Shringi Rishi Ka Vivah : भारतीय पुराणों और रामायण में वर्णित ऋष्यश्रृंग महान तपस्वी, विद्वान और तेजस्वी ऋषियों में गिने जाते हैं। उनका जीवन जितना अद्भुत था, उतनी ही रोचक उनके विवाह की कथा भी है।
Shringi Rishi Ka Vivah : भारतीय पुराणों और रामायण में वर्णित ऋष्यश्रृंग महान तपस्वी, विद्वान और तेजस्वी ऋषियों में गिने जाते हैं। उनका जीवन जितना अद्भुत था, उतनी ही रोचक उनके विवाह की कथा भी है। श्रृंगी ऋषि का विवाह राजा रोमपाद की दत्तक पुत्री शांता से हुआ था। शांता को अधिकांश ग्रंथों में भगवान श्रीराम के पिता महाराज दशरथ की ज्येष्ठ पुत्री बताया गया है। इस प्रकार श्रृंगी ऋषि भगवान श्रीराम के बहनोई भी माने जाते हैं।
श्रृंगी ऋषि का जन्म
पौराणिक कथाओं के अनुसार श्रृंगी ऋषि, महर्षि विभाण्डक के पुत्र थे। उनका जन्म अत्यंत चमत्कारिक परिस्थितियों में हुआ था। उनके सिर पर मृग (हिरण) के सींग जैसा एक उभार था, जिसके कारण उनका नाम ऋष्यश्रृंग पड़ा। "ऋष्य" का अर्थ हिरण और "श्रृंग" का अर्थ सींग होता है।महर्षि विभाण्डक ने अपने पुत्र का पालन-पोषण घने वन में किया। उन्होंने उन्हें सांसारिक जीवन से पूरी तरह दूर रखा। श्रृंगी ऋषि ने अपने बचपन से लेकर युवावस्था तक केवल अपने पिता और वन के पशु-पक्षियों को ही देखा था। वे स्त्री-पुरुष के भेद से भी अनजान थे और उनका जीवन पूर्णतः तप, योग तथा वेदों के अध्ययन में व्यतीत हुआ।
अंगदेश में पड़ा भीषण अकाल
उसी समय अंगदेश के राजा रोमपाद के राज्य में भयंकर अकाल पड़ गया। वर्षा कई वर्षों तक नहीं हुई, जिससे जनता अत्यंत कष्ट में थी। राजा ने अनेक यज्ञ और अनुष्ठान कराए, लेकिन वर्षा नहीं हुई।तब विद्वान ब्राह्मणों और ऋषियों ने राजा को बताया कि यदि महान तपस्वी श्रृंगी ऋषि अपने चरण अंगदेश की भूमि पर रख देंगे, तो उनके तप के प्रभाव से वर्षा अवश्य होगी और राज्य समृद्ध हो जाएगा।
श्रृंगी ऋषि को अंगदेश लाना
राजा रोमपाद के सामने सबसे बड़ी चुनौती थी कि वन में रहने वाले श्रृंगी ऋषि को राज्य तक कैसे लाया जाए। विभिन्न कथाओं के अनुसार, राजा ने कुछ सुंदर युवतियों को वन में भेजा। उन्होंने मधुर व्यवहार और संगीत के माध्यम से श्रृंगी ऋषि को अपने साथ चलने के लिए प्रेरित किया।जब श्रृंगी ऋषि अंगदेश पहुंचे, तभी घने बादल छा गए और मूसलाधार वर्षा होने लगी। वर्षों से सूखी धरती हरी-भरी हो गई। जनता ने इसे श्रृंगी ऋषि के तप का चमत्कार माना।
शांता से विवाह राजा रोमपाद श्रृंगी ऋषि के तप, ज्ञान और दिव्य शक्ति से अत्यंत प्रभावित हुए। उन्होंने अपनी दत्तक पुत्री शांता का विवाह श्रृंगी ऋषि से करने का निश्चय किया।शांता अत्यंत गुणवान, विदुषी, धर्मपरायण और संस्कारी राजकुमारी थीं। कई ग्रंथों में वर्णन मिलता है कि वे मूल रूप से अयोध्या के राजा दशरथ और रानी कौशल्या की पुत्री थीं। बाद में राजा दशरथ ने अपने मित्र रोमपाद को संतान-सुख देने के लिए शांता को दत्तक दे दिया था।उचित समय पर वैदिक रीति-रिवाजों के अनुसार श्रृंगी ऋषि और शांता का विवाह संपन्न हुआ। विवाह के बाद श्रृंगी ऋषि ने गृहस्थ जीवन को भी धर्म और तप के साथ अपनाया तथा समाज के कल्याण के लिए अनेक यज्ञ संपन्न कराए।
पुत्रेष्टि यज्ञ में भूमिका
श्रृंगी ऋषि का सबसे महत्वपूर्ण योगदान महाराज दशरथ के पुत्रेष्टि यज्ञ से जुड़ा है। उस समय दशरथ की कोई संतान नहीं थी और वे अत्यंत चिंतित रहते थे।महर्षि वशिष्ठ की सलाह पर महाराज दशरथ ने श्रृंगी ऋषि को अयोध्या आमंत्रित किया। श्रृंगी ऋषि ने विधिपूर्वक पुत्रेष्टि यज्ञ संपन्न कराया। यज्ञ की पूर्णाहुति के बाद अग्निदेव से दिव्य खीर प्राप्त हुई, जिसे दशरथ ने अपनी तीनों रानियों कौशल्या, कैकेयी और सुमित्रा में बांट दिया।इसी दिव्य प्रसाद के प्रभाव से भगवान श्रीराम, भरत, लक्ष्मण और शत्रुघ्न का जन्म हुआ। इस प्रकार श्रृंगी ऋषि का नाम रामायण की सबसे महत्वपूर्ण घटनाओं में सम्मानपूर्वक लिया जाता है।