Bhadrapada Purnima: भाद्रपद मास की पूर्णिमा तिथि को धार्मिक दृष्टि से विशेष माना जाता है। इस दिन भगवान विष्णु, सत्यनारायण और चंद्रदेव की पूजा के साथ व्रत और कथा श्रवण की परंपरा है। मान्यता है कि पूर्णिमा व्रत श्रद्धा के साथ करने और कथा का पाठ करने से जीवन में सुख-शांति और शुभता बनी रहती है। वर्ष 2026 में भाद्रपद पूर्णिमा 26 सितंबर को मनाई जाएगी। पूर्णिमा तिथि 25 सितंबर की रात से शुरू होकर 26 सितंबर की रात तक रहेगी, लेकिन क्या आपको पता है कि पूर्णिमा व्रत से जुड़ी एक ऐसी पौराणिक कथा भी है, जिसमें संतान सुख और अल्पायु दोष से मुक्ति की बात कही गई है? क्या आपने कभी सोचा है कि 32 पूर्णिमा के व्रत का उल्लेख क्यों मिलता है? आइए जानते हैं इस कथा के बारे में।
माता यशोदा ने पूछा सवाल
पौराणिक कथा के अनुसार, एक बार माता यशोदा ने भगवान श्रीकृष्ण से ऐसा व्रत बताने के लिए कहा, जिससे स्त्रियों को सौभाग्य की प्राप्ति हो और परिवार में सुख-समृद्धि बनी रहे। तब भगवान श्रीकृष्ण ने उन्हें बत्तीस पूर्णिमा व्रत की महिमा बताई। उन्होंने कहा कि श्रद्धा और नियम के साथ पूर्णिमा व्रत करने, भगवान का पूजन करने, चंद्रदेव को अर्घ्य देने और कथा सुनने से शुभ फल की प्राप्ति होती है। इसी प्रसंग में भगवान श्रीकृष्ण ने धनेश्वर नाम के ब्राह्मण की कथा सुनाई। यह कथा पूर्णिमा व्रत की प्रमुख कथाओं में बताई जाती है।
धनेश्वर ब्राह्मण को था दुख
प्राचीन समय में कातिका नाम की एक नगरी थी। वहां धनेश्वर नाम का ब्राह्मण अपनी पत्नी रूपवती के साथ रहता था। दोनों के घर में धन-धान्य की कमी नहीं थी और वे सुखपूर्वक जीवन व्यतीत कर रहे थे, लेकिन उन्हें एक बात का बहुत दुख था। उनके कोई संतान नहीं थी। एक दिन उस नगर में एक तपस्वी योगी आए। वे नगर के कई घरों से भिक्षा लेते थे, लेकिन धनेश्वर के घर से भिक्षा नहीं लेते थे। यह बात धनेश्वर को परेशान करने लगी। एक दिन उसने योगी से इसका कारण पूछा। योगी ने बताया कि संतान न होने के कारण वह उसके घर से भिक्षा ग्रहण नहीं करते। यह सुनकर धनेश्वर बहुत दुखी हुआ और उसने योगी से संतान प्राप्ति का उपाय पूछा।
देवी चंडी की आराधना
योगी की बात सुनकर धनेश्वर ने संतान प्राप्ति की इच्छा से देवी चंडी की आराधना करने का निश्चय किया। वह वन में चला गया और वहां उपवास करते हुए देवी की भक्ति करने लगा। कई दिनों तक कठोर तप और उपासना के बाद देवी चंडी ने उसे दर्शन दिए। देवी ने धनेश्वर को पुत्र प्राप्ति का आशीर्वाद दिया, लेकिन साथ ही बताया कि उसका पुत्र अल्पायु होगा और 16 वर्ष की आयु में उसकी मृत्यु का योग रहेगा। धनेश्वर यह सुनकर चिंतित हो गया। तब देवी ने बताया कि यदि पति-पत्नी विधिपूर्वक 32 पूर्णिमा का व्रत करेंगे, तो पुत्र की आयु संबंधी संकट दूर हो सकता है। साथ ही पूर्णिमा के दिन आटे के दीपक जलाकर भगवान शिव की पूजा करने की बात कही गई।
पुत्र देवदास का जन्म
धनेश्वर ने घर लौटकर अपनी पत्नी रूपवती को देवी की बात बताई। कुछ समय बाद देवी की कृपा से उन्हें एक पुत्र की प्राप्ति हुई। उसका नाम देवदास रखा गया। रूपवती ने देवी के बताए अनुसार पूर्णिमा व्रत का पालन शुरू किया। वह हर पूर्णिमा को श्रद्धा के साथ पूजा करती और आटे के दीपक जलाती थी। धीरे-धीरे व्रत की संख्या बढ़ती गई और परिवार को विश्वास रहा कि इस व्रत के पुण्य से देवदास की आयु का संकट टल जाएगा।
देवदास पर आया संकट
समय बीतने पर धनेश्वर ने देवदास को शिक्षा प्राप्त करने के लिए काशी भेजने का फैसला किया। देवदास अपने मामा के साथ काशी के लिए निकल पड़ा। रास्ते में दोनों एक ब्राह्मण के घर पहुंचे। उसी समय वहां विवाह की तैयारियां चल रही थीं। संयोग से विवाह के समय दूल्हे की तबीयत अचानक खराब हो गई। तब विवाह में बाधा न आए, इसलिए देवदास को दूल्हे के स्थान पर बैठाकर विवाह की रस्म पूरी करने का निर्णय लिया गया, लेकिन देवदास की अल्पायु का संकट अभी पूरी तरह टला नहीं था। कथा के अनुसार, आगे चलकर उसके जीवन पर मृत्यु का संकट आया।
पूर्णिमा व्रत से टला संकट
धनेश्वर और रूपवती द्वारा श्रद्धा से किए गए पूर्णिमा व्रत का पुण्य देवदास के लिए रक्षा का कारण बना। भगवान शिव की कृपा से देवदास के जीवन पर आया संकट टल गया और उसकी आयु बढ़ गई। इस तरह पूर्णिमा व्रत की यह कथा श्रद्धा, नियम और भगवान के प्रति विश्वास का प्रसंग बताती है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, पूर्णिमा व्रत की कथा का पाठ और श्रवण करने से भगवान की कृपा प्राप्त होती है तथा परिवार के सुख-शांति की कामना की जाती है।
भाद्रपद पूर्णिमा पर ऐसे करें कथा पाठ
भाद्रपद पूर्णिमा के दिन सुबह स्नान करके व्रत का संकल्प लिया जाता है। इसके बाद भगवान विष्णु या सत्यनारायण की पूजा की जाती है। शाम के समय चंद्रदेव को अर्घ्य देने की परंपरा है। इसके बाद श्रद्धा के साथ पूर्णिमा व्रत कथा का पाठ या श्रवण किया जाता है। धार्मिक परंपरा में इस दिन सत्यनारायण कथा का आयोजन भी शुभ माना गया है।
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Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी ज्योतिषीय, पौराणिक और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है तथा केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है। अधिक जानकारी के लिए कृपया संबंधित विषय के विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य करें।)