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Mahabharat Story: अग्निदेव ने अर्जुन को क्या-क्या उपहार दिए, जानिए इनके महत्व

जीवांजलि, धर्म डेस्कPublished by:
कोमल शर्मा
सार

Mahabharat Story : महाभारत के आदिपर्व में जब खांडव वन दहन  का प्रसंग आता है, तब अग्निदेव ने अर्जुन और भगवान श्रीकृष्ण की सहायता से तृप्त होकर उन्हें कुछ अत्यंत दिव्य और अमोघ अस्त्र-शस्त्र भेंट किए थे।

Mahabharat Story
Mahabharat Story : महाभारत के आदिपर्व में जब खांडव वन दहन  का प्रसंग आता है, तब अग्निदेव ने अर्जुन और भगवान श्रीकृष्ण की सहायता से तृप्त होकर उन्हें कुछ अत्यंत दिव्य और अमोघ अस्त्र-शस्त्र भेंट किए थे। अग्निदेव को खांडव वन को जलाने के लिए इंद्र और अन्य देवताओं के विरोध का सामना करना था, जिसके लिए उन्हें पराक्रमी योद्धाओं की आवश्यकता थी। अर्जुन और श्रीकृष्ण ने उन्हें सुरक्षा का वचन दिया, जिसके बदले में अग्निदेव ने वरुण देव से प्रार्थना करके ये दिव्य उपहार प्राप्त किए और अर्जुन को सौंपे।

 1. गांडीव धनुष

अग्निदेव द्वारा अर्जुन को दिया गया सबसे प्रमुख और शक्तिशाली उपहार गांडीव धनुष था। यह कोई साधारण धनुष नहीं था, बल्कि ब्रह्मा जी द्वारा निर्मित एक दिव्य और अलौकिक अस्त्र था।इस धनुष को सबसे पहले ब्रह्मा जी ने बनाया था और उन्होंने इसे एक हजार वर्ष तक अपने पास रखा। इसके बाद यह क्रमशः प्रजापति, इंद्र, चंद्रदेव और फिर वरुण देव के पास पहुंचा। अग्निदेव ने वरुण देव से यह धनुष लेकर अर्जुन को प्रदान किया। गांडीव धनुष अत्यंत विशाल, भारी और ओजस्वी था। इसमें कोई जोड़ या गांठ नहीं थी, और इसका पृष्ठ भाग  बेहद चिकना और चमकदार था। यह धनुष इतना शक्तिशाली था कि इसे कोई साधारण मनुष्य उठा भी नहीं सकता था। अर्जुन के अलावा उस काल में केवल कुछ ही योद्धा इसे संभालने की क्षमता रखते थे। गांडीव की टंकार इतनी भयानक थी कि उससे शत्रुओं के हृदय दहल जाते थे। युद्ध के दौरान इस धनुष से निकलने वाले बाणों की गति और मारक क्षमता अचूक थी। इस धनुष की विशेषता यह भी थी कि यह कभी नष्ट नहीं हो सकता था और न ही इस पर किसी अन्य अस्त्र का प्रभाव पड़ता था।

2. अक्षय तरकश 

धनुष के साथ-साथ अग्निदेव ने अर्जुन को दो अक्षय तरकश भी दिए। युद्ध में एक कुशल धनुर्धर के लिए बाणों की उपलब्धता सबसे महत्वपूर्ण होती है, और इन तरकशों ने अर्जुन की इस चिंता को हमेशा के लिए समाप्त कर दिया।इन तरकशों की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि इनमें से बाण कभी समाप्त नहीं होते थे। अर्जुन चाहे जितनी भी तीव्र गति से और जितने भी बाण चलाते, तरकश तुरंत फिर से बाणों से भर जाता था।महाभारत के अठारह दिनों के भीषण युद्ध में अर्जुन ने लाखों बाण चलाए। यदि उनके पास साधारण तरकश होते, तो उन्हें बार-बार बाणों की आपूर्ति की आवश्यकता पड़ती। इन अक्षय तरकशों के कारण अर्जुन बिना रुके निरंतर शत्रु सेना पर बाणों की वर्षा करने में सक्षम रहे, जिसने उन्हें युद्ध में अजेय बना दिया।

3. दिव्य रथ और कपिध्वज

अग्निदेव ने अर्जुन को एक ऐसा रथ प्रदान किया जो देवताओं के रथों के समान दिव्य और अजेय था। इस रथ का निर्माण स्वयं विश्वकर्मा (देवताओं के शिल्पी) ने किया था।
रथ की बनावट: यह रथ सोने और मणियों से सुसज्जित था। इसके पहियों की गड़गड़ाहट मेघों के गर्जन जैसी गंभीर थी। इस रथ में सूर्य के समान तेजस्वी और तीव्र गति वाले चार सफेद घोड़े जुते हुए थे, जो हवा की गति से दौड़ सकते थे और युद्ध क्षेत्र में किसी भी दिशा में मुड़ने में सक्षम थे।
कपिध्वज : इस रथ के ऊपर एक विशाल और दिव्य ध्वज लगा हुआ था, जिस पर स्वयं प्रभु हनुमान जी विराजमान थे। इस ध्वज पर अन्य कई दिव्य प्राणी और सिंह भी अदृश्य रूप से वास करते थे।
प्रभाव: इस रथ को न तो कोई शत्रु रोक सकता था और न ही इसे नष्ट किया जा सकता था। हनुमान जी की उपस्थिति के कारण अर्जुन के रथ पर आने वाले बड़े-बड़े अस्त्र-शस्त्रों का प्रभाव क्षीण हो जाता था। युद्ध के समय जब हनुमान जी गर्जना करते थे, तो शत्रु सेना के हाथी-घोड़े और सैनिक भयभीत होकर भाग खड़े होते थे।

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(Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी ज्योतिषीय, पौराणिक और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है तथा केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है। अधिक जानकारी के लिए कृपया संबंधित विषय के विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य करें।)

 

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