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Yogini Ekadashi: आषाढ़ एकादशी का नाम 'योगिनी एकादशी' क्यों पड़ा? जानें इसके पीछे की पौराणिक कथा

जीवांजलि, धर्म डेस्कPublished by:
Shakshi
सार

Yogini Ekadashi: धार्मिक मान्यता है कि आषाढ़ मास की एकादशी का नाम योगिनी एकादशी केवल उपवास के कारण नहीं पड़ा, बल्कि इसके पीछे एक अत्यंत प्रसिद्ध पौराणिक कथा जुड़ी हुई है।

Yogini Ekadashi
Yogini Ekadashi: हिंदू पंचांग के अनुसार आषाढ़ मास के कृष्ण पक्ष में आने वाली एकादशी को योगिनी एकादशी कहा जाता है। यह एकादशी भगवान विष्णु को समर्पित मानी जाती है और इसका उल्लेख अनेक पुराणों में मिलता है। धार्मिक मान्यता है कि इस तिथि का नाम केवल उपवास के कारण नहीं पड़ा, बल्कि इसके पीछे एक अत्यंत प्रसिद्ध पौराणिक कथा जुड़ी हुई है। इसी कथा में एक ऐसे सेवक का वर्णन मिलता है, जिसने अपने कर्तव्य में हुई एक भूल के कारण कठोर श्राप पाया और बाद में योगिनी एकादशी के व्रत के प्रभाव से उसे उस श्राप से मुक्ति मिली। यही कारण है कि इस एकादशी को 'योगिनी एकादशी' कहा जाता है।

पद्म पुराण और अन्य धार्मिक ग्रंथों में वर्णित इस कथा के अनुसार योगिनी एकादशी का व्रत अत्यंत प्राचीन काल से किया जाता रहा है। यह केवल एक तिथि का नाम नहीं, बल्कि एक विशेष घटना की स्मृति भी है, जिसने इस एकादशी को अन्य एकादशियों से अलग पहचान दी।

भगवान शिव के अलकापुरी की कथा

पौराणिक कथाओं के अनुसार प्राचीन काल में हिमालय के समीप अलकापुरी नाम की दिव्य नगरी थी। इस नगरी पर धन के देवता कुबेर का शासन था। कुबेर भगवान शिव के परम भक्त थे और प्रतिदिन अत्यंत श्रद्धा के साथ भगवान शिव की पूजा किया करते थे। भगवान शिव की पूजा के लिए प्रतिदिन मानसरोवर से ताजे और सुगंधित पुष्प लाने का कार्य एक यक्ष करता था, जिसका नाम हेममाली था। हेममाली का यह दायित्व अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता था क्योंकि भगवान शिव के पूजन में उन्हीं पुष्पों का उपयोग होता था। हेममाली की पत्नी का नाम विशालाक्षी था। वह अत्यंत सुंदर और गुणवान थी। दोनों एक-दूसरे से अत्यधिक प्रेम करते थे।

हेममाली से कैसे हुई बड़ी भूल

एक दिन हेममाली मानसरोवर से फूल लेकर वापस लौटा, लेकिन वह सीधे भगवान शिव की पूजा के लिए पुष्प पहुंचाने के स्थान पर अपनी पत्नी विशालाक्षी के साथ समय बिताने चला गया। पत्नी के प्रेम में वह इतना मग्न हो गया कि उसे अपने कर्तव्य का स्मरण ही नहीं रहा। इधर भगवान शिव की पूजा का समय हो गया। कुबेर भगवान शिव के पूजन के लिए पुष्पों की प्रतीक्षा करते रहे, लेकिन काफी समय बीत जाने के बाद भी हेममाली नहीं पहुँचा। पूजा में विलंब होने लगा। कुबेर ने अपने सेवकों को हेममाली का पता लगाने के लिए भेजा। सेवकों ने खोजबीन की तो ज्ञात हुआ कि हेममाली अपने घर में पत्नी के साथ समय व्यतीत कर रहा है और पूजा के लिए आवश्यक पुष्प अभी तक नहीं पहुँचाए हैं।

कुबेर का क्रोध और श्राप

जब यह समाचार कुबेर को मिला तो वे अत्यंत क्रोधित हो गए। उन्होंने तुरंत हेममाली को अपने दरबार में बुलवाया। दरबार में पहुंचने पर कुबेर ने हेममाली को उसके कर्तव्य की उपेक्षा के लिए कठोर शब्दों में फटकार लगाई। उन्होंने कहा कि भगवान शिव की सेवा में लापरवाही करना गंभीर अपराध है। केवल व्यक्तिगत सुख के कारण पूजा में बाधा उत्पन्न करना क्षम्य नहीं है। क्रोधित होकर कुबेर ने हेममाली को श्राप दिया कि वह तत्काल यक्ष योनि से पतित होकर पृथ्वी पर कुष्ठ रोग से पीड़ित होगा। उसके शरीर पर घाव होंगे, उसे परिवार से अलग रहना पड़ेगा और उसे अनेक प्रकार के कष्ट सहने होंगे। कुबेर के श्राप का प्रभाव तत्काल हुआ। हेममाली का दिव्य स्वरूप नष्ट हो गया और वह कुष्ठ रोग से ग्रस्त होकर पृथ्वी पर आ गिरा।

पृथ्वी पर हेममाली का कठिन जीवन

श्राप के कारण हेममाली का शरीर अत्यंत पीड़ादायक हो गया। उसे असहनीय वेदना होने लगी। उसका सुंदर स्वरूप नष्ट हो चुका था। वह जंगलों और पर्वतों में भटकने लगा। अपनी पत्नी और अलकापुरी से दूर होकर वह निरंतर दुख भोगने लगा। उसे हर समय यही पश्चाताप रहता था कि यदि उसने भगवान शिव की पूजा के लिए समय पर पुष्प पहुँचा दिए होते तो उसे ऐसा भयंकर श्राप नहीं मिलता। लंबे समय तक वह पृथ्वी पर भटकता रहा और अपने पूर्व कर्मों पर पछताता रहा।

ऋषि मार्कण्डेय से हुई भेंट

एक दिन भटकते-भटकते हेममाली महान तपस्वी ऋषि मार्कण्डेय के आश्रम पहुँच गया। ऋषि मार्कण्डेय अपने तप, ज्ञान और दीर्घायु के लिए प्रसिद्ध थे। उन्होंने हेममाली की दयनीय अवस्था देखी और उससे उसके दुख का कारण पूछा। हेममाली ने विनम्रतापूर्वक अपना पूरा परिचय दिया। उसने बताया कि वह पहले कुबेर का सेवक था और भगवान शिव की पूजा के लिए पुष्प लाया करता था। उसने यह भी स्वीकार किया कि पत्नी के मोह में पड़कर उसने अपने कर्तव्य की उपेक्षा की, जिसके कारण कुबेर ने उसे श्राप दिया। हेममाली ने ऋषि से प्रार्थना की कि यदि कोई ऐसा उपाय हो जिससे उसे इस श्राप से मुक्ति मिल सके, तो कृपया उसे बताएं।

ऋषि मार्कण्डेय ने बताया योगिनी एकादशी का व्रत

हेममाली की पश्चातापपूर्ण वाणी सुनकर ऋषि मार्कण्डेय प्रसन्न हुए। उन्होंने कहा कि सच्चे मन से किया गया प्रायश्चित कभी व्यर्थ नहीं जाता। ऋषि ने हेममाली को बताया कि आषाढ़ मास के कृष्ण पक्ष में आने वाली योगिनी एकादशी का व्रत अत्यंत पुण्यदायी माना गया है। यदि वह पूर्ण श्रद्धा, नियम और विधि के साथ इस एकादशी का व्रत करेगा तथा भगवान विष्णु का पूजन करेगा, तो उसे श्राप से मुक्ति प्राप्त हो सकती है। ऋषि मार्कण्डेय ने उसे व्रत की विधि भी बताई और निर्धारित समय आने पर योगिनी एकादशी का पालन करने का निर्देश दिया।

हेममाली ने पूरी श्रद्धा से किया व्रत

ऋषि मार्कण्डेय के निर्देशानुसार हेममाली ने योगिनी एकादशी आने पर पूर्ण श्रद्धा और नियमपूर्वक व्रत रखा। उसने भगवान विष्णु की आराधना की, उपवास किया और पूरे मन से प्रार्थना की। कथा के अनुसार व्रत पूर्ण होने के बाद योगिनी एकादशी के प्रभाव से उसका कुष्ठ रोग समाप्त होने लगा। धीरे-धीरे उसका शरीर पूर्ववत दिव्य और सुंदर हो गया। कुबेर के श्राप से उसे पूरी तरह मुक्ति मिल गई। श्राप समाप्त होने के बाद वह पुनः अपने दिव्य स्वरूप में अलकापुरी लौट गया और पहले की भाँति अपने कर्तव्यों का पालन करने लगा।

इसी कथा से पड़ा 'योगिनी एकादशी' नाम

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार हेममाली को जिस एकादशी के व्रत से श्राप से मुक्ति प्राप्त हुई, वही तिथि आगे चलकर योगिनी एकादशी के नाम से प्रसिद्ध हुई। पुराणों में वर्णित इस कथा के कारण आषाढ़ कृष्ण पक्ष की एकादशी को विशेष रूप से योगिनी एकादशी कहा जाता है। यह नाम किसी संयोगवश नहीं रखा गया, बल्कि हेममाली के उद्धार से जुड़ी इस पौराणिक घटना के कारण इस तिथि की पहचान बनी। इसी कारण प्रत्येक वर्ष आषाढ़ मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी को श्रद्धालु योगिनी एकादशी के रूप में मनाते हैं और भगवान विष्णु की पूजा करते हैं।

 
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(Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी ज्योतिषीय, पौराणिक और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है तथा केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है। अधिक जानकारी के लिए कृपया संबंधित विषय के विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य करें।)

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