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Vat Savitri Poornima 2026: कब है वट सावित्री पूर्णिमा , जानिए तिथि शुभ मुहूर्त औऱ पूजा विधि

जीवांजलि, धर्म डेस्कPublished by:
कोमल शर्मा
सार

Vat Savitri Poornima 2026: हिंदू धर्म में सुहागिन महिलाओं के लिए वट सावित्री व्रत का विशेष महत्व है। यह व्रत साल में दो बार अलग-अलग तिथियों पर मनाया जाता है.

Vat Savitri Poornima 2026:
Vat Savitri Poornima 2026: हिंदू धर्म में सुहागिन महिलाओं के लिए वट सावित्री व्रत का विशेष महत्व है। यह व्रत साल में दो बार अलग-अलग तिथियों पर मनाया जाता है पहला ज्येष्ठ मास की अमावस्या को और दूसरा ज्येष्ठ मास की पूर्णिमा को, जिसे वट सावित्री पूर्णिमा या वट पूर्णिमा कहा जाता है। मुख्य रूप से महाराष्ट्र, गुजरात और दक्षिण भारत के राज्यों में पूर्णिमा के दिन यह व्रत रखने की परंपरा है। इस साल यानी 2026 में अधिकमास  लगने के कारण वट पूर्णिमा की तारीख को लेकर काफी बदलाव और भ्रम की स्थिति बनी हुई थी। आइए विस्तार से जानते हैं कि साल 2026 में वट सावित्री पूर्णिमा कब है, इसका शुभ मुहूर्त क्या है।

वट सावित्री पूर्णिमा 2026 की सही तारीख

साल 2026 में वट सावित्री पूर्णिमा का व्रत 29 जून 2026, सोमवार को रखा जाएगा।

आमतौर पर यह व्रत ज्येष्ठ अमावस्या के ठीक 15 दिन बाद आता है। इस साल अमावस्या का व्रत 16 मई 2026 को रखा गया था, जिसके अनुसार पूर्णिमा व्रत 30 या 31 मई को होना चाहिए था। लेकिन इस साल हिंदू कैलेंडर में ज्येष्ठ अधिकमास लग गया था। शास्त्रों के अनुसार, अधिकमास  के दौरान मुख्य त्योहार या व्रत नहीं रखे जाते हैं। यही कारण है कि अधिकमास समाप्त होने के बाद, शुद्ध ज्येष्ठ मास की पूर्णिमा यानी 29 जून को यह व्रत सर्वमान्य और शास्त्र सम्मत रहेगा। इस प्रकार, इस वर्ष यह व्रत अमावस्या के 15 दिन बाद नहीं, बल्कि पूरे 45 दिन बाद आ रहा है।

पूर्णिमा तिथि और पूजा के शुभ मुहूर्त

वैदिक पंचांग के अनुसार, ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि की शुरुआत और समाप्ति का समय इस प्रकार है:

पूर्णिमा तिथि का प्रारंभ: 29 जून 2026 को सुबह 03:07 बजे से।

पूर्णिमा तिथि की समाप्ति: 30 जून 2026 को सुबह 05:27 बजे तक।

चूंकि उदयातिथि 29 जून को मिल रही है, इसलिए पूरे दिन पूर्णिमा का व्रत और पूजन इसी दिन किया जाएगा।

वट पूर्णिमा का धार्मिक महत्व

वट सावित्री पूर्णिमा का व्रत सुहागिन महिलाएं अपने पति की लंबी आयु, अच्छी सेहत, समृद्धि और सुखद वैवाहिक जीवन की कामना के लिए रखती हैं। यह व्रत पूरी तरह से प्रेम, त्याग और पतिव्रता धर्म को समर्पित है।

इस व्रत की मुख्य धुरी सावित्री और सत्यवान की कथा है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, सावित्री के पति सत्यवान के प्राण जब यमराज लेकर जाने लगे, तब सावित्री ने अपने सतीत्व, बुद्धिमत्ता और दृढ़ संकल्प के बल पर यमराज को विवश कर दिया और अपने पति के प्राण वापस ले आईं। यमराज ने जब सत्यवान के प्राण लौटाए, तब वह बरगद (वट) के वृक्ष के नीचे ही जीवित हुए थे। तभी से इस वृक्ष और इस तिथि का महत्व बढ़ गया।

बरगद वृक्ष की पूजा क्यों की जाती है?

हिंदू शास्त्रों में वट वृक्ष को देव वृक्ष माना गया है। मान्यताओं के अनुसार, वट वृक्ष की जड़ों में भगवान ब्रह्मा, तने में भगवान विष्णु और इसकी शाखाओं व पत्तियों में भगवान शिव का वास होता है। इसके अलावा, यह वृक्ष दीर्घायु (लंबी उम्र) का प्रतीक है, क्योंकि यह सैकड़ों वर्षों तक जीवित रहता है। महिलाएं इस पेड़ की पूजा करके यह प्रार्थना करती हैं कि उनके पति की आयु भी इस वट वृक्ष की तरह लंबी हो।

वट सावित्री पूर्णिमा पूजा विधि


व्रत के दिन सुबह सूर्योदय से पहले उठकर पवित्र स्नान करें। साफ या संभव हो तो नए लाल, पीले या गुलाबी रंग के वस्त्र पहनें । इसके बाद हाथ में जल लेकर व्रत का संकल्प लें।

 सुहागिन महिलाओं के लिए इस दिन सोलह श्रृंगार करना बेहद शुभ माना जाता है। हाथों में मेहंदी लगाना, चूड़ियां पहनना और माथे पर सिंदूर लगाना इस व्रत का अनिवार्य हिस्सा है।

पूजा के लिए एक थाली में बांस का पंखा, लाल सूती धागा (कलावा), धूप, दीप, घी, भीगे हुए चने, फल (विशेषकर आम, केला), फूल, रोली, अक्षत (चावल) और जल का लोटा तैयार करें।

वट वृक्ष के पास जाकर सबसे पहले वृक्ष की जड़ में जल अर्पित करें। इसके बाद रोली, चंदन और अक्षत से पेड़ की पूजा करें। फल और भीगे चने चढ़ाएं।

पूजा के बाद सूती लाल धागे या कलावे को वट वृक्ष के तने पर लपेटते हुए परिक्रमा की जाती है। शास्त्रों के अनुसार, सुहागिन महिलाएं वट वृक्ष की 7, 11, 21 या 108 बार परिक्रमा करती हैं और हर फेरे के साथ पति की लंबी उम्र की मन्नत मांगती हैं।

 परिक्रमा पूरी होने के बाद हाथ में भीगे हुए चने लेकर सावित्री और सत्यवान की पौराणिक कथा सुनी या पढ़ी जाती है। कथा के बिना यह व्रत अधूरा माना जाता है।

पूजा संपन्न होने के बाद बांस के पंखे से घर पर पति को हवा की जाती है। इसके बाद सुहागिनें अपने पति और घर के बुजुर्गों के पैर छूकर अखंड सौभाग्य का आशीर्वाद लेती हैं।

शाम को आरती के बाद भीगे हुए चने और फल खाकर व्रत का पारण किया जाता है।

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(Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी ज्योतिषीय, पौराणिक और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है तथा केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है। अधिक जानकारी के लिए कृपया संबंधित विषय के विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य करें।)
 

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