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Aashadh Kalashtami: आषाढ़ कालाष्टमी व्रत का कैसे करें पारण? जानें संपूर्ण विधि, नियम और धार्मिक महत्व

जीवांजलि, धर्म डेस्कPublished by:
Shakshi
सार

Aashadh Kalashtami Vrat: धार्मिक मान्यताओं के अनुसार कालाष्टमी का व्रत अष्टमी तिथि में रखा जाता है और उसका पारण नवमी तिथि में किया जाता है। पारण हमेशा अष्टमी तिथि समाप्त होने के बाद और नवमी तिथि के आरंभ होने पर करना शुभ माना जाता है।

Ashadh Kalashtami 2026:
Ashadh Kalashtami 2026: आषाढ़ मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को कालाष्टमी व्रत रखा जाता है। यह दिन भगवान शिव के रौद्र स्वरूप काल भैरव की उपासना के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार कालाष्टमी का व्रत रखने से काल भैरव की विशेष कृपा प्राप्त होती है और जीवन में आने वाली अनेक बाधाओं से मुक्ति मिलती है। इस दिन श्रद्धालु पूरे दिन व्रत रखकर भगवान काल भैरव और भगवान शिव की पूजा-अर्चना करते हैं तथा अगले दिन विधि-विधान से व्रत का पारण करते हैं। यदि आपने आषाढ़ कालाष्टमी का व्रत रखा है, तो उसका पारण भी शास्त्रों के अनुसार सही विधि से करना आवश्यक माना जाता है। आइए जानते हैं कि कालाष्टमी व्रत का पारण कैसे किया जाता है, इसके नियम क्या हैं और इसका धार्मिक महत्व क्या है।

कालाष्टमी व्रत का पारण कब करें?

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार कालाष्टमी का व्रत अष्टमी तिथि में रखा जाता है और उसका पारण नवमी तिथि में किया जाता है। पारण हमेशा अष्टमी तिथि समाप्त होने के बाद और नवमी तिथि के आरंभ होने पर करना शुभ माना जाता है। यदि किसी विशेष पंचांग में पारण का समय दिया गया हो, तो उसी के अनुसार पारण करना श्रेष्ठ माना जाता है। पारण से पहले भगवान काल भैरव और भगवान शिव का स्मरण करना चाहिए तथा उन्हें प्रणाम कर व्रत पूर्ण करने की प्रार्थना करनी चाहिए।

व्रत पारण की संपूर्ण विधि

  • कालाष्टमी व्रत का पारण धार्मिक विधि के अनुसार शांत और श्रद्धापूर्वक करना चाहिए। 
  • सुबह ब्रह्म मुहूर्त या सूर्योदय के बाद स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें।
  • घर के मंदिर में भगवान शिव, माता पार्वती और भगवान काल भैरव की पूजा करें।
  • भगवान को जल, गंगाजल, अक्षत, चंदन, पुष्प, धूप और दीप अर्पित करें।
  • यदि व्रत के दौरान किसी विशेष मंत्र का जप या भैरव चालीसा का पाठ किया हो तो पारण के समय भी भगवान का स्मरण करें।
  • पूजा पूर्ण होने के बाद भगवान को नैवेद्य अर्पित करें।
  • इसके बाद जल ग्रहण कर या सात्विक भोजन से व्रत का पारण करें।
  • पारण के समय यथाशक्ति ब्राह्मण, जरूरतमंद या किसी साधु-संत को भोजन अथवा दान देना भी शुभ माना जाता है।

पारण के समय किन नियमों का रखें ध्यान?

  • कालाष्टमी व्रत का पारण करते समय कुछ धार्मिक नियमों का पालन करना आवश्यक माना गया है।
  • पारण हमेशा नवमी तिथि में ही करें।
  • बिना पूजा किए सीधे भोजन ग्रहण नहीं करना चाहिए।
  • व्रत खोलने से पहले भगवान काल भैरव और भगवान शिव का आभार व्यक्त करें।
  • पारण सात्विक भोजन से करना शुभ माना जाता है।
  • पारण के दिन मांस, मदिरा, लहसुन और प्याज जैसे तामसिक पदार्थों से परहेज करना चाहिए।
  • क्रोध, विवाद और अपशब्दों से बचते हुए शांत मन से दिन व्यतीत करना चाहिए।
 

पारण में क्या खाएं?

धार्मिक परंपरा के अनुसार व्रत का पारण हल्के और सात्विक भोजन से करना उत्तम माना जाता है। पारण के दौरान फल, दूध, दही, खीर, साबूदाना, मूंग की दाल, रोटी, चावल, मौसमी सब्जियां तथा घर में बना सात्विक भोजन ग्रहण किया जा सकता है। कई श्रद्धालु सबसे पहले जल या चरणामृत ग्रहण करते हैं, उसके बाद भगवान को अर्पित प्रसाद लेकर व्रत का पारण करते हैं। इसके बाद सामान्य सात्विक भोजन किया जाता है।

कालाष्टमी व्रत में दान का महत्व

धार्मिक मान्यता है कि कालाष्टमी व्रत के पारण के दिन अपनी श्रद्धा और सामर्थ्य के अनुसार दान करना शुभ फलदायी माना जाता है। इस दिन अन्न, वस्त्र, फल, जल, छाता, काला तिल, गुड़ या दक्षिणा का दान किया जा सकता है। मान्यता है कि भगवान काल भैरव की कृपा प्राप्त करने के लिए जरूरतमंद लोगों की सहायता करना भी पुण्यदायी माना गया है। दान सदैव अपनी श्रद्धा और क्षमता के अनुसार ही करना चाहिए।

कालाष्टमी व्रत का धार्मिक महत्व

कालाष्टमी भगवान शिव के उग्र एवं रक्षक स्वरूप काल भैरव को समर्पित तिथि मानी जाती है। धार्मिक ग्रंथों में उल्लेख मिलता है कि भगवान काल भैरव को काशी का कोतवाल और धर्म की रक्षा करने वाला देवता माना गया है। इसलिए कालाष्टमी के दिन उनकी विशेष पूजा-अर्चना का विधान बताया गया है। मान्यता है कि इस दिन श्रद्धा और नियमपूर्वक व्रत रखने तथा विधिवत पारण करने से भगवान काल भैरव प्रसन्न होते हैं। उनके आशीर्वाद से जीवन में आने वाली अनेक बाधाएं दूर होती हैं तथा भक्त को आध्यात्मिक और धार्मिक लाभ प्राप्त होता है।

कालाष्टमी व्रत के दौरान किए जाने वाले विशेष धार्मिक कार्य

कई श्रद्धालु कालाष्टमी के दिन भगवान शिव का रुद्राभिषेक भी कराते हैं। इसके साथ ही काल भैरव अष्टक, भैरव चालीसा तथा 'ॐ कालभैरवाय नमः' मंत्र का जप भी किया जाता है। कुछ स्थानों पर काल भैरव मंदिर में जाकर सरसों के तेल का दीपक जलाने, काले तिल अर्पित करने तथा भगवान को पुष्प-माला अर्पित करने की भी परंपरा है। व्रत के पारण से पहले इन धार्मिक कार्यों को पूर्ण कर भगवान से व्रत स्वीकार करने की प्रार्थना की जाती है।

किन बातों का विशेष ध्यान रखें?

यदि किसी कारणवश स्वास्थ्य संबंधी समस्या हो या चिकित्सकीय कारणों से निर्जला अथवा कठोर व्रत रखना संभव न हो, तो अपनी क्षमता के अनुसार फलाहार या सात्विक आहार के साथ भी श्रद्धापूर्वक व्रत किया जा सकता है। पारण भी निर्धारित तिथि और पूजा के बाद ही करना चाहिए। पारण के समय भगवान शिव और काल भैरव का स्मरण करते हुए प्रसाद ग्रहण करना तथा परिवार के साथ सात्विक भोजन करना शुभ माना गया है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार विधि-विधान और श्रद्धा के साथ किया गया कालाष्टमी व्रत तथा उसका उचित पारण विशेष पुण्यदायी माना जाता है।


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(Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी ज्योतिषीय, पौराणिक और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है तथा केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है। अधिक जानकारी के लिए कृपया संबंधित विषय के विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य करें।)

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