Sarvapitri Amavasya: पितृ पक्ष में हर तिथि का अपना अलग महत्व माना जाता है। मान्यता है कि इन दिनों पितरों का श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान करने से उनका आशीर्वाद प्राप्त होता है। लेकिन अगर किसी वजह से पितृ पक्ष की अलग-अलग तिथियों पर श्राद्ध न कर पाएं तो क्या किया जा सकता है? ऐसी स्थिति में सर्वपितृ अमावस्या का दिन बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। क्या आप जानते हैं कि इस एक दिन उन सभी पितरों का श्राद्ध किया जा सकता है, जिनकी श्राद्ध तिथि ज्ञात न हो? आइए जानते हैं सर्वपितृ अमावस्या पर सभी पितरों का श्राद्ध करने की पूरी विधि...
क्यों खास है सर्वपितृ अमावस्या
पितृ पक्ष के अंतिम दिन आने वाली अमावस्या को सर्वपितृ अमावस्या, पितृ विसर्जनी अमावस्या या महालया अमावस्या कहा जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार यह दिन सभी पितरों को समर्पित होता है। खास बात यह है कि जिन पूर्वजों की मृत्यु तिथि याद नहीं है या किसी कारण से उनकी तिथि पर श्राद्ध नहीं किया जा सका, उनका श्राद्ध भी इस दिन किया जा सकता है। इसी वजह से इसे सभी पितरों के श्राद्ध के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है।
सुबह करें स्नान
सर्वपितृ अमावस्या के दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और साफ कपड़े पहनें। इसके बाद घर के पूजा स्थान को साफ करें। श्राद्ध कर्म के लिए मन को शांत रखें और पितरों का स्मरण करें। यदि संभव हो तो श्राद्ध कर्म किसी पवित्र स्थान, नदी या तीर्थ के किनारे किया जा सकता है। हालांकि घर पर भी विधि-विधान से श्राद्ध और तर्पण किया जा सकता है।
पितरों का तर्पण
तर्पण श्राद्ध कर्म का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है। इसके लिए जल में काले तिल मिलाकर पितरों को अर्पित किया जाता है। दक्षिण दिशा की ओर मुख करके पितरों का स्मरण करते हुए तर्पण किया जाता है। तर्पण करते समय अपने ज्ञात पूर्वजों के नाम और गोत्र का स्मरण किया जा सकता है। जिन पितरों का नाम या गोत्र ज्ञात न हो, उनके लिए भी श्रद्धापूर्वक तर्पण किया जाता है।
कैसे करें श्राद्ध
श्राद्ध के लिए सबसे पहले पितरों का स्मरण करके संकल्प लिया जाता है। इसके बाद पिंड बनाए जाते हैं। आमतौर पर पिंड बनाने में चावल, तिल और अन्य निर्धारित सामग्री का इस्तेमाल किया जाता है। पिंड पितरों को श्रद्धापूर्वक अर्पित किए जाते हैं। श्राद्ध कर्म में पवित्रता और श्रद्धा को विशेष महत्व दिया जाता है। इसलिए जल्दबाजी करने के बजाय पूरे मन से कर्म करना चाहिए।
सभी पितरों का ऐसे करें स्मरण
सर्वपितृ अमावस्या की खास बात यही है कि इस दिन केवल किसी एक पूर्वज के लिए ही नहीं, बल्कि परिवार के सभी दिवंगत पूर्वजों का स्मरण किया जा सकता है। जिनकी श्राद्ध तिथि ज्ञात नहीं है, जिनका श्राद्ध किसी कारण से छूट गया है या जिनका नाम परिवार को ठीक से याद नहीं है, उनके लिए भी श्रद्धापूर्वक श्राद्ध किया जाता है। संकल्प के दौरान ज्ञात और अज्ञात सभी पितरों का स्मरण किया जा सकता है।
ब्राह्मण भोज का महत्व
श्राद्ध कर्म के बाद ब्राह्मणों को भोजन कराने की परंपरा है। भोजन अपनी क्षमता और श्रद्धा के अनुसार कराया जा सकता है। भोजन के बाद उन्हें दक्षिणा और आवश्यकतानुसार वस्त्र या अन्य सामग्री दी जाती है। धार्मिक मान्यता में श्राद्ध के दौरान भोजन कराने और दान देने को पितरों के प्रति श्रद्धा व्यक्त करने का माध्यम माना गया है।
कौए और अन्य जीवों को भोजन
श्राद्ध कर्म में कौए को भोजन कराने की भी परंपरा है। इसके पीछे धार्मिक मान्यता जुड़ी हुई है कि कौए को पितरों का प्रतीक माना जाता है। इसके अलावा गाय, कुत्ते और जरूरतमंद व्यक्ति को भोजन कराने की परंपरा भी कई परिवारों में निभाई जाती है। इस दिन भोजन और अन्न का दान श्रद्धापूर्वक करना शुभ माना जाता है।
क्या करें दान
सर्वपितृ अमावस्या पर जरूरतमंद लोगों को भोजन, अन्न, वस्त्र और अपनी सामर्थ्य के अनुसार अन्य उपयोगी वस्तुओं का दान किया जा सकता है। काले तिल और अन्न का दान भी पितृ कर्म से जुड़ा माना जाता है। दान करते समय दिखावे के बजाय श्रद्धा और सामर्थ्य का ध्यान रखना चाहिए।
शाम को करें दीपदान
सर्वपितृ अमावस्या के दिन शाम के समय घर के बाहर या दक्षिण दिशा की ओर पितरों के निमित्त दीपक जलाने की भी परंपरा है। मान्यता है कि इससे पितरों के प्रति सम्मान और श्रद्धा व्यक्त होती है। इस तरह सर्वपितृ अमावस्या पर तर्पण, श्राद्ध, पिंडदान, भोजन और दान के माध्यम से सभी ज्ञात-अज्ञात पितरों का स्मरण किया जाता है।
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Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी ज्योतिषीय, पौराणिक और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है तथा केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है। अधिक जानकारी के लिए कृपया संबंधित विषय के विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य करें।)