Bhadrapada Kalashtami: भाद्रपद मास की कालाष्टमी भगवान काल भैरव की उपासना के लिए विशेष मानी जाती है। इस दिन भगवान शिव के रौद्र स्वरूप काल भैरव की पूजा करने, व्रत रखने और उनकी कथा का पाठ करने की परंपरा है। धार्मिक मान्यता के अनुसार काल भैरव भगवान शिव के ही एक शक्तिशाली स्वरूप हैं, जिनकी पूजा से साधक को भय और नकारात्मक शक्तियों से मुक्ति मिलने का आशीर्वाद प्राप्त होता है। कालाष्टमी के दिन व्रत कथा सुनने या पढ़ने का भी विशेष महत्व बताया गया है। क्या आपको पता है कि भगवान काल भैरव का प्राकट्य किस घटना के बाद हुआ था और कालाष्टमी की पूजा में उनकी कथा क्यों पढ़ी जाती है? आइए जानते हैं भगवान काल भैरव के प्राकट्य से जुड़ी पौराणिक कथा...
काल भैरव के प्राकट्य की कथा
पौराणिक कथा के अनुसार एक समय भगवान ब्रह्मा और भगवान विष्णु के बीच इस बात को लेकर विवाद उत्पन्न हो गया कि दोनों में सबसे श्रेष्ठ कौन हैं। दोनों देव अपने-अपने महत्व और सामर्थ्य को लेकर एक-दूसरे से श्रेष्ठ होने का दावा करने लगे। जब विवाद बढ़ने लगा तो देवताओं के बीच भी चिंता उत्पन्न हो गई।
इसी समय भगवान शिव ने उनके अहंकार को समाप्त करने के लिए एक अद्भुत ज्योतिर्मय स्वरूप धारण किया। भगवान शिव का यह स्वरूप इतना विशाल और तेजस्वी था कि उसका आदि और अंत किसी को दिखाई नहीं दे रहा था। भगवान विष्णु ने उस दिव्य ज्योति के आरंभ का पता लगाने का प्रयास किया, जबकि भगवान ब्रह्मा उसके अंत की खोज में निकल पड़े। भगवान विष्णु ने वराह रूप धारण कर उस ज्योति के नीचे की ओर जाने का प्रयास किया, वहीं भगवान ब्रह्मा हंस का रूप लेकर ऊपर की ओर चले गए। काफी प्रयास करने के बाद भी दोनों उस दिव्य ज्योति का आदि-अंत नहीं खोज सके।
ब्रह्मा ने कहा असत्य
कथा के अनुसार भगवान विष्णु ने अपनी असमर्थता स्वीकार कर ली, लेकिन भगवान ब्रह्मा ने वापस आकर यह दावा किया कि उन्होंने उस ज्योति का ऊपरी छोर खोज लिया है। उन्होंने अपनी बात को सही साबित करने के लिए केतकी के फूल को भी साक्षी बना लिया। भगवान शिव ब्रह्मा के इस असत्य से प्रसन्न नहीं हुए। उन्होंने अपने तेज से एक भयंकर स्वरूप को प्रकट किया। यही स्वरूप काल भैरव के नाम से प्रसिद्ध हुआ। भगवान काल भैरव का स्वरूप अत्यंत तेजस्वी और रौद्र था। उनके हाथों में विभिन्न आयुध थे और उनका रूप देखकर देवता भी विस्मित हो गए। भगवान शिव ने उन्हें ब्रह्मा के उस अहंकार को समाप्त करने का आदेश दिया।
काल भैरव ने काट दिया ब्रह्मा का पांचवां सिर
पौराणिक कथा के अनुसार भगवान ब्रह्मा के पांच मुख थे। उनमें से एक मुख ने भगवान शिव के प्रति अपमानजनक शब्द कहे थे। भगवान काल भैरव ने अपने नख से ब्रह्मा के उस पांचवें सिर को अलग कर दिया। इसके बाद भगवान काल भैरव ब्रह्महत्या के दोष से जुड़े प्रायश्चित के लिए भिक्षाटन करने लगे। ब्रह्मा का कटा हुआ सिर उनके हाथ से चिपक गया था। वह सिर उनके हाथ से अलग नहीं हो रहा था। भगवान काल भैरव तीनों लोकों में भ्रमण करते हुए अंततः काशी पहुंचे। धार्मिक मान्यता के अनुसार काशी की पवित्र भूमि पर पहुंचते ही ब्रह्मा का कपाल उनके हाथ से अलग होकर भूमि पर गिर गया। इसी स्थान को कपाल मोचन तीर्थ के रूप में जाना जाता है।
काशी के कोतवाल कहलाए काल भैरव
काशी पहुंचने के बाद भगवान काल भैरव को वहां विशेष स्थान प्राप्त हुआ। धार्मिक मान्यता के अनुसार भगवान शिव ने उन्हें काशी का क्षेत्रपाल और रक्षक नियुक्त किया। इसी कारण काल भैरव को काशी का कोतवाल भी कहा जाता है। मान्यता है कि काशी में भगवान विश्वनाथ के दर्शन करने के बाद काल भैरव के दर्शन करना विशेष फलदायी माना जाता है। काल भैरव को नगर की रक्षा करने वाले देवता के रूप में पूजा जाता है।
कालाष्टमी से कैसे जुड़ी है यह कथा
धार्मिक मान्यता के अनुसार भगवान काल भैरव का प्राकट्य मार्गशीर्ष मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को हुआ था, जिसे काल भैरवाष्टमी कहा जाता है। वहीं प्रत्येक महीने कृष्ण पक्ष की अष्टमी को कालाष्टमी का व्रत किया जाता है। भाद्रपद मास की कृष्ण पक्ष अष्टमी भी इसी परंपरा में भगवान काल भैरव की पूजा के लिए महत्वपूर्ण मानी जाती है। इस दिन श्रद्धालु भगवान काल भैरव का स्मरण करते हैं, व्रत रखते हैं और उनकी पूजा के साथ काल भैरव की कथा का पाठ करते हैं।
भाद्रपद कालाष्टमी पर करें कथा का पाठ
भाद्रपद कालाष्टमी के दिन सुबह स्नान करके भगवान शिव और काल भैरव का ध्यान करना चाहिए। इसके बाद पूजा स्थान की साफ-सफाई करके भगवान काल भैरव की प्रतिमा या तस्वीर स्थापित की जाती है। उन्हें जल, पुष्प, धूप और दीप अर्पित किए जाते हैं। पूजा के दौरान काल भैरव के मंत्रों का जाप करने के बाद उनके प्राकट्य की पौराणिक कथा का पाठ किया जाता है। श्रद्धालु अपनी श्रद्धा के अनुसार कथा का पाठ स्वयं कर सकते हैं या किसी योग्य व्यक्ति से कथा सुन सकते हैं।
काल भैरव को लगाएं सात्विक भोग
कालाष्टमी की पूजा में भगवान काल भैरव को उनकी परंपरा के अनुसार भोग अर्पित किया जाता है। गुड़, हलवा, खीर और फल जैसे सात्विक पदार्थ भोग में रखे जा सकते हैं। कई स्थानों पर भगवान काल भैरव को उड़द से बने पकवान भी अर्पित करने की परंपरा है। भोग अर्पित करने के बाद भगवान से परिवार की सुख-समृद्धि और रक्षा की प्रार्थना की जाती है। शाम के समय दीपक जलाकर काल भैरव की आरती करने की भी परंपरा है।
कालाष्टमी पर पढ़ें काल भैरव कथा
भाद्रपद कालाष्टमी पर भगवान काल भैरव की पूजा के साथ उनके प्राकट्य की यह पौराणिक कथा पढ़ना विशेष माना जाता है। कथा में भगवान शिव के तेज से काल भैरव के प्रकट होने, ब्रह्मा के पांचवें सिर का छेदन करने और काशी पहुंचने तक का वर्णन मिलता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार कालाष्टमी के दिन श्रद्धा से भगवान काल भैरव की पूजा और कथा का पाठ करने से उनकी कृपा प्राप्त होती है। इस दिन भक्त भगवान काल भैरव से घर-परिवार की रक्षा, सुख-समृद्धि और मंगल की प्रार्थना करते हैं।
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(Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी ज्योतिषीय, पौराणिक और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है तथा केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है। अधिक जानकारी के लिए कृपया संबंधित विषय के विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य करें।)