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Kajari Teej: कजरी तीज के व्रत का पारण कैसे करें? जानें संपूर्ण विधि, नियम और धार्मिक महत्व

जीवांजलि, धर्म डेस्कPublished by:
Shakshi
सार

Kajari Teej: कजरी तीज के दिन महिलाएं सुबह स्नान करके स्वच्छ वस्त्र पहनती हैं और व्रत का संकल्प लेती हैं। इसके बाद माता नीमड़ी और भगवान शिव-माता पार्वती की पूजा करने की परंपरा है।

Kajari Teej
Kajari Teej: कजरी तीज का व्रत सुहागिन महिलाओं के लिए विशेष धार्मिक महत्व रखता है। इस दिन महिलाएं अपने पति की लंबी आयु, सुखी वैवाहिक जीवन और परिवार की सुख-समृद्धि की कामना से व्रत रखती हैं। कई जगहों पर कुंवारी कन्याएं भी अच्छे जीवनसाथी की कामना से यह व्रत करती हैं। कजरी तीज के दिन पूरे विधि-विधान से पूजा करने के बाद व्रत खोलने यानी पारण का भी खास महत्व माना जाता है। लेकिन क्या आपको पता है कि कजरी तीज का व्रत किस समय और किस विधि से खोलना चाहिए? क्या चंद्रमा को अर्घ्य देने के बाद ही पारण किया जाता है? आइए जानते हैं कजरी तीज के व्रत के पारण की संपूर्ण विधि और जरूरी नियम...

कब है कजरी तीज

साल 2026 में कजरी तीज का पर्व 31 अगस्त, सोमवार को मनाया जाएगा। यह व्रत भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की तृतीया तिथि को रखा जाता है। पंचांग के अनुसार तृतीया तिथि 30 अगस्त को सुबह 9 बजकर 36 मिनट से शुरू होकर 31 अगस्त को सुबह 8 बजकर 50 मिनट तक रहेगी। सूर्योदय के समय तृतीया तिथि होने के कारण कजरी तीज 31 अगस्त को मनाई जाएगी।

व्रत पारण से पहले करें पूजा

कजरी तीज के दिन महिलाएं सुबह स्नान करके स्वच्छ वस्त्र पहनती हैं और व्रत का संकल्प लेती हैं। इसके बाद माता नीमड़ी और भगवान शिव-माता पार्वती की पूजा करने की परंपरा है। पूजा में रोली, अक्षत, फूल, मेहंदी, फल, मिठाई और सुहाग की सामग्री अर्पित की जाती है। कई क्षेत्रों में सत्तू का भोग लगाने की भी परंपरा है। व्रत के दौरान पूजा और कथा का पाठ या श्रवण करने के बाद शाम के समय चंद्रमा के दर्शन और पूजन की तैयारी की जाती है।

चंद्रमा को अर्घ्य देने की परंपरा

कजरी तीज के व्रत में चंद्रमा को अर्घ्य देने की परंपरा कई क्षेत्रों में महत्वपूर्ण मानी जाती है। शाम को पूजा करने के बाद चंद्रमा के उदय होने पर उन्हें जल अर्पित किया जाता है। कुछ परंपराओं में जल में दूध, अक्षत और रोली मिलाकर अर्घ्य देने की विधि बताई गई है। इसके बाद चंद्रमा की पूजा और प्रार्थना की जाती है। अर्घ्य देते समय व्रती महिलाएं अपने पति की लंबी आयु और परिवार के सुख-समृद्धि की कामना करती हैं। चंद्र पूजन पूरा होने के बाद ही व्रत खोलने की परंपरा मानी जाती है।

ऐसे करें व्रत का पारण

कजरी तीज का व्रत खोलने से पहले सबसे पहले शाम की पूजा पूरी करें। इसके बाद चंद्रमा को अर्घ्य देकर उनकी पूजा करें। भगवान शिव और माता पार्वती का स्मरण करें और व्रत पूर्ण करने की प्रार्थना करें। इसके बाद अपने घर की परंपरा के अनुसार व्रत का पारण करें। व्रत खोलते समय सबसे पहले पानी या दूध ग्रहण किया जा सकता है। इसके बाद फल या हल्का सात्विक भोजन लिया जाता है। अगर पूरे दिन निर्जला व्रत रखा है तो अचानक बहुत अधिक भोजन करने के बजाय धीरे-धीरे भोजन करना उचित माना जाता है।

पारण में रखें इन बातों का ध्यान

कजरी तीज के पारण में सात्विक भोजन करने की परंपरा है। व्रत खोलते समय तला-भुना और बहुत अधिक मसालेदार भोजन करने से बचना चाहिए। फल, दूध, दही, सत्तू या हल्का भोजन लेकर व्रत खोला जा सकता है। कुछ स्थानों पर कजरी तीज के व्रत में सत्तू को विशेष महत्व दिया जाता है। इसी वजह से इसे सातूड़ी तीज भी कहा जाता है। ऐसे में पूजा के बाद सत्तू का भोग लगाने और प्रसाद के रूप में ग्रहण करने की परंपरा भी देखने को मिलती है। 

निर्जला व्रत रखने वाली महिलाएं

कजरी तीज पर कई महिलाएं निर्जला व्रत रखती हैं, जबकि कुछ स्थानों पर फलाहार या जल ग्रहण करके व्रत रखने की परंपरा है। इसलिए व्रत और पारण के नियम हर क्षेत्र में एक जैसे नहीं होते। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार जो महिलाएं निर्जला व्रत रखती हैं, वे पूजा और चंद्रमा को अर्घ्य देने के बाद ही व्रत खोलती हैं। यदि स्वास्थ्य कारणों से निर्जला व्रत रखना संभव न हो तो अपनी क्षमता के अनुसार फलाहार या जल ग्रहण करके व्रत रखने की परंपरा भी कई जगहों पर प्रचलित है।

कजरी तीज का धार्मिक महत्व

धार्मिक मान्यता के अनुसार कजरी तीज भगवान शिव और माता पार्वती को समर्पित पर्व है। सुहागिन महिलाएं इस दिन पति की दीर्घायु और वैवाहिक जीवन की सुख-शांति के लिए व्रत रखती हैं। वहीं कुंवारी कन्याएं भी अच्छे जीवनसाथी की कामना से इस व्रत में शामिल होती हैं। कजरी तीज को कई जगह बड़ी तीज, कजली तीज और सातूड़ी तीज के नाम से भी जाना जाता है। उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश और राजस्थान समेत कई राज्यों में इस पर्व को अलग-अलग स्थानीय परंपराओं के साथ मनाया जाता है। 


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(Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी ज्योतिषीय, पौराणिक और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है तथा केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है। अधिक जानकारी के लिए कृपया संबंधित विषय के विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य करें।) 

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