाता है। इसके साथ ही पांच दिनों तक चलने वाले गौरी व्रत का विधिवत समापन हो जाता है।
(Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी ज्योतिषीय, पौराणिक और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है तथा केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है। अधिक जानकारी के लिए कृपया संबंधित विषय के विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य करें।)