Sarvapitri Amavasya: पितृ पक्ष में आने वाली अमावस्या का विशेष धार्मिक महत्व माना जाता है। इसे सर्वपितृ अमावस्या के नाम से जाना जाता है। मान्यता है कि इस दिन उन सभी पूर्वजों के लिए श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान किया जाता है, जिनकी मृत्यु तिथि ज्ञात न हो या जिनका श्राद्ध किसी कारण से न हो पाया हो। इसी अमावस्या को महालया अमावस्या भी कहा जाता है। लेकिन आखिर सर्वपितृ अमावस्या का नाम महालया अमावस्या कैसे पड़ा? इसके पीछे क्या धार्मिक मान्यता है और इस दिन को इतना महत्वपूर्ण क्यों माना जाता है? आइए जानते हैं।
क्या है सर्वपितृ अमावस्या
पितृ पक्ष का समापन सर्वपितृ अमावस्या के दिन होता है। इसे पितृ अमावस्या और अमावस्या श्राद्ध के नाम से भी जाना जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, पितृ पक्ष के दौरान जिन पूर्वजों की तिथि के अनुसार श्राद्ध किया जाता है, उनके अलावा ऐसे पितरों के लिए भी इस दिन श्राद्ध किया जा सकता है, जिनकी मृत्यु तिथि मालूम नहीं होती। इसी वजह से इस अमावस्या को ‘सर्वपितृ’ कहा जाता है। यानी यह दिन सभी पितरों के श्राद्ध और तर्पण के लिए समर्पित माना जाता है।
क्यों कहते हैं महालया अमावस्या
सर्वपितृ अमावस्या को महालया अमावस्या कहने के पीछे भी धार्मिक मान्यता जुड़ी हुई है। ‘महालया’ का अर्थ पितरों के लिए विशेष रूप से किया जाने वाला आह्वान और पूजन माना जाता है। इस दिन पितृ पक्ष का समापन होता है और इसके बाद देवी पक्ष यानी शारदीय नवरात्रि की शुरुआत मानी जाती है। मान्यता है कि महालया के दिन पितरों को विदाई दी जाती है। इसलिए यह दिन पितृ पक्ष और देवी पक्ष के बीच एक महत्वपूर्ण पड़ाव माना जाता है। इसी कारण इसे महालया अमावस्या के नाम से भी जाना जाता है।
पितरों के लिए खास क्यों है यह दिन
सर्वपितृ अमावस्या को उन पितरों के लिए विशेष माना जाता है, जिनका श्राद्ध उनकी निर्धारित तिथि पर नहीं किया जा सका। अगर किसी व्यक्ति को अपने पूर्वज की मृत्यु तिथि याद नहीं है, तो वह इस दिन उनका श्राद्ध और तर्पण कर सकता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, इस दिन श्रद्धापूर्वक किया गया तर्पण पितरों को समर्पित होता है। यही वजह है कि पितृ पक्ष में सर्वपितृ अमावस्या का महत्व सबसे प्रमुख दिनों में माना जाता है।
कैसे किया जाता है श्राद्ध
इस दिन सुबह स्नान करने के बाद पितरों का स्मरण किया जाता है। इसके बाद जल, काले तिल और कुश से तर्पण करने की परंपरा है। सामर्थ्य के अनुसार पितरों के निमित्त भोजन तैयार किया जाता है और ब्राह्मणों को भोजन कराने तथा दान देने की परंपरा भी बताई गई है। कई परिवार इस दिन कौवे, गाय, कुत्ते और अन्य जीवों के लिए भी भोजन निकालते हैं। इसे पितरों को समर्पित पंचबलि परंपरा से जोड़ा जाता है।
महालया के बाद शुरू होता है देवी पक्ष
महालया अमावस्या का एक महत्व यह भी है कि इसके बाद शारदीय नवरात्रि की शुरुआत होती है। इसलिए महालया को पितृ पक्ष के समापन और देवी आराधना के आरंभ से जोड़कर देखा जाता है। धार्मिक परंपरा में इस दिन पितरों को श्रद्धापूर्वक विदाई देने के बाद मां दुर्गा की आराधना के लिए देवी पक्ष का स्वागत किया जाता है। यही कारण है कि महालया अमावस्या का संबंध पितृ कर्म के साथ-साथ नवरात्रि से भी जुड़ा हुआ है।
तिथि न पता हो तो इस दिन करें श्राद्ध
कई बार परिवार में किसी पूर्वज की मृत्यु की सही तिथि पता नहीं होती। ऐसी स्थिति में सर्वपितृ अमावस्या को उनके निमित्त श्राद्ध और तर्पण किया जाता है। इसी कारण इसे उन परिवारों के लिए भी महत्वपूर्ण माना जाता है, जिनके किसी पूर्वज का श्राद्ध निर्धारित तिथि पर नहीं हो पाया। इस दिन पूर्वजों का स्मरण करते हुए उनकी आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना की जाती है और अपनी क्षमता के अनुसार दान-पुण्य किया जाता है।
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(Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी ज्योतिषीय, पौराणिक और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है तथा केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है। अधिक जानकारी के लिए कृपया संबंधित विषय के विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य करें।)