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Bhagvan Ram : श्री राम ने क्यों और कहां ली थी जल समाधि, जानिए कथा

जीवांजलि, धर्म डेस्कPublished by:
कोमल शर्मा
सार

Bhagvan Ram Ne Kyo Li Jal Samadhi : हिंदू धर्म के सर्वोच्च ग्रंथों, विशेषकर वाल्मीकि रामायण और पद्म पुराण के अनुसार, भगवान श्री राम का पृथ्वी पर अवतार एक निश्चित उद्देश्य के लिए हुआ था।

Bhagvan Ram Ne Kyo Li Jal Samadhi
Bhagvan Ram Ne Kyo Li Jal Samadhi : हिंदू धर्म के सर्वोच्च ग्रंथों, विशेषकर वाल्मीकि रामायण और पद्म पुराण के अनुसार, भगवान श्री राम का पृथ्वी पर अवतार एक निश्चित उद्देश्य के लिए हुआ था। जब उन्होंने रावण का वध करके अधर्म पर धर्म की विजय पताका फहराई और अयोध्या में 11 हजार वर्षों तक धर्मराज  की स्थापना की, तब उनका मानवीय लीला को समेटने का समय आ गया।भगवान राम द्वारा जल समाधि लेने की कथा बेहद भावुक, आध्यात्मिक और न्यायप्रियता से जुड़ी है। आइए विस्तार से जानते हैं कि प्रभु राम ने क्यों और कहां जल समाधि ली थी।

 भगवान राम ने जल समाधि क्यों ली? 

प्रभु श्री राम के जल समाधि लेने के पीछे कोई सांसारिक विवशता नहीं थी, बल्कि यह उनकी लीला की पूर्णता और काल का नियम था। इसके मुख्य कारणों को निम्नलिखित बिंदुओं के माध्यम से समझा जा सकता है

1. माता सीता का पृथ्वी में समा जाना

श्री राम के अवतार का अंत तब शुरू हुआ जब माता सीता ने लोक-लाज और अपनी पवित्रता को सिद्ध करने के बाद धरती माता की गोद में समाने का निर्णय लिया। माता सीता के वैकुंठ लौटने के बाद श्रीराम पृथ्वी पर एकाकी हो गए थे। उनका इस लोक का मुख्य उद्देश्य पूरा हो चुका था और वे भी अपने वास्तविक स्वरूप (भगवान विष्णु) में लौटने के लिए तैयार थे।

 2. कालदेव का आगमन और लक्ष्मण जी का त्याग

पद्म पुराण की कथा के अनुसार, एक दिन कालदेव एक ऋषि का भेष धरकर अयोध्या में श्रीराम से मिलने आए। उन्होंने राम जी के सामने एक शर्त रखी "जब तक हमारे बीच बातचीत होगी, कोई भी कक्ष के भीतर नहीं आएगा। यदि कोई आया, तो आपको उसे मृत्युदंड देना होगा।" प्रभु राम ने शर्त मान ली और अपने भाई लक्ष्मण को द्वारपाल नियुक्त कर दिया। इसी बीच, अत्यंत क्रोधी स्वभाव के महर्षि दुर्वासा अयोध्या पहुंचे और श्रीराम से तुरंत मिलने की जिद करने लगे। लक्ष्मण जी ने उन्हें रोकने का प्रयास किया, तो दुर्वासा ऋषि ने पूरी अयोध्या को श्राप देने की चेतावनी दे दी।

लक्ष्मण जी का धर्मसंकट

लक्ष्मण जी ने सोचा कि पूरी अयोध्या को श्राप से बचाने के लिए उनका अकेले मृत्युदंड पाना बेहतर है। वे कक्ष के भीतर चले गए। श्रीराम अपने वचन के पक्के थे, वे लक्ष्मण को मृत्युदंड नहीं देना चाहते थे, लेकिन वचनों से बंधे थे। तब वशिष्ठ जी की सलाह पर उन्होंने लक्ष्मण का परित्याग कर दिया था। इस विरह को न सहते हुए लक्ष्मण जी पहले ही सरयू नदी में समाकर अपने वास्तविक स्वरूप  में लौट गए। लक्ष्मण के जाने के बाद श्रीराम ने भी संसार छोड़ने का मन बना लिया।

3. अवतार कार्य की पूर्णता

भगवान राम साक्षात विष्णु के अवतार थे। वे इस संसार में मर्यादा पुरुषोत्तम के रूप में आदर्श स्थापित करने आए थे। जब उनके जीवन के सभी कर्तव्य रावण वध, लंका विजय, रामराज्य की स्थापना, और अगली पीढ़ी  का राज्याभिषेक पूरे हो गए, तो उनके लिए पृथ्वी पर रुकने का कोई औचित्य नहीं बचा था।

भगवान राम ने जल समाधि कहां ली थी? 

भगवान श्री राम ने उत्तर प्रदेश के अयोध्या धाम में स्थित पवित्र 'सरयू नदी' में जल समाधि ली थी। आज इस विशेष स्थान को "गुप्तार घाट"  के नाम से जाना जाता है।अयोध्या में सरयू नदी के तट पर स्थित यह घाट आज भी सनातन धर्म में परम पवित्र और मोक्षदायिनी माना जाता है। मान्यता है कि इसी स्थान पर प्रभु राम ने अपने मानवीय शरीर को त्यागकर गुप्त रूप से पुनः विष्णु रूप धारण किया था, इसीलिए इसका नाम 'गुप्तार घाट' पड़ा।

महाप्रयाण की अलौकिक घटना

जब श्रीराम ने जल समाधि लेने का निश्चय किया, तो यह संदेश पूरी अयोध्या में फैल गया। प्रभु के जाने की बात सुनकर अयोध्या के नागरिक, पशु-पक्षी, भालू और वानर सेना  सभी अत्यंत दुखी हो गए और उनके साथ चलने की जिद करने लगे।

महाप्रयाण की यात्रा: श्रीराम अत्यंत शांत और गंभीर मुद्रा में आगे बढ़े। उनके पीछे भरत और शत्रुघ्न थे। उनके पीछे अयोध्या के हजारों नागरिक, ऋषि-मुनि और वानर सेना चल रही थी। केवल हनुमान जी को श्रीराम ने कलयुग के अंत तक धर्म की रक्षा के लिए पृथ्वी पर ही रहने का आदेश दिया था।
सरयू में प्रवेश:जब श्रीराम सरयू नदी के तट पर पहुंचे, तो ब्रह्मा जी अपने सभी देवताओं के साथ विमानों में बैठकर इस अलौकिक दृश्य को देखने आकाश में उपस्थित हुए। श्रीराम ने मुस्कुराते हुए सरयू के जल में कदम रखा।
वैकुंठ गमन: जैसे ही श्रीराम ने जल में समाधि ली, भरत और शत्रुघ्न भी उनके साथ जल में समा गए। सरयू नदी के भीतर से एक दिव्य तेज प्रकट हुआ। भगवान राम ने पुनः चतुर्भुज भगवान विष्णु का रूप धारण किया।


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(Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी ज्योतिषीय, पौराणिक और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है तथा केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है। अधिक जानकारी के लिए कृपया संबंधित विषय के विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य करें।)

 

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