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Bhagvan Kartikeya: भगवान कार्तिकेय की सवारी क्या है? जानिए इसका आध्यात्मिक महत्व

जीवांजलि धर्म डेस्कPublished by:
कोमल शर्मा
सार

Bhagvan Kartikeya: भगवान कार्तिकेय, जिन्हें स्कंद, कुमार, षण्मुख, मुरुगन और सुब्रह्मण्य के नाम से भी जाना जाता है, हिंदू धर्म के प्रमुख देवताओं में से एक हैं। वे भगवान शिव और माता पार्वती के ज्येष्ठ पुत्र तथा देवताओं की सेना के सेनापति माने जाते हैं।

Bhagvan Kartikeya

Bhagvan Kartikeya: भगवान कार्तिकेय, जिन्हें स्कंद, कुमार, षण्मुख, मुरुगन और सुब्रह्मण्य के नाम से भी जाना जाता है, हिंदू धर्म के प्रमुख देवताओं में से एक हैं। वे भगवान शिव और माता पार्वती के ज्येष्ठ पुत्र तथा देवताओं की सेना के सेनापति माने जाते हैं। भगवान कार्तिकेय का स्वरूप वीरता, ज्ञान, साहस, अनुशासन और धर्म की रक्षा का प्रतीक है।सामान्य मान्यता के अनुसार भगवान कार्तिकेय की सवारी मोर है, जिसे "परवाणी" या "मयूर वाहन" भी कहा जाता है। लेकिन कई पौराणिक कथाओं में यह भी उल्लेख मिलता है कि कुछ विशेष परिस्थितियों में उन्होंने अन्य वाहनों का भी उपयोग किया। फिर भी उनका मुख्य और सबसे प्रसिद्ध वाहन मोर ही माना जाता है।

भगवान कार्तिकेय को मोर की सवारी कैसे मिली?

पौराणिक कथा के अनुसार एक समय असुर सूरपद्म ने कठोर तपस्या करके अपार शक्तियाँ प्राप्त कर लीं। उसने तीनों लोकों में अत्याचार फैलाना शुरू कर दिया। देवताओं ने भगवान शिव से प्रार्थना की कि वे इस संकट का समाधान करें। तब भगवान शिव के तेज से भगवान कार्तिकेय का प्राकट्य हुआ।

भगवान कार्तिकेय ने देवसेना का नेतृत्व करते हुए सूरपद्म और उसके भाइयों के विरुद्ध भीषण युद्ध किया। कई दिनों तक चले इस युद्ध के अंत में जब सूरपद्म पराजित होने लगा, तब उसने अपना रूप बदलकर एक विशाल वृक्ष धारण कर लिया। भगवान कार्तिकेय ने अपने दिव्य भाले (शक्ति या वेल) से उस वृक्ष को दो भागों में विभाजित कर दिया।

कथा के अनुसार वृक्ष के दो भागों में से एक मोर बन गया और दूसरा मुर्गा। सूरपद्म ने अपनी भूल स्वीकार करते हुए भगवान से क्षमा माँगी। भगवान कार्तिकेय ने उसकी प्रार्थना स्वीकार कर ली। उन्होंने मोर को अपना वाहन बना लिया और मुर्गे को अपने ध्वज का प्रतीक बना लिया। यह कथा यह संदेश देती है कि ईश्वर दुष्ट से दुष्ट व्यक्ति को भी पश्चाताप करने पर सम्मानजनक स्थान प्रदान कर सकते हैं।

 मोर की सवारी का आध्यात्मिक महत्व

भगवान कार्तिकेय का मोर केवल एक वाहन नहीं, बल्कि गहरे आध्यात्मिक संदेश का प्रतीक है।मोर अहंकार, अभिमान और सांसारिक आकर्षण पर नियंत्रण का प्रतीक माना जाता है। भगवान कार्तिकेय का मोर पर विराजमान होना यह दर्शाता है कि जो व्यक्ति अपने अहंकार और नकारात्मक प्रवृत्तियों पर विजय प्राप्त कर लेता है, वही वास्तविक ज्ञान और सफलता प्राप्त करता है।मोर अपने सुंदर पंखों के कारण आकर्षण का केंद्र होता है, लेकिन भगवान उसके ऊपर बैठकर यह संदेश देते हैं कि बाहरी सुंदरता से अधिक महत्वपूर्ण आत्मसंयम और सदाचार है।

 मुर्गा क्यों बना ध्वज का प्रतीक?

भगवान कार्तिकेय के ध्वज पर अंकित मुर्गा जागरूकता, साहस और नई शुरुआत का प्रतीक माना जाता है। जिस प्रकार मुर्गा सुबह होने का संकेत देता है, उसी प्रकार भगवान कार्तिकेय का ध्वज अज्ञान के अंधकार से ज्ञान के प्रकाश की ओर बढ़ने की प्रेरणा देता है। मुर्गा यह भी सिखाता है कि जीवन में आलस्य को त्यागकर सदैव सतर्क और कर्मशील रहना चाहिए।

 भगवान कार्तिकेय का दिव्य भाला

भगवान कार्तिकेय के हाथ में धारण किया गया दिव्य भाला "वेल" कहलाता है। यह केवल एक शस्त्र नहीं बल्कि ज्ञान, सत्य और धर्म की शक्ति का प्रतीक माना जाता है। दक्षिण भारत में विशेष रूप से भगवान मुरुगन की पूजा के समय इस वेल का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है।

दक्षिण भारत में भगवान कार्तिकेय का विशेष महत्व

दक्षिण भारत, विशेषकर तमिलनाडु, केरल और कर्नाटक में भगवान कार्तिकेय को मुरुगन या सुब्रह्मण्य के रूप में अत्यंत श्रद्धा के साथ पूजा जाता है। वहाँ उनके अधिकांश मंदिरों में उन्हें मोर पर विराजमान दिखाया जाता है। भक्त मानते हैं कि भगवान मुरुगन की आराधना से साहस, आत्मविश्वास, बुद्धि और सफलता की प्राप्ति होती है भगवान कार्तिकेय का जीवन हमें अनेक प्रेरणाएँ देता है। वे सिखाते हैं कि धर्म की रक्षा के लिए साहस आवश्यक है, लेकिन उस साहस के साथ करुणा और क्षमा का भाव भी होना चाहिए। उन्होंने अपने शत्रु सूरपद्म को भी पश्चाताप करने पर सम्मान दिया, जिससे यह शिक्षा मिलती है कि परिवर्तन की संभावना हर व्यक्ति में होती है।उनका मोर वाहन हमें अहंकार पर विजय प्राप्त करने की प्रेरणा देता है, जबकि ध्वज पर स्थित मुर्गा हमें सतर्क, अनुशासित और कर्मशील बनने का संदेश देता है।

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(Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी ज्योतिषीय, पौराणिक और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है तथा केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है। अधिक जानकारी के लिए कृपया संबंधित विषय के विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य करें।)
 

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